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विमर्श

अमरीका—इज़राइल के ईरान पर बड़े हमले पर मौन रहकर केवल ईरान द्वारा सऊदी अरब पर छोटे जवाबी हमलों की निंदा कर PM मोदी ने बना लिया है खुद को हंसी का पात्र !

Janjwar Desk
5 March 2026 3:14 PM IST
अमरीका—इज़राइल के ईरान पर बड़े हमले पर मौन रहकर केवल ईरान द्वारा सऊदी अरब पर छोटे जवाबी हमलों की निंदा कर PM मोदी ने बना लिया है खुद को हंसी का पात्र !
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file photo

आयतुल्लाह खामेनेई और उनके परिवार, जिनमें उनके पोते-पोतियाँ भी शामिल हैं, की हत्या तथा कई सैन्य नेताओं की हत्या के बावजूद ईरान की सशस्त्र सेनाएँ संघर्ष जारी रखे हुए हैं। अमरीका की जनता अब यह समझने लगी है कि उनकी अपनी सत्ता में परिवर्तन की आवश्यकता है, क्योंकि केवल लगभग 25 प्रतिशत अमरीकी ही इस तथाकथित आतंकवादी अभियान, “ऑपरेशन एपस्टीन फ्यूरियस”, का समर्थन करते हैं....

वेंकटेश नारायणन और संदीप पांडेय की टिप्पणी

1 मार्च को संयुक्त राज्य अमरीका के युद्धोन्मादी और रक्तपिपासु नव-रूढ़िवादियों तथा इजराइल (अधिकृत फिलिस्तीन) नामक अवैध राज्य द्वारा ईरान पर किया गया हमला पूरी तरह अप्रत्याशित नहीं, किंतु उकसावे के बिना किया गया हमला विश्व भर में तीव्र और व्यापक रूप से निंदित किया गया है। इस हमले के परिणामस्वरूप अमरीका और इजराइल की सेनाओं द्वारा 165 प्राथमिक विद्यालय की छात्राओं, 20 महिला वॉलीबॉल खिलाड़ियों तथा अनेक अन्य निर्दोष नागरिकों की हत्या की गई है। यह हमला अप्रत्याशित नहीं था, क्योंकि 1990 के दशक के मध्य से ही इजराइल और अमरीकी सरकारों की रणनीतियों में यह शामिल रहा है।

आश्चर्य की बात यह है कि अपने निडर आध्यात्मिक नेता आयतुल्लाह खामेनेई और उनके परिवार, जिनमें उनके पोते-पोतियाँ भी शामिल हैं, की हत्या तथा कई सैन्य नेताओं की हत्या के बावजूद ईरान की सशस्त्र सेनाएँ संघर्ष जारी रखे हुए हैं। अमरीका की जनता अब यह समझने लगी है कि उनकी अपनी सत्ता में परिवर्तन की आवश्यकता है, क्योंकि केवल लगभग 25 प्रतिशत अमरीकी ही इस तथाकथित आतंकवादी अभियान, “ऑपरेशन एपस्टीन फ्यूरियस”, का समर्थन करते हैं। ईरान पश्चिम एशिया में अमरीका और उसके सहयोगियों के सैन्य ठिकानों पर जवाबी हमले जारी रखे हुए है, जबकि अमरीका और इजराइल लगातार नए हमले कर रहे हैं। ट्रंप की अपनी रिपब्लिकन पार्टी के सांसद थॉमस मैसी ने यह कहते हुए ट्रंप की युद्ध नीति पर प्रश्न उठाया है कि दुनिया के दूसरे छोर पर किसी देश पर बमबारी करने से “एपस्टीन फाइलें” गायब नहीं हो जाएँगी।

कुछ वर्ष पहले ईरानी महिलाओं द्वारा हिजाब-विरोधी आंदोलनों तथा हाल ही में बिगड़ती अर्थव्यवस्था के विरुद्ध नागरिक प्रदर्शनों के दौरान आयतुल्लाह खामेनेई की भूमिका पर भी प्रश्न उठे थे, जब दोनों अवसरों पर ईरानी सरकार ने कठोर दमन का सहारा लिया था। तथापि, ईरान में शासन परिवर्तन का अधिकार पूर्णतः ईरान की जनता के पास है। इसे अमरीका और इजराइल के शासकों के पास गिरवी नहीं रखा जा सकता। यह आश्चर्य की बात नहीं कि ट्रंप द्वारा ईरानी जनता को सत्ता अपने हाथ में लेने के उकसावे के बावजूद, ईरान के लोगों ने उस पर ध्यान नहीं दिया है और फिलहाल अपने अस्तित्व की चिंता कर रहे हैं।

भारतीयों के लिए जो बात प्रासंगिक है, वह यह है कि हमले से पहले और बाद में भारत सरकार का व्यवहार कैसा रहा। प्रधानमंत्री मोदी इजराइली संसद में भाषण देने पहुँचे, जहाँ उनके बोलना शुरू करते ही विपक्ष के कई सदस्य बाहर चले गए। इस यात्रा का एक अनकहा पहलू यह भी था कि उद्योगपति अडानी की एल्बिट डिफेंस सिस्टम्स द्वारा हैदराबाद में निर्मित हर्मीस 600 ड्रोन की अधिक बिक्री हो सके। ऐसा लगता है कि नरेन्द्र मोदी अडानी का कारोबार बढ़ाने के लिए ही विदेश यात्राएं करते हैं। भारत की आर्थिक नीति लगभग नगण्य होते हुए भी, अमेरिका के साथ ऐसे व्यापार समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए, जिन्हें अनावश्यक और प्रतिकूल बताया जा रहा है।

अमरीका के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा यह कहे जाने के बाद कि उनकी कार्यपालिका टैरिफ तय नहीं कर सकती, ऐसे समझौतों की वैधता और भी संदिग्ध हो जाती है। हम कल्पना कर सकते हैं कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन की इस सब में कोई भूमिका नहीं है और हरदीप पुरी तो एपस्टीन फाइल्स से अपने को बचाने में लगे हुए हैं, लेकिन अमरीका स्थित भारतीय दूतावास क्या कर रहा था? दूतावासों का जो काम होता है, विदेशों में घटनाक्रम पर नजर रखना और अपनी सरकारों को उसी अनुसार सुझाव देते रहना उसमें अमरीका स्थित भारतीय दूतावास असफल रहा है।

मोदी की यात्रा के परिणामस्वरूप 50,000 भारतीयों को इजराइल भेजने की तैयारी की गई है, जिनमें से कई कुशल श्रमिक के रूप में चयनित होंगे, किंतु वहाँ पहुँचने पर यदि उनकी योग्यता मानक के अनुरूप नहीं पाई गई, तो उन्हें अकुशल श्रमिक के रूप में काम करना पड़ेगा। भारतीय श्रमिक लंबे समय से विदेशों में रोजगार की तलाश में जाते रहे हैं, किंतु यह पहली बार है जब भारत सरकार स्वयं श्रम आपूर्तिकर्ता या ठेकेदार की भूमिका निभा रही है। अब जबकि अमरीका ने बंग्लादेश के सामने यह शर्त रखी है कि यदि वह भारत के बजाए अमरीका से रुई खरीदेगा तभी अमरीका बंग्लादेश में बने कप़ड़ों पर कोई शुल्क नहीं लगाएगा तो हमारे पास अब निर्यात करने के लिए ज्यादा कुछ बचा भी नहीं है। इस बीच इजराइल तेहरान के गांधी अस्पताल पर बमबारी जारी रखे हुए है।

किसी को भारत सरकार को यह बताने की आवश्यकता है कि हम न केवल गलत तरफ खड़े हैं, बल्कि यह भी कि हम स्वयं अमरीका के निशाने पर आ सकते हैं। अमरीका की कार्यवाइयों के इतिहास को देखते हुए यह आशंका निराधार नहीं लगती। गुण्डागर्दी दिखाते हुए अमरीका का वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मडुरो व उनकी पत्नी का वहां जाकर अपहरण कर अमरीका लाकर मुकदमा चलाना, आयतुल्लाह खामेनेई की ईरान में जाकर हत्या कर देना - उससे पहले इराक के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन की हत्या व चिले के राष्ट्रपति सल्वाडोर एलेण्डे की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत - यदि नरेन्द्र मोदी व अमित शाह ने जरा भी रीढ़ की हड्डी सीधी की या सम्प्रभुता प्रदर्शित करने की कोशिश की तो अमरीका उन्हें भी नहीं छोड़ने वाला, लेकिन ऐसा होने की सम्भवना कम ही है क्योंकि हिन्दुत्ववादी सोच के लोगों का इतिहास यह रहा है कि वे देश के अंदर तो तमाम खुराफातें करते रहते हैं लेकिन साम्राज्यवादी ताकतों के सामने नतमस्तक हो जाते हैं।

ईरान में अमरीका और इजराइल की कार्रवाइयों की कड़ी निंदा की जानी चाहिए। यदि यमन और हिज्बुल्लाह जैसे समूह इस संघर्ष में शामिल होते हैं, तो यह तीसरे विश्व युद्ध का रूप ले सकता है। पाकिस्तान में भी आयतुल्लाह खामेनेई की हत्या के विरोध में अमरीकी करांची स्थित उप-दूतावास के सामने प्रदर्शनों में दो दर्जन लोग मारे गए हैं। कश्मीर में तनाव बना हुआ है और इराक में भी प्रदर्शन हो रहे हैं।

भारत के लिए सबसे उपयुक्त मार्ग अपनी संप्रभुता को पुनः स्थापित करना है। 2014 से प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व वाली सरकार पर विदेशी हितों के सामने आत्मसमर्पण के आरोप लगते रहे हैं। डोनाल्ड ट्रम्प के दबाव में रूस से तेल खरीद में कटौती और फिर वर्तमान युद्ध से उत्पन्न संकट के समय पुनः आपूर्ति की मांग, भारत की दयनीय स्थिति को दर्शाता है। अमरीका व इज़राइल का ईरान पर बड़े हमले पर मौन रहते हुए केवल ईरान द्वारा सऊदी अरब पर छोटे जवाबी हमलों की निंदा कर नरेन्द्र मोदी ने अपने को हंसी का पात्र बना लिया है।

समय आ गया है कि भारत स्पष्ट रुख अपनाए। हम भारत सरकार से आग्रह करते हैं कि वह ईरान के समर्थन की घोषणा करे। यह ईरान और हमारे अपने हित में भी है कि हम नैतिक और न्यायसंगत पक्ष में खड़े हों। परिवर्तन की मांग का समय आ गया है, यदि विदेश नीति में नहीं, तो फिर सत्ता में ही सही।

(इस लेख के लेखक वेंकटेश नारायणन सूचना प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ हैं और संदीप पाण्डेय सोशलिस्ट पार्टी (इण्डिया) के प्रधान महासचिव हैं।)

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