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विमर्श

किताबों के बीच बढ़ते बच्चे स्मार्टफोन वाले बच्चों से भविष्य में होंगे ज्यादा बुद्धिमान

Janjwar Desk
27 Aug 2020 9:18 AM GMT
किताबों के बीच बढ़ते बच्चे स्मार्टफोन वाले बच्चों से भविष्य में होंगे ज्यादा बुद्धिमान
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(प्रतीकात्मक तस्वीर)

आज के दौर में स्क्रीन पर दुनियाभर की सूचना है, एक ही विषय पर अनेक लेख हैं, अनेक मत हैं - इसका नतीजा यह है कि हम जल्दी में चुनिन्दा विषय पढ़ते हैं, दूसरी तरफ टेक्स्ट बुक में जो कुछ प्रकाशित है वही बच्चों को पढ़ना है इसलिए इसे गंभीरता से पढ़ते हैं, जो लम्बे समय तक याद रहता है.....

वरिष्ठ पत्रकार महेंद्र पाण्डेय का विश्लेषण

कोविड 19 के दौर में लगभग बच्चों के साथ दो ऐसी चीजें हें जो सामान्यतया नहीं होतीं – पहला था पार्क से दूर घर में बंद रहना और दूसरा ऑनलाइन कक्षाएं। हाल में प्रकाशित अनुसंधानों के अनुसार ये दोनों ही बच्चों के बौद्धिक क्षमता को प्रभावित करती हैं। बेल्जियम के हस्सेल्ट यूनिवर्सिटी में किये गए व्यापक शोध के बाद यह निष्कर्ष निकाला गया है कि हरियाली के बीच रहने वाले बच्चों का इंटेलिजेंस क्योशेंट (आईक्यू) बढ़ जाता है। इस अध्ययन के मुख्य लेखक टिम नव्रोत के अनुसार आसपास हरियाली जब तीन प्रतिशत बढ़ती है तब यहां रहने वाले बच्चों का आईक्यू 2।6 पॉइंट बढ़ जाता है, जबकि बौद्धिक क्षमता 2 पॉइंट बढ़ती है। यह स्थिति अमीरों और गरीबों में एक जैसी देखी गई और इसी तरह शहर और गाँव में भी एक जैसा प्रभाव देखा गया। इस अध्ययन के अनुसार बृक्ष आईक्यू बढ़ने में झाड़ियों या घास के मैदान की तुलना में अधिक प्रभावी होते हैं।

इससे पहले भी हरियाली का बच्चों की बौद्धिक क्षमता पर प्रभाव का अनेक बार आकलन किया गया है, और हमेशा परिणाम एक जैसे ही रहे हैं। पर, इस नए अध्ययन की विशेषता है कि इसे सीधे आईक्यू से जोड़ा गया है। प्लोस मेडिसिन के नवीनतम अंक में प्रकाशित इस शोधपत्र के अनुसार आईक्यू में बढ़ोत्तरी का स्पष्ट कारण तो नहीं पता, पर संभवतः ऐसा हरेभरे क्षेत्र में कम तनाव, अधिक शारीरिक क्रियाएं और अपेक्षाकृत अधिक शांति के कारण होता है।

कोविड 19 के दौर में लॉकडाउन के कारण बच्चे हरियाली से भी दूर रहे, क्योंकि पार्क और उद्यान भी बंद थे। इसी दौरान स्क्रीन आधारित ऑनलाइन कक्षाओं का भी एक व्यापक दौर शुरू किया गया। अनेक मनोवैज्ञानिकों और मस्तिष्क विशेषज्ञों का मानना है कि इस पद्धति से पढ़ने वाले बच्चों के मस्तिष्क का विकास सामान्य से अलग होगा। बच्चे क्या पड़ते हैं वह बौद्धिक क्षमता को प्रभावित करता है – यह तथ्य सभी जानते हैं। पर, बच्चे कैसे पढ़ते हैं इसका भी असर मस्तिष्क पर पड़ता है। प्रसिद्ध लेखक टी एस इलियट ने कभी कहा था, हमारी सूचना में ज्ञान कहाँ है और हमारे ज्ञान में बुद्धिमत्ता कहाँ है? आज के ऑनलाइन शिक्षा में यह कथन बिलकुल सटीक बैठता है - स्क्रीन पर पढ़ना बिना बुद्धिमत्ता वाला ज्ञान देता है और स्क्रीन पर सूचना तो बहुत है, पर ज्ञान नहीं है।

जब हम किताबों को पढ़ते हैं, तब पढ़ने की रफ़्तार धीमी होती है और इसमें हम हरेक शब्द पढ़ते हैं, इसके सन्दर्भ को समझते हैं, साथ के बने चित्रों से भी कुछ समझते हैं और इसके परिणाम से जितना भी हम किताबों से पढ़ते हैं वह मस्तिष्क में बिलकुल स्पष्ट रहता है। दूसरी तरफ स्क्रीन पर हम तेज पढ़ सकते हैं, पर इसमें कुछ भी खोजने की आसानी के कारण कभी कोई भी विषय या लेख पूरा नहीं पढ़ते। यह समस्या केवल बच्चों की ही नहीं हैं, बल्कि वयस्कों की भी है। हम जब समाचारपत्र में कोई समाचार पढ़ते हैं तब उसे धीरे धीरे पढ़ते हैं, पूरा पढ़ते हैं और अपेक्षाकृत अधिक समय लगाकर पूरी एकाग्रता से पढ़ते हैं। इसके साथ ही इससे सम्बंधित पहले पढ़े गए समाचारों से भी नए समाचार को मस्तिष्क में जोड़ते हैं। दूसरी तरफ वही समाचार जब हम स्क्रीन पर पढ़ते हैं तब कुछ हिस्सा शुरू का, कुछ बीच का कुछ अंत का पढ़कर दूसरे समाचार पर चले जाते हैं। स्क्रीन पर हम केवल वही खोजते हैं जो हम खोजना चाहते हैं, जब कि समाचार पत्रों में हम लगभग सभी प्रकाशित समाचार, कार्टून, विज्ञापन और यहाँ तक कि भविष्यफल भी पढ़ जाते हैं।

आज के दौर में स्क्रीन पर दुनियाभर की सूचना है, एक ही विषय पर अनेक लेख हैं, अनेक मत हैं – इसका नतीजा यह है कि हम जल्दी में चुनिन्दा विषय पढ़ते हैं। दूसरी तरफ टेक्स्ट बुक में जो कुछ प्रकाशित है वही बच्चों को पढ़ना है इसलिए इसे गंभीरता से पढ़ते हैं, जो लम्बे समय तक याद रहता है। वैज्ञानिकों के अनुसार स्क्रीन स्वयं में एक बाधा है, ध्यान भटकाने का एक साधन है। स्क्रीन पर पढ़ने वालों के मस्तिष्क में जल्दी प्रश्न नहीं आते, क्योंकि इसमें आप कुछ भी और कभी भी खोज सकते हैं। दूसरी तरफ प्रिंट के विषय पढ़ने पर मस्तिष्क में जिज्ञासा होती है, और फिर आप आगे उस विषय पर बहुत सारी बातें सोचते हैं। स्क्रीन पर हम कभी सोचने का काम नहीं करते, बस शब्दों, वाक्यों या फिर पूरे पैराग्राफ को लांघते हुए उत्तर पढ़ते हैं।

यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ़ लन्दन की प्रोफेसर मरिंने वुल्फ का अभिभावकों के लिए सुझाव है, कि अपने बच्चो के डिजिटल डीवाइसेज के पास पुस्तकें जरूर रखें। नयी या पुरानी, खरीदी या पुस्तकालय से ली गई कैसी भी पुस्तक जरूर रखें। महत्वपूर्ण यह है कि पुस्तके हों और अब्च्चों को उन्हें पढ़ने के लिए प्रेरित किया जाए। सबसे आवश्यक यह है कि बच्चों के सोने के बिस्तर के पास डिजिटल उपकरण नहीं हों, पर पुस्तकें अवश्य हों।

दोनों ही अध्ययन हमारे देश के लिए महत्वपूर्ण हैं। यहाँ शहरों के साथ-साथ अब गाँव से भी हरियाली गायब होती जा रही हैं, पर बच्चों के विकास के लिए हरियाली का दायरा बढ़ाना पड़ेगा। दूसरी तरफ डिजिटल शिक्षा ने पहले ही समाज में एक बड़ी खाई पैदा कर दी है। एक वर्ग के छात्र तेज इन्टरनेट और बेहतर स्मार्टफोन से लैस हैं, तो दूसरी तरफ बहुत सारे बच्चे स्मार्टफोन और इन्टरनेट के बिना नहीं पढ़ पा रहे हैं। बिना स्मार्टफोन वाले बच्चे संभव है कुछ समय के लिए पढ़ाई में पिछड़ जाएँ, पर यदि उन्होंने पढ़ाई नहीं छोडी और अपनी पाठ्यपुस्तकें पढ़ते रहे तो भविष्य में बेहतर स्मार्टफोन वाले बच्चों से अधिक बुद्धिमान साबित हो सकते हैं।

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