आज दुनिया को ऐसे तर्कशील लोगों की जरूरत, जो वैज्ञानिक सोच के साथ मानवता को धर्म, जाति और राष्ट्रवाद से रखते हों ऊपर

धर्मेन्द्र आजाद की टिप्पणी
कई युवा अक्सर यह सवाल पूछते हैं— हम जी क्यों रहे हैं? हमारे जीवन का उद्देश्य क्या है? यह उलझन स्वाभाविक है, क्योंकि समाज हमें बचपन से ही तैयार जवाब पकड़ा देता है— पढ़ो, नौकरी करो, शादी करो, परिवार बढ़ाओ, परंपरा निभाओ। लेकिन ये जवाब हर व्यक्ति के लिए न तो पर्याप्त होते हैं, न ही अंतिम।
असल में जीवन का कोई “रेडीमेड उद्देश्य” नहीं होता। न कोई जन्म से लिखा हुआ प्लान, न कोई ईश्वरीय निर्देश। मनुष्य पहले अस्तित्व में आता है, फिर अपने परिवेश, अनुभवों, ज़रूरतों, फैसलों और संघर्षों के ज़रिये अपने जीवन को अर्थ देता है। यही वैज्ञानिक और तर्कशील दृष्टि है।
कई लोग धर्म, राष्ट्रवाद या किसी विशेष जीवन-पद्धति में जीवन का अर्थ खोजते हैं। इससे उन्हें मानसिक सहारा तो मिल सकता है, लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब यही विचार दूसरों पर थोपे जाने लगते हैं। इतिहास बताता है कि अंधविश्वास, कट्टरता और अंधराष्ट्रवाद ने समाज को आगे नहीं, बल्कि पीछे धकेला है। सोचने के बजाय मान लेने या ज़बरदस्ती मनवाने की आदत मानव समाज की सबसे बड़ी दुश्मन है— यह स्वतंत्र सोच पर बेड़ियाँ डाल देती है।
बहुत से लोग मानते हैं कि बड़ा करियर, धन-संग्रह, ऐशो-आराम और परिवार ही जीवन की सफलता है। ये लक्ष्य अपने आप में गलत नहीं हैं, लेकिन इन्हें ही सबकुछ मान लेना पर्याप्त नहीं। आज दुनिया में जनसंख्या बढ़ाना कोई ज़रूरत नहीं रह गया है, और केवल व्यक्तिगत धन-संग्रह से समाज आगे नहीं बढ़ सकता। इसलिए “और पैदा करो, और जमा करो” कोई महान सपना नहीं हो सकता। इससे जीवन तो जिया जा सकता है, लेकिन समाज को आगे बढ़ाने में इसकी निर्णायक भूमिका नहीं होती।
तर्कशील सोच कहती है कि जीवन का अर्थ हमें खुद गढ़ना है— बिना डर, बिना अंधविश्वास और बिना परंपराओं के गुलाम बने। साहित्य, कला, संगीत, दोस्ती, प्रेम, सवाल पूछने की आज़ादी और समाज को बराबरी, भाईचारे व न्याय की दिशा में आगे बढ़ाने के प्रयास— यही सब मिलकर जीवन को सार्थक बनाते हैं। इसके लिए किसी धार्मिक ग्रंथ या अलौकिक शक्ति की ज़रूरत नहीं होती।
मानवतावादी या तर्कशील सोच के लोग जीवन की चुनौतियों से भागते नहीं, बल्कि उन्हें पूरी ज़िम्मेदारी के साथ स्वीकार करते हैं। यहाँ कोई “ऊपर वाला सब संभाल लेगा” नहीं होता— इंसान खुद अपने फैसलों और भविष्य का निर्माता होता है। यही सोच व्यक्ति और समाज दोनों को स्वतंत्र, रचनात्मक और साहसी बनाती है।
इसका अर्थ यह नहीं कि इंसान के कोई आदर्श नहीं होने चाहिए। फर्क बस इतना है कि आदर्श सोच-समझकर चुने जाएँ, उनकी अच्छाइयों-बुराइयों की जाँच की जाए, उन पर सवाल उठाने को प्रोत्साहित किया जाए और ज़रूरत पड़ने पर उन्हें बदला भी जा सके। किसी एक जीवन-पद्धति, परंपरा या विचारधारा को बिना परखे जीवन का अंतिम सत्य मान लेना विकास और स्वतंत्र चिंतन को रोक देता है।
आज दुनिया को ऐसे लोगों की ज़रूरत है जो तर्कशील हों, वैज्ञानिक सोच रखते हों और मानवता को धर्म, जाति और राष्ट्रवाद से ऊपर रखें। हमें इस पृथ्वी को अगली पीढ़ी के लिए बेहतर हालत में ले जाने की दिशा में काम करना चाहिए— अधिक न्यायपूर्ण, अधिक बराबरी वाली और अधिक सुरक्षित।
आख़िरकार, हम इस विशाल ब्रह्मांड का एक बेहद छोटा सा हिस्सा हैं। हम यहाँ बस थोड़े समय के लिए अपनी भूमिका निभाने आए हैं। हमारा जीवन तभी सच में सार्थक होगा, जब हम इस दुनिया को पहले से बेहतर बनाकर जाएँ।





















