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विमर्श

केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने क्यों रद्द की कोलकाता रैली?

Janjwar Desk
1 Feb 2021 8:40 AM GMT
केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने क्यों रद्द की कोलकाता रैली?
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सरकार के वक्तव्यों में तिरंगे का अपमान बहुत बड़ा मुद्दा हो सकता है, पर गृह मंत्री के कार्य-कलाप के सन्दर्भ में यह बड़ा मुद्दा तो कतई नहीं था, जिसके चलते पश्चिम बंगाल की चुनावी रैली रद्द की जाए। फिर, तिरंगे के अपमान और लाल किले की बात राष्ट्रपति से लेकर प्रधानमंत्री तक लगातार उठा क्यों रहे हैं।

वरिष्ठ पत्रकार महेंद्र पाण्डेय का विश्लेषण

दिल्ली में 26 जनवरी को लाल किले पर अराजकता फ़ैली और 29 जनवरी को इजराइल दूतावास के बाहर एक मामूली धमाका किया गया। इन दोनों घटनाओं में से ज्यादा प्रभावी और खतरनाक घटना कौन सी थी? जाहिर है मीडिया और सोशल मीडिया के रुख और राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और पक्ष-विपक्ष के दूसरे नेताओं और वक्तव्यों के अनुसार लाल किले की घटना अधिक संवेदनशील और खतरनाक थी। पर, क्या सरकार भी लाल किले की घटना को अधिक खतरनाक मानती है?

रविवार, 31 जनवरी को केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह को पश्चिम बंगाल के हावडा में बड़ी चुनावी रैली में शामिल होना था, पर यह कार्यक्रम उन्हें रद्द करना पड़ा और रैली में वर्चुअल भाषण देना पड़ा। कार्यक्रम रद्द करने का कारण बताया गया – नई दिल्ली स्थित इजराइल दूतावास के बाहर 29 जनवरी को एक कमजोर विस्फोट जिसमें केवल तीन कारों के शीशे चटके थे। इसकी जांच चल रही है। यह एक आश्चर्य का विषय है, क्योंकि 26 जनवरी को नई दिल्ली लाल किले पर किसानों के वेश में उपद्रवियों ने झंडा फहराया था और हिंसा का प्रयास भी किया था और आईटीओ पर पुलिस और उपद्रवियों में टकराव हुआ था – पर इस कारण गृह मंत्री का चुनावी दौरा रद्द नहीं हुआ। इसकी भी जांच चल रही है और राष्ट्रपति अपने संसद के बजट सत्र अभिभाषण में और प्रधानमंत्री मन की बात में इसपर चिंता जाता चुके हैं, इसे तिरंगे का अपमान बता चुके हैं।

जाहिर है, सरकार के वक्तव्यों में तिरंगे का अपमान बहुत बड़ा मुद्दा हो सकता है, पर गृह मंत्री के कार्य-कलाप के सन्दर्भ में यह बड़ा मुद्दा तो कतई नहीं था, जिसके चलते पश्चिम बंगाल की चुनावी रैली रद्द की जाए। फिर, तिरंगे के अपमान और लाल किले की बात राष्ट्रपति से लेकर प्रधानमंत्री तक लगातार उठा क्यों रहे हैं। यदि आपने इस सरकार की कार्यशैली पर गौर किया होगा तो इतना तो अवश्य समझते होंगें कि प्रधानमंत्री और मंत्रियों के वक्तव्यों में और कार्य शैली में बहुत विरोधाभास रहता है। वक्तव्य तो अपने समर्थकों को भड़काने के लिए रहते हैं और इसका असर भी लगातार दिखता है। किसान आन्दोलन में भी यह असर दिल्ली की हरेक सीमा पर लगातार दिख रहा है और इन्हीं वक्तव्यों के अनुसार पुलिस और सुरक्षा बल अपनी रणनीति तैयार करते हैं।

सुरक्षाबलों को यह तय करना होता है कि किन लोगों को किसानों के पास जाने दें और किन लोगों को गायब कर दें। कितने पत्थर बरसाए जायेंगें और कितने तम्बू उखाड़े जायेंगें – किसे पीटना है और कितना पीटना है, किसे गिरफ्तार करना है और किसी बचा कर रखना है।

लाल किले की घटना सरकार के लिए वक्तव्यों से अधिक महत्व इसलिए भी नहीं रखती क्योंकि कड़ियाँ तो यही बताती हैं कि यह सब सरकार और पुलिस द्वारा ही प्रायोजित किया गया था। किसी घटना की जांच तो आजकल समय बिताने का एक आयाम होता है, जिससे दिशियों को बचाया जा सके और निर्दोषों को साजिश के तहत जेल में डाला जा सके। वैसे भी संभव है, पहले ही जांच रिपोर्ट तैयार कर ली जाती हो और फिर उसके अनुरूप जांच का दिखावा किया जाता हो।

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