इराक, ईरान और इसराइल के त्रिकोणीय युद्ध में ऐसी होनी चाहिए भारत की कूटनीतिक स्थिति !

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India's diplomatic position in the triangular war between Iraq, Iran and Israel war : पश्चिम एशिया लंबे समय से भू-राजनीतिक तनावों का केंद्र रहा है। विशेष रूप से इराक, ईरान और इसराइल के बीच समय-समय पर उत्पन्न होने वाले संघर्ष न केवल क्षेत्रीय स्थिरता बल्कि वैश्विक राजनीति, ऊर्जा सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति को भी प्रभावित करते हैं। ऐसे जटिल परिदृश्य में भारत की स्थिति अत्यंत संतुलित, व्यावहारिक और बहु-आयामी रही है। भारत न तो किसी गुट का खुला समर्थक बनता है और न ही पूरी तरह तटस्थ दर्शक की भूमिका निभाता है; वह अपने राष्ट्रीय हितों, ऊर्जा आवश्यकताओं, प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा और सामरिक साझेदारियों को ध्यान में रखते हुए एक “रणनीतिक स्वायत्तता” (Strategic Autonomy) पर आधारित नीति अपनाता है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और संतुलन की नीति
भारत और इराक के संबंध शीतयुद्ध काल से ही मैत्रीपूर्ण रहे हैं। इराक भारत का एक महत्वपूर्ण ऊर्जा आपूर्तिकर्ता रहा है। वहीं, ईरान के साथ भारत के सांस्कृतिक और सभ्यतागत संबंध प्राचीन काल से जुड़े हैं। फारसी प्रभाव भारतीय भाषा, कला और स्थापत्य में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। इसराइल के साथ भारत ने 1992 में पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित किए और तब से रक्षा, कृषि, प्रौद्योगिकी और खुफिया सहयोग में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
भारत की विदेश नीति का मूल तत्व “गुटनिरपेक्षता” से विकसित होकर अब “रणनीतिक स्वायत्तता” में परिवर्तित हो चुका है। इसका अर्थ है कि भारत प्रत्येक मुद्दे पर अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार निर्णय लेता है, न कि किसी स्थायी ध्रुवीकरण के आधार पर। इराक, ईरान और इसराइल के बीच संघर्ष की स्थिति में यही दृष्टिकोण भारत की कूटनीतिक दिशा निर्धारित करता है।
ऊर्जा सुरक्षा : नीति का केंद्रीय आयाम
भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता है और अपनी तेल आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा आयात करता है। ईरान और इराक दोनों भारत के लिए प्रमुख कच्चे तेल के स्रोत रहे हैं। ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद भारत ने संतुलन साधते हुए कुछ समय तक तेल आयात जारी रखा, किंतु बाद में अमेरिकी दबाव और वैश्विक वित्तीय तंत्र की जटिलताओं के कारण उसे आयात में कटौती करनी पड़ी।
इराक आज भी भारत के लिए एक महत्वपूर्ण तेल आपूर्तिकर्ता है। यदि क्षेत्र में व्यापक युद्ध छिड़ता है तो तेल की कीमतों में उछाल भारत की अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है। इसलिए भारत की कूटनीति का एक प्रमुख उद्देश्य क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखना और ऊर्जा आपूर्ति में व्यवधान से बचना है।
सामरिक और रक्षा सहयोग
इसराइल आज भारत का एक प्रमुख रक्षा साझेदार है। ड्रोन तकनीक, मिसाइल प्रणाली, साइबर सुरक्षा और खुफिया सहयोग में दोनों देशों के बीच गहरा तालमेल है। कई उन्नत रक्षा प्रणालियाँ भारत ने इसराइल से प्राप्त की हैं। इसलिए भारत इसराइल के साथ अपने सामरिक संबंधों को कमजोर नहीं करना चाहता।
दूसरी ओर, ईरान भारत के लिए अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुँच का एक महत्वपूर्ण मार्ग है। चाबहार बंदरगाह परियोजना के माध्यम से भारत ने पाकिस्तान को दरकिनार कर एक वैकल्पिक संपर्क मार्ग विकसित करने का प्रयास किया है। यदि ईरान के साथ संबंध तनावपूर्ण होते हैं तो यह रणनीतिक परियोजना प्रभावित हो सकती है।
इस प्रकार, भारत को इसराइल के साथ रक्षा सहयोग और ईरान के साथ सामरिक संपर्क के बीच सूक्ष्म संतुलन बनाए रखना पड़ता है।
प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा
पश्चिम एशिया में लगभग 80 लाख से अधिक भारतीय मूल के लोग कार्यरत हैं। इराक युद्ध (2003) के दौरान और बाद में भारत को अपने नागरिकों की सुरक्षित वापसी सुनिश्चित करनी पड़ी थी। किसी भी व्यापक संघर्ष की स्थिति में भारतीय नागरिकों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता बन जाती है। भारत की विदेश नीति में मानवीय आयाम इसलिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
वैश्विक शक्तियों के साथ संतुलन
ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंधों और इसराइल-अमेरिका की घनिष्ठता को देखते हुए भारत को संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ अपने रणनीतिक संबंधों को भी ध्यान में रखना पड़ता है। भारत और अमेरिका के बीच रक्षा, व्यापार और प्रौद्योगिकी सहयोग लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में भारत खुलकर ईरान के पक्ष में नहीं जा सकता, किंतु वह पूर्णतः अमेरिकी रुख का समर्थन भी नहीं करता।
इसके अतिरिक्त, रूस और चीन भी पश्चिम एशिया की राजनीति में सक्रिय हैं। भारत इन सभी शक्तियों के साथ संवाद बनाए रखता है, ताकि किसी एक ध्रुव पर निर्भरता न बढ़े।
संयुक्त राष्ट्र और बहुपक्षीय मंचों पर भूमिका
भारत प्रायः संयुक्त राष्ट्र में संतुलित भाषा का प्रयोग करता है। वह हिंसा की निंदा करता है, नागरिकों की सुरक्षा की अपील करता है और संवाद के माध्यम से समाधान का समर्थन करता है। भारत का यह रुख उसकी वैश्विक छवि को एक जिम्मेदार और शांतिप्रिय शक्ति के रूप में स्थापित करता है।
घरेलू राजनीतिक और सामाजिक आयाम
भारत एक बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक समाज है। पश्चिम एशिया के संघर्षों का प्रभाव घरेलू विमर्श पर भी पड़ता है। सरकार को अपनी विदेश नीति इस प्रकार बनानी होती है कि वह घरेलू सामाजिक सामंजस्य को प्रभावित न करे। इसलिए आधिकारिक बयान प्रायः संतुलित और संयमित होते हैं।
आर्थिक और प्रौद्योगिकीय आयाम
इसराइल के साथ कृषि नवाचार, जल प्रबंधन और स्टार्टअप सहयोग भारत की विकास रणनीति का हिस्सा है। वहीं, ईरान के साथ ऊर्जा, उर्वरक और संपर्क परियोजनाएँ जुड़ी हैं। इराक के पुनर्निर्माण में भी भारतीय कंपनियों की संभावनाएँ रही हैं। युद्ध की स्थिति इन आर्थिक अवसरों को बाधित कर सकती है।
ऐसे में इराक, ईरान और इसराइल के बीच व्यापक युद्ध छिड़ता है, तो भारत की कूटनीतिक रणनीति तत्काल मानवीय सहायता और नागरिकों की निकासी होनी चाहिए। इसके अलावा ऊर्जा आपूर्ति के वैकल्पिक स्रोतों की खोज, सभी पक्षों से संवाद बनाए रखना, बहुपक्षीय मंचों पर युद्धविराम की अपील और आर्थिक झटकों से निपटने के लिए आंतरिक तैयारी करनी चाहिए।
इराक, ईरान और इसराइल के बीच संभावित या वास्तविक संघर्ष की स्थिति में भारत की कूटनीतिक भूमिका अत्यंत जटिल और बहुआयामी है। भारत न तो किसी एक पक्ष के साथ पूर्णतः खड़ा हो सकता है और न ही पूर्ण तटस्थता बरत सकता है। ऊर्जा सुरक्षा, रक्षा सहयोग, प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा, वैश्विक शक्ति संतुलन और घरेलू सामाजिक समरसता—इन सभी कारकों को ध्यान में रखते हुए भारत एक संतुलित, व्यवहारिक और दूरदर्शी नीति अपनाता है।
भारत की विशिष्टता इसी में निहित है कि वह वैचारिक ध्रुवीकरण से बचते हुए संवाद, शांति और स्थिरता को प्राथमिकता देता है। यही संतुलित कूटनीति उसे पश्चिम एशिया के जटिल समीकरणों में एक विश्वसनीय और जिम्मेदार शक्ति के रूप में स्थापित करती है।











