हरियाणा में पुलिस को मिले असीमित अधिकार, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने कहा बढ़ेंगे उत्पीड़न के मामले

Update: 2020-05-22 08:00 GMT

मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि पुलिस के एसएचओ लेबल के अधिकारी तक को असीमित अधिकार मिलना सही नहीं है, इससे लोगों को दिक्कत आ सकती है...

जनज्वार ब्यूरो, चंडीगढ़। हरियाणा सरकार ने एक नोटिफिकेशन जारी कर आपदा प्रबंधन अधिनियम 2005 की धारा 60 (ए) के तहत अब पुलिस स्टेशनों के थाना प्रभारी जो सब - इंस्पेक्टर से नीचे रैंक के नहीं हों, कोर्ट में सीधे शिकायत कर सकते हैं। अब लॉकडाउन तोड़ने वालों के खिलाफ सख्त कार्यवाही की जा सकती है। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि इससे इससे मुकदमे दर्ज कराने की संख्या बढ़ सकती है।

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34 साल पहले फरवरी, 1986 से हरियाणा सरकार द्वारा एक नोटिफिकेशन जारी कर प्रदेश में धारा 188 को गैर-ज़मानती घोषित किया गया जो आज तक हरियाणा में लागू है। हरियाणा में इस धारा के तहत पुलिस बिना वारंट के किसी उलंघनकर्ता को गिरफ़्तार कर सकती है, एवं गैर-ज़मानती अपराध होने के कारण उसकी ज़मानत भी कोर्ट द्वारा ही हो सकती है।

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कानून के जानकार व पंजाब हरियााण के एडवोकेट हेमंत ने बताया कि थाना प्रभारी न्यूतम सब इंस्पेक्टर और अधिकतम इंस्पेक्टर रैंक के पुलिसकर्मी होते हैं, जोकि राजपत्रित (गजटेड) अधिकारी नहीं है, राज्य सरकार को इस सम्बन्ध में या तो ज़िले के अतिरिक्त उपायुक्त(एडीसी) जो इसके लिये अधिकृत करना चाहिये था। क्योंकि एडीसी जिला आपदा प्रबंधन अथॉरिटी का मुख्य कार्यकारी अधिकारी होता है।

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दि यह संभव नहीं है तो जिला स्तर के अधिकारी जैसे जिला राजस्व अधिकारी (डीआरओ) अथवा पुलिस उपाधीक्षक (मुख्यालय) को इस सम्बन्ध में अधिकृत किया जाना चाहिये।

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धारा 188 के संबंध में शिकायतकर्ता या तो सरकारी आदेश जारी करने वाला अधिकारी या उससे उच्च अधिकारी हो सकता है। इसी आधार पर आपदा प्रबंधन कानून में भी वरिष्ठ राजकीय अधिकारी ही शिकायतकर्ता होने चाहिए। मानवाधिकार कार्यकर्ता दीपक शर्मा ने बताया कि इस एसएचओ को काफी पावर मिल जायेगी। इससे आम आदमी को दिक्कत आ सकती है। यह सही नहीं है। इसे लेकर वह जल्दी ही एक अपील दायर करेंगे। उन्होंने बताया कि पहले ही कई जगह पुलिस की ज्यादाती की घटनाएं सामने आयी हैं। सोशल मीडिया पर इस तरह की कई वीडियो देखी जा सकती है।

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Full View बताया कि यह सही है कि इस वक्त आपदा प्रबंधन अधिनियम लागू है। लॉकडाउन का पालना करना जरूरी है, लेकिन फिर भी सभी के न्यूनतम अधिकार तो सुरक्षित रहने की चाहिये। ऐसा न ही हो सकता कि हर किसी के साथ अपराधियों जैसा व्यवहार किया जाये। एडवोकेट हेमंत ने भी बताया कि एचएचओ को यह पावर देना सही नहीं है।

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न्होंने कहा कि इस बारे में सरकार को एक बार फिर से विचार करना चाहिये। यदि संभव हो तो इसमें बदलाव किया जाना चाहिये।

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