बिहार चुनाव 2020

बीजेपी के चुनावी विज्ञापन में सिर्फ मोदी की तस्वीर, नीतीश कुमार क्यों हो गए नदारद, क्या पार्टी ने चेंज कर लिया गेमप्लान?

Janjwar Desk
26 Oct 2020 7:33 PM GMT
बीजेपी के चुनावी विज्ञापन में सिर्फ मोदी की तस्वीर, नीतीश कुमार क्यों हो गए नदारद, क्या पार्टी ने चेंज कर लिया गेमप्लान?
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25 अक्टूबर, रविवार को बिहार के सभी प्रमुख अखबारों में बीजेपी की ओर से पहले पन्ने पर एक पेज का एक रंगीन विज्ञापन प्रकाशित कराया गया। इस विज्ञापन में सिर्फ और सिर्फ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर लगाई गई है, इस विज्ञापन से उन नीतीश कुमार की तस्वीर नदारद है, जो गठबंधन के सीएम रहे हैं और इस चुनाव में भी सीएम फेस हैं.....

जनज्वार ब्यूरो, पटना। बिहार चुनावों में एनडीए की ओर से नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री का चेहरा बनाया गया है। बिहार में साल 2005 से साल 2020 तक साल 2014 के कुछ महीनों को छोड़ लगभग 15 वर्षों से नीतीश कुमार ही सीएम हैं। चुनाव प्रचार के दौरान इन दिनों उनकी कई सभाओं में विरोध के स्वर गूंजे हैं। 15 वर्षों तक शासन करने के कारण ऐंटी इनकंबेंसी फैक्टर तो है ही। अब बीजेपी के चुनावी विज्ञापन से उनका चेहरा भी नदारद हो गया है। इसे लेकर राजनीतिक गलियारों में कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। विपक्ष जहां हमलावर हो गया है, वहीं बीजेपी-जदयू को जबाब देते नहीं बन रहा है।

25 अक्टूबर, रविवार को बिहार के सभी प्रमुख अखबारों में बीजेपी की ओर से पहले पन्ने पर एक पेज का एक रंगीन विज्ञापन प्रकाशित कराया गया। इस विज्ञापन में सिर्फ और सिर्फ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर लगाई गई है। इस विज्ञापन से उन नीतीश कुमार की तस्वीर नदारद है, जो गठबंधन के सीएम रहे हैं और इस चुनाव में भी सीएम फेस हैं। इसे सामान्य बात तो नहीं कहा जा सकता।

विपक्षी महागठबंधन की ओर से इसपर तुरंत प्रतिक्रिया आई। राजद ने इस विज्ञापन की तस्वीर लगाते हुए तंज किया 'बिहार में मुख्यमंत्री चुना जाना है, प्रधानमंत्री नहीं।'


कांग्रेस ने भी इसे लेकर निशाना साधा। पूर्व केंद्रीय मंत्री और पार्टी के वरिष्ठ नेता राजीव शुक्ला ने पटना में चुटकी लेते हुए कहा 'बीजेपी समझ चुकी है कि चुनाव में क्या होनेवाला है। इसीलिए घबराहट में चुनावी विज्ञापन से नीतीश कुमार की तस्वीर हटा रही है। एक तरफ चिराग पासवान नीतीश कुमार को जेल भेजने की बात कह रहे हैं, दूसरी तरफ बीजेपी उनकी तस्वीर ही गायब कर रही है। एनडीए का अंदरूनी कलह चरम पर है।'

उधर बीजेपी और जदयू की ओर से इसपर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है। दोनों दलों के नेता इसपर जबाब देने से बच रहे हैं। अलबत्ता लोजपा अध्यक्ष चिराग पासवान ने इसे लेकर नीतीश कुमार पर निशाना साध दिया है।

चिराग पासवान ने इस विज्ञापन की तस्वीर लगाते हुए ट्वीट कर कहा 'आदरणीय @NitishKumar जी को प्रमाण पत्र की आवश्यकता ख़त्म होती नहीं दिख रही है।@BJP4India के साथीयों का @NitishKumar जी को पुरे पन्ने का विज्ञापन और प्रमाणपत्र देने के लिए शुक्रगुज़ार होना चाहिए और जिस तरीक़े से भाजपा गठबंधन के लिए ईमानदार है वैसे ही नीतीश जी को भी होना चाहिए।'


राजनीतिक विश्लेषक इसे नीतीश कुमार की सभाओं में हो रहे विरोध और उनके विरुद्ध एंटी इनकंबेंसी से जोड़ कर देख रहे हैं। उनका मानना है कि नीतीश कुमार की कई सभाओं में उनके विरोध में नारेबाजी ने बीजेपी को सतर्क कर दिया है। इसलिए अब बीजेपी का गेमप्लान चेंज हो गया है। बीजेपी अब पीएम नरेंद्र मोदी के चेहरे को आगे कर जनता के बीच जाने का मन बना चुकी है।

कई विश्लेषक यह भी मान रहे हैं कि सीएम नीतीश कुमार को भी इस इनकंबेंसी का भान हो चुका है, जिस कारण इस बार उनकी बॉडी लैंग्वेज पहले जैसी नहीं दिख रही। नीतीश कुमार की क्षवि ऐसे नेता की रही है, जो विपक्ष के कटु हमलों का भी सभ्य भाषा में जबाब देता रहा है, पर इस बार के चुनाव प्रचार में ऐसा नहीं दिख रहा। चुनावी सभाओं में अपने संबोधन के दौरान वे कई अवसरों पर आक्रोशित हो चुके हैं। परसा विधानसभा क्षेत्र में चुनावी भाषण के दौरान उन्होंने क्रोधित होकर यहां तक कह दिया कि वोट नहीं देना है तो मत दो। चुनावी सभाओं में उनकी भाषा भी पहले जैसी नहीं दिख रही और एक से ज्यादा अवसरों पर उन्होंने ऐसे शब्दों का इस्तेमाल किया है, जो उनकी अबतक की क्षवि से उलट है।

कोरोना काल में बिहार के प्रवासी मजदूरों की घरवापसी के दौरान सड़कों पर उनकी हुई दुर्गति और वापस आने के बाद यहां रोजगार नहीं मिलने के कारण फिर परदेश जाने को लेकर एक बड़ा तबका नीतीश कुमार को ही जिम्मेदार मानने लगा है, चूंकि 15 वर्षों से उनकी सरकार है। राज्य में उद्योग-धंधे नहीं रहने के कारण लाखों की आबादी पलायन को अभिशप्त है। पूरे कोरोनकाल में यह नाराजगी बढ़ी ही है, चूंकि विपक्ष लगातार यह आरोप लगाता रहा कि वे इस दौरान अपने बंगले में कैद हो गए और बाहर नहीं निकले। बाद में बाढ़ के दौरान भी यही आरोप लगा।

अब इस तरह के विज्ञापन को बीजेपी की ओर से एक तरह की डैमेज कंट्रोल की कोशिश कही जा रही है। चूंकि बीजेपी के थिंक टैंक ने संभवतः यह मान लिया है कि नीतीश कुमार के प्रति ऐंटी इनकंबेंसी की तोड़ सिर्फ और सिर्फ नरेंद्र मोदी का चेहरा ही हो सकता है।

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