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कोविड -19

कितना कारगर होगा मोदी की विफलता पर पर्दा डालने के लिए छेड़ा गया संघ का 'पॉजिटिविटी अनलिमिटेड' अभियान?

Janjwar Desk
23 May 2021 11:24 AM GMT
कितना कारगर होगा मोदी की विफलता पर पर्दा डालने के लिए छेड़ा गया संघ का पॉजिटिविटी अनलिमिटेड अभियान?
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(असीमित सकारात्मकता' की बात से मोदी सरकार की क्रूरता और विफलता को छिपा नहीं सकते सरसंघचालक मोहन भागवत)

आरएसएस और उसके द्वारा निर्देशित सरकार अक्सर कोविड-19 के खिलाफ 'बड़ी लड़ाई' के बारे में बात करती है। लेकिन सच्चाई यह है कि वे इस लड़ाई के दौरान रणनीति बनाने में पूरी तरह विफल रहे हैं। आरएसएस और सरकार उद्योगपतियों के लिए उपजाऊ जमीन उपलब्ध कराने के लिए समान रूप से बाध्य हैं....

वरिष्ठ पत्रकार दिनकर कुमार का विश्लेषण

यह महसूस करने के बाद कि कोविड संकट ने मोदी सरकार की बुनियाद को हिलाना शुरू कर दिया है, भाजपा की मातृ संस्था आरएसएस अपने 'पॉजिटिविटी अनलिमिटेड' अभियान के साथ खुले तौर पर सामने आया है।

आरएसएस को पहले से ही अंदाजा हो गया था कि प्रधानमंत्री की सामान्य लफ्फाजी से इस विफलता के प्रभाव को दूर नहीं किया जा सकता है। गंगा में तैरते मानव शरीर एक संदेश लेकर आए हैं। ये शव संकट के सामाजिक, आर्थिक और आध्यात्मिक आयाम के बारे में बताते हैं जो मोदी सरकार की दोषपूर्ण स्वास्थ्य नीति का नतीजा है।

अन्य क्षेत्रों की तरह मोदी सरकार की नीति कॉर्पोरेट पूंजी के असीम लालच पर आधारित है। इससे उत्पन्न मानवीय निराशा और क्रोध कोई ऐसी भावना नहीं है जिसे सामान्य उपायों से दूर किया जा सके।

कुछ सहज लोगों ने यह अनुमान लगाना शुरू कर दिया है कि संघ परिवार की आंतरिक गतिशीलता में कुछ गंभीरता से बदलाव हुआ है। वे यह भी महसूस करते हैं कि आरएसएस ने मोदी सरकार पर अपनी उम्मीदें खो दी हैं और तदनुसार वे भविष्यवाणी करते हैं कि आरएसएस के समर्थन के अभाव में सरकार स्वतः कमजोर हो गई है, और इसे आसानी से हराया जा सकता है।

हालांकि केवल बहुत भोले लोग ही आरएसएस और भाजपा सहित संघ परिवार के सदस्यों के बीच संबंधों की वास्तविक प्रकृति को नहीं समझ सकते हैं। दरअसल आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत का दखल मोदी सरकार को लोगों के गुस्से से बचाने के लिए है। यह 'बहु भाषण' की रणनीति का स्पष्ट क्रियान्वयन है। अलग-अलग कोनों से, एक ही पंथ के अलग-अलग लोग एक ही विषय पर अलग-अलग बात करते हैं। इस तरह पैदा हुए भ्रम के बीच संघी गिरोह अपने लक्ष्यों को अपने तरीके से आगे बढ़ाएगा।

दूसरी लहर के दौरान नरसंहार मोदी सरकार की अकर्मण्यता के कारण हुआ। हालांकि डॉक्टरों, वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों ने इसके बारे में बार-बार चेतावनी दी थी, लेकिन प्रधानमंत्री और उनकी टीम ने इसे पूरी तरह नजरअंदाज किया। वे कोविड को हराने की शेखी बघारते रहे। मुफ्त सार्वभौमिक टीकाकरण की मांग पर मोदी सरकार ने गौर करना जरूरी नहीं समझा।

जबकि भारत में करोड़ों लोग टीकों की प्रतीक्षा कर रहे थे, मोदी सरकार इसे भारत की तुलना में कम महत्वपूर्ण देशों में निर्यात करने में व्यस्त थी। मोदी सरकार की गुलाम की भूमिका निभा रही गोदी मीडिया प्रधानमंत्री द्वारा शुरू की गई वैक्सीन कूटनीति की महिमा का प्रचार कर रही थी।

मोदी के खेमे के अनुयायी हमेशा गाय के गोबर और मूत्र के औषधीय गुणों का प्रचार करते रहे थे। उनकी प्राथमिकता कुंभ मेला था जहां लाखों लोगों की भीड़ उमड़ी। साथ ही चुनावी रैलियों और रोड शो पर मोदी और उनके अनुयायियों ने ज्यादा ध्यान दिया।

तमाम सार्थक चेतावनियों को नजरअंदाज करते हुए सरकार ने चालाकी से सार्वजनिक क्षेत्र की दवा कंपनियों के पंख काट दिए हैं और फार्मास्युटिकल क्षेत्र में निजी खिलाड़ियों के लिए मैदान तैयार कर दिया है। विशाल निजी उत्पादकों, सीरम इंडिया और भारत बायोटेक ने भारतीय जनता को लूटने के लिए सरकार के साथ मिलीभगत की। मूल्य निर्धारण प्रणाली इतनी हास्यास्पद थी कि एक ही टीका को तीन अलग-अलग मूल्य पैटर्न में बेचा गया।

मोदी सरकार को लोगों के जीवन और स्वास्थ्य की चिंता नहीं, बल्कि निजी कंपनियों के मुनाफे की चिंता है। हाल के दिनों तक यह तथाकथित आत्मनिर्भर सरकार विदेशों में विभिन्न स्रोतों से टीके आयात करने के लिए अनिच्छुक थी। महामारी के प्रसार के साथ-साथ मृत्यु की रिकॉर्ड दर एक गैर-उत्तरदायी सरकार की विफल नीतियों का परिणाम है।

सरकार के मुखिया के तौर पर मोदी ने मौत के तांडव को मूक दर्शक की तरह देखना पसंद किया। उन्होंने व्यावहारिक रूप से लोगों की सुरक्षा के लिए कुछ नहीं किया। उनका नारा 'सब का साथ' एक बार फिर बेमानी साबित हुआ। स्वाभाविक रूप से सरकार ने हमारे समय के सबसे गंभीर संकट को जिस तरह से संभाला, उससे बड़े पैमाने पर लोग निराश और क्रोधित हैं।

केरल, तमिलनाडु और बंगाल में चुनाव परिणाम जनता के बीच बढ़ रहे गुस्से का संकेत है। इसका असर स्वाभाविक रूप से भाजपा के सुरक्षित ढांचे पर भी पड़ेगा। 2014 के बाद पहली बार 'एक राष्ट्र, एक नेता' का सिद्धांत सवालों के घेरे में है।

आरएसएस संकट की जटिलता से अच्छी तरह वाकिफ था। उसने राजनीतिक मामलों में सीधे हस्तक्षेप करने की जरूरत को महसूस किया। उसकी बचाव रणनीति दोहरी थी। पहला लोगों को यह समझाना था कि संघ सरकार की विफलताओं के लिए भी आलोचनात्मक है, और दूसरा लोगों के गुस्से से सरकार को बचाने की कोशिश करना था।

संघ परिवार प्रायोजित कार्यक्रम में मोहन भागवत का बयान "पॉजिटिविटी अनलिमिटेड" राजनीतिक संकट के प्रबंधन में आरएसएस की 'सांस्कृतिक' शैली का एक उदाहरण है। उन्होंने सरकार, प्रशासन और समाज पर कोविड-19 की दूसरी लहर के खिलाफ लड़ाई की तैयारी में लापरवाही बरतने का आरोप लगाया।

उनके शब्दों का विश्लेषण करते हुए कोई भी महसूस कर सकता है कि जनता की दयनीय दुर्दशा के लिए ये तीनों 'अपराधी' समान रूप से जिम्मेदार हैं। आरएसएस में कौन नहीं जानता कि उपरोक्त तीन कारकों के बीच जिम्मेदारी समान रूप से साझा नहीं की जा सकती है? उनमें से कौन यह मानता है कि टीकाकरण नीति की अध्यक्षता करने में सरकार और समाज का समान अधिकार है?

तीनों दोषियों को बराबरी का दर्जा देने के बाद मोहन भागवत ने नसीहत दी कि यह समय एक दूसरे को दोष देने का नहीं है और सभी को एकजुट होने का आह्वान किया। 'राष्ट्रीय गौरव' के विचारक को इस बात की जरा भी चिंता नहीं थी कि लोगों को कितनी बड़ी त्रासदी का सामना करना पड़ रहा है।

आरएसएस और उसके द्वारा निर्देशित सरकार अक्सर कोविड-19 के खिलाफ 'बड़ी लड़ाई' के बारे में बात करती है। लेकिन सच्चाई यह है कि वे इस लड़ाई के दौरान रणनीति बनाने में पूरी तरह विफल रहे हैं। आरएसएस और सरकार उद्योगपतियों के लिए उपजाऊ जमीन उपलब्ध कराने के लिए समान रूप से बाध्य हैं।

कोविड के खिलाफ सरकार की लड़ाई का सार पूंजी के लालच के इर्द-गिर्द केंद्रित है। अब 'असीमित सकारात्मकता' की बात से सरसंघचालक मोदी सरकार की क्रूरता और विफलता को छिपा नहीं सकते। जनता हताश है और वह बदलाव की जरूरत महसूस कर रही है।

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