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उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय में मुन्ना भाई बने प्रोफेसर, विषय विशेषज्ञों ने नकारा लेकिन कुलपति ने स्वीकारा

Janjwar Desk
25 Aug 2021 6:43 AM GMT
उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय में मुन्ना भाई बने प्रोफेसर, विषय विशेषज्ञों ने नकारा लेकिन कुलपति ने स्वीकारा
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(एसोसिएट प्रोफेसर पद की भर्ती के लिए 8 साल असिस्टेंट प्रोफेसर के स्तर का न्यूनतम अनुभव जरूरी है।)

विश्वविद्यालय में एक दशक से ज्यादा वक्त से अस्थाई तौर पर पढ़ा रहे शिक्षकों में भी रोष है कि अगर सहगल जैसों के अनुभवों को जोड़ा जा सकता है तो उन्हें क्यों नहीं एसोसिएट प्रोफेसर पद के काबिल माना गया.....

जनज्वार ब्यूरो, देहरादून। उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के विभिन्न पदों पर हुई भर्ती घोटाले से पर्दा हटता जा रहा है। आरटीआई से मिले दस्तावेजों में कई चौंकाने वाली बातें सामने आ रही हैं। इनमें सबसे ज्यादा सनसनीखेज मामला जंतु विज्ञान में नवनियुक्त एसोसिएट प्रोफेसर प्रवेश कुमार उर्फ पीके सहगल का है। सहगल के दस्तावेज़ों से साफ है कि वे एसोसिएट प्रोफेसर बनने की योग्यता पूरी नहीं करते लेकिन विश्वविद्यालय की मेहरबानी से आज विश्वविद्यालय में जंतु विज्ञान के विभागाध्यक्ष बन बैठे हैं।

एसोसिएट प्रोफेसर पद की भर्ती के लिए आठ साल असिस्टेंट प्रोफेसर के स्तर का न्यूनतम अनुभव जरूरी है। आरटीआई के माध्यम से मिले सहगल के दस्तावेज इस पद पर नियुक्ति के नियमों को खुलेआम ठेंगा दिखाते हैं।

सहगल ने उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले के नेहतौर डिग्री कॉलेज में अक्टूबर 2009 से जनवरी 2015 तक, लगभग 6 साल, प्रवक्ता का अनुभव दिखाया है। हैरानी की बात ये है कि ये अनुभव प्रमाण पत्र अनुभव की अंतिम तारीख़ से करीब तीन साल पहले 13 अगस्त 2012 को जारी किया गया है। इस दस्तावेज में साफ दिखता है कि सहगल ने सर्टिफिकेट में ओवर राइटिंग की है लेकिन वे सर्टिफेकेट के जारी होने की तारीख बदलना भूल गए। (आरटीआई से मिले दस्तावेज की कॉपी संग्लग्न है)।

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इसी तरह सहगल का दूसरा दस्तावेज़ मुक्त विश्वविद्यालय की नियुक्तियों में हुए फर्जीवाड़े की एक और मिसाल पेश करते है। उन्होंने डॉल्फिन (पीजी) इंस्टीट्यूट ऑफ बायोमेडिकल एंड नैचुरल साइंसेज, देहरादून में असिस्टेंट प्रोफेसर के तौर पर तीन साल का अनुभव दिखाया है। इस सिलसिले में उन्होंने 14 सितंबर 2015 को जारी प्रमाण पत्र लगाया है। इसमें साफ लिखा गया है कि वे 2 फरवरी 2015 से सर्टिफिकेट जारी होने की तारीख तक इंस्टीट्यूट में काम कर रहे थे। इस लिहाज़ से उनका अनुभव सिर्फ सात महीने बनता है। इस अनुभव को उन्होंने नियमित और असिस्टेंट प्रोफेसर के ग्रेड पे वाला बताया है।

इसी तरह उन्होंने 13 अक्टूबर 2018 को जारी एक सर्टिफिकेट लगाया है। इसमें साफ लिखा है कि वे इस तारीख से "नितांत अस्थाई और कामचलाऊ व्यवस्था" के तहत टिहरी गढ़वाल ज़िले के गवर्नमेंट डिग्री कॉलेज थत्यूड़ में "योगदान" देंगे। इस अनुभव का कोई दूसरा सर्टिफिकेट नहीं है। उनका आवेदन पत्र फॉरवर्ड करते हुए कॉलेज के प्राचार्य ने उन्हें 'टेम्पोरेरी' और पांच सौ रुपया प्रति लेक्चर के हिसाब से काम करने वाला बताया है। जिसमें वे प्रतिमाह कक्षाओं के आधार पर अधिकतम 25000 रुपया प्राप्त कर सकते हैं।

विषय विशेषज्ञ समिति (स्क्रीनिंग कमेटी) उम्मीदरवारों के आवेदन पत्र में इन्हीं गड़बड़ियों की जांच करने की लिए बनी होती है। और स्क्रीनिंग कमेटी ने सहगल का आवेदन निरस्त कर दिया था। उसके बावजूद एक ग्रीवांस कमेटी बनाकर उनका चयन करवा लेना नियमों का खुला उल्लंघन है। विश्वविद्यालय के नियमानुसार ग्रीवांस कमेटी की कोई वैधानिक व्यवस्था नहीं है। स्क्रीनिंग कमेटी की सिफारिशों की समीक्षा सिर्फ स्क्रीनिंग कमेटी कर सकती है।


विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) रेलेग्यूलेशन- 2018 के मुताबिक एसोसिएट प्रोफेसर बनने के लिए कम से कम आठ साल असिस्टेंट प्रोफेसर या उसके बराबर वेतनमान पर अनुभव जरूरी है। इसमें वे अनुभव नहीं जोड़े जाते हैं जिनका ग्रेड पे या कुल तनख्वाह एक नियमित असिस्टेंट प्रोफेसर से कम होती है। (यूजीसी रेग्यूलेशन-2018 की पृष्ठ संख्या 94 के विंदु 10 f (iii) में स्पष्ट शब्दों में इसका जिक्र किया गया है। सहगल के असिस्टेंट प्रोफेसर स्तर पर आठ साल का अनुभव किस आधार पर मान लिया गया इसकी जांच होने पर विश्वविद्यालय के कुलपति समेत कई लोगों पर गाज गिर सकती है। विश्वविद्यालय में ये चर्चा आम है कि सहगल मोटा पैसा देकर इस पद पर नियुक्त हुए हैं।

सहगल ने आवेदन पत्र में अपने वेतन का कोई प्रमाण नहीं लगा रखा है। और दो अनुभवों में अपना वेतन सिर्फ 25 हजार बता रखा है। ये रकम एक नियमित असिस्टेंट प्रोफेसर के वेतन से बहुत कम है। गेस्ट टीचर को प्रति क्लास के हिसाब से भुगतान किया जाता है। जाहिर है कि उनके प्रमाण पत्र फर्जी हैं और उन्हें किसी भी हालत में असिस्टेंट प्रोफेसर का ग्रेड पे नहीं मिल रहा था। यूजीसी के मुताबिक गेस्ट टीचर का अनुभव किसी लिहाज से एसोसिएट प्रोफेसर के लिए मान्य नहीं है।


प्रवेश कुमार उर्फ पीके सहगल ने 2008 में मेरठ विश्वविद्यालय से पीएचडी की डिग्री हासिल की है। लेकिन उन्होंने इसे अपने प्रार्थनापत्र में 2009 के यूजीसी रेग्यूलेशन के अनुसार बता रखा है। गौरतलब है कि नियम के मुताबिक वही व्यक्ति असिस्टेंट प्रोफेसर के लिए योग्य होगा जिसने या तो राष्ट्रीय दक्षता परीक्षा (नेट) की परीक्षा उत्तीर्ण की हो यो दो हज़ार नौ के रेग्यूलेशन के मुताबिक पीएचडी की हो।

2009 से पहले पीएचडी करने वालों को बाद में यूजीसी रेग्यूलेशन- 2016 में छूट दी गई थी। अगर सहगल असिस्टेंट प्रोफेसर के तौर पर दस साल का अपना अनुभव दिखाते हैं तो वे अपनी पहली नौकरी के वक़्त 2010 में असिस्टेंट प्रोफेसर के योग्य नहीं थे। इस लिहाज़ से सहगल 2016 के बाद ही असिस्टेंट प्रोफेसर के लिए योग्य होने का दावा कर सकते हैं। वो भी कुछ जरूरी शर्तें पूरी करने के बाद। जैसे कि उन्होंने पीएचडी की प्रवेश परीक्षा दी हो या उन्होंने 6 महीने का कोर्स वर्क किया हो। सहगल ये शर्तें भी पूरी नहीं करते। हैरानी की बात ये है कि जो व्यक्ति असिस्टेंट प्रोफेसर बनने के काबिल नहीं उसे एसोसिएट प्रोफेसर बना दिया गया।

सहगल ने अपनी हाईस्कूल और इंटर की परीक्षा उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले के एक इंटर कॉलेज से की है और बीएससी से पीएचडी तक की पढ़ाई सीसीएस मेरठ विश्वविद्यालय से की है। उन्होंने उत्तराखंड में अपना स्थाई निवास प्रमाण पत्र 2015 में बनाया है। बाक़ी दस्तावेज़ों की तरह उनका ये प्रमाण पत्र भी शंकाएं पैदा करता है। गौरतलब है कि उन्होंने अनुसूचित जाति के उम्मीदवार के तौर पर नियुक्ति पायी है और इसके लिए उत्तराखंड के विश्वविद्यालयों में नियुक्ति पाने के लिए यहां का स्थाई निवासी होना ज़रूरी है।

सहगल ने अपने प्रकाशनों की जो लिस्ट लगाई है वे भी संदेहास्पद हैं। एक पेपर उन्होंने यूजीसी मान्यता प्राप्त उस अंतरराष्ट्रीय जर्नल में दिखाया है जिसका वे खुद संपादक होने का दावा करते हैं। फॉर्म में लिखी उनकी अंग्रेज़ी से आभाष होता है कि इस भाषा में उनका हाथ बहुत तंग है लेकिन कई तथाकथित अंतरराष्ट्रीय जर्नल्स में उनके शोध पत्र होने का दावा भी संदेह पैदा करता है। सहगल ने खुद को 13 किताबों का लेखक और एक का सहलेखक बताया है। उन्होंने 8 अंतरराष्ट्रीय और 4 राष्ट्रीय जर्नल्स में शोध पत्र का प्रकाशित का करने का दावा किया है। अगर उनके शोध पत्रों में साहित्य चोरी की जांच की जाए और प्रकाशित जर्नल्स की प्रामाणिकता इकट्ठा की जाये तो और भी कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आ सकते हैं।

विश्वविद्यालय में एक दशक से ज्यादा वक्त से अस्थाई तौर पर पढ़ा रहे शिक्षकों में भी रोष है कि अगर सहगल जैसों के अनुभवों को जोड़ा जा सकता है तो उन्हें क्यों नहीं एसोसिएट प्रोफेसर पद के काबिल माना गया।

जंतु विज्ञान विभाग स्कूल ऑफ साइंसेज के तहत आता है। एक आरटीआई में ये भी पता चला है कि इस चयन प्रक्रिया में स्कूल के निदेशक के तौर पर प्रो पीडी पंत को बिठाया गया था। जबकि वे उस वक़्त तक विश्व विद्यालय में सिर्फ़ परीक्षा नियंत्रक थे और खुद प्रोफेसर पद के उम्मीदवार थे। विश्वविद्यालय में हुई नियुक्तियों में उन पर कुलपति का साथ देने का आरोप लग चुका है। पंत कुमाऊं विश्वविद्यालय से डेपुटेशन पर मुक्त विश्वविद्यालय आये थे लेकिन पांच साल पूरे करने के बाद भी बिना अपने मूल संस्थान की अनुमति के यहीं जमे रहे। बाद में कुलपति की कृपा से उनका चयन प्रोफेसर के पद पर हो गया जबकि उनका विषय भूगर्भ विज्ञान विश्वविद्यालय में पढ़ाया ही नहीं जाता है। गौरतलब है कि कोई भी अस्थाई नियुक्ति वाला व्यक्ति नियुमानुसार किसी स्कूल का निदेशक नहीं हो सकता है।

मुक्त विश्वविद्यालय की नियुक्तियों में गड़बड़ी की सूचना उम्मीदवारों के चयन से पहले कुलाधिपति (राज्यपाल) के पास पहुंच चुकी थी और राज्यपाल ने उत्तराखंड के शिक्षा मंत्रालय से इस मामले का संज्ञान लेने को कहा था। (इस संदर्भ में शिकायती पत्र की कॉपी सूचना के अधिकार के तहत राज्यपाल कार्यालय से प्राप्त की गई है जिसमें कुलपति के चहेते नौ लोगों की नाम इंटरव्यू के सात महीने पहले ही बाहर आ गये थे और आखिरकार उन्हीं लोगों का चयन हुआ)। प्रोफेसर के विभिन्न पदों पर हुई पच्चीस नियुक्तियों को लेकर कुलपति पर आरक्षण के रोस्टर से खिलवाड़ करने का भी आरोप है। और इस सिलसिले में एक केस नैनीताल हाईकोर्ट में चल रहा है। मुक्त विश्वविद्यालय में हुए प्रोफेसरों के भर्ती घोटाले पर से पूरी तरह पर्दा तभी हट सकता है जब इसकी निष्पक्ष न्यायिक जांच हो।

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