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उत्तराखण्ड ओपन यूनिवर्सिटी नियुक्ति महाघोटाला, कुलपति ने इंटरव्यू से 7 माह पहले ही तय कर लिये थे नाम

Janjwar Desk
24 Aug 2021 3:37 PM GMT
उत्तराखण्ड ओपन यूनिवर्सिटी नियुक्ति महाघोटाला, कुलपति ने इंटरव्यू से 7 माह पहले ही तय कर लिये थे नाम
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(उत्तराखण्ड ओपन यूनिवर्सिटी में नियुक्ति महाघोटाले में मंत्री धन सिंह रावत और वीसी ओमप्रकाश सिंह नेगी पर लग रहा चहेतों को बैकडोर एंट्री देने का आरोप)

कुलपति ओमप्रकाश सिंह नेगी पर शिक्षा मंत्री धन सिंह रावत की शह पर प्रोफेसरों की अवैध नियुक्ति करवाने का आरोप लगाया गया है, कहा जा रहा है कि मंत्रियों-अधिकारियों के रिश्तेदारों को बैकडोर से एंट्री करवायी गयी...

जनज्वार ब्यूरो। उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय के कुलपति एक बार फिर भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर घिर गये हैं। आरोप है कि कुलपति ओमप्रकाश सिंह नेगी ने पूर्व में हुई डील के मुताबिक़ उन्हीं लोगों की नियुक्ति प्रोफेसर के विभिन्न पदों पर कर दी, जिनके नामों का ब्यौरा सात महीने पहले कुलाधिपति यानी राज्यपाल के पास पहुंच गया था।

उल्लेखनीय है कि विश्वविद्यालयों में विभिन्न श्रेणी के प्रोफेसरों का चयन राष्ट्रीय स्तर के विज्ञापन के बाद होता है। इसके बावजूद इंटरव्यू से पहले ही चुनिंदा नामों का बाहर आ जाना कई सवाल खड़े करता है। इस मामले की आंच राज्य के शिक्षा मंत्री धन सिंह रावत तक भी पहुंच रही है।

पंतनगर निवासी राजेश कुमार सिंह ने नियुक्तियों में की जा रही गड़बड़ियों को लेकर एक लंबा पत्र जुलाई 2020 में राज्यपाल बेबी रानी मौर्य के पास भेजा था। इस पत्र में असिस्टेंट रीज़नल डायरेक्टर (एआरडी) के आठ पदों पर हुई अवैध नियुक्तियों का जिक्र है और प्रोफेसरों की नियुक्ति के लिए चल रही भ्रष्टाचार की तैयारियों पर रोक लगाने की मांग की गई। राज्यपाल कार्यालय से सूचना के अधिकार के तहत मिले इस पत्र में कई हैरतंगेज खुलासे किए गये हैं। पत्र में कुलपति ओमप्रकाश सिंह नेगी पर शिक्षा मंत्री धन सिंह रावत की शह पर प्रोफेसरों की अवैध नियुक्ति करवाने का आरोप लगाया गया है, कहा जा रहा है कि मंत्रियों-अधिकारियों के रिश्तेदारों को बैकडोर से एंट्री करवायी गयी।

हालांकि इस मामले में सफाई देते हुए शिक्षा मंत्री धन सिंह रावत ने बयान दिया है कि बिना पद और शासनादेश के कर्मचारियों की तैनाती के मसले को दिखवाया जाएगा, ऑडिट रिपोर्ट में तो बहुत सारी चीजें आती हैं, तो कुलपति का कहना है कि सारी नियुक्तियां नियमों के अनुसार की गयी हैं।

राज्यपाल के पास गए शिकायती पत्र में जिन लोगों की अवैध नियुक्ति की पूर्व सूचना दी गई थी, उनमें परीक्षा नियंत्रक प्रो पीडी पंत का नाम सबसे ऊपर है। इसके अलावा आरोप है कि एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर मदन मोहन जोशी (इतिहास), पीआरओ राकेश रयाल (पत्रकारिता), जीतेंद्र पांडे (कम्प्यूटर साइंस), गगन सिंह (कॉमर्स), असिस्टेंट प्रोफ़ेसर के पद पर घनश्याम जोशी (पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन), दीपांकुर जोशी (लॉ), राजेंद्र सिंह (हिंदी), सिद्धार्थ पोखरियाल (एजुकेशन) और मीनाक्षी राणा (फिजिक्स) के नाम की पूर्व सूचना दे दी गई थी। सात महीने बाद सिर्फ मीनाक्षी राणा को चयनित अभ्यर्थियों में प्रतीक्षा सूची में रख दिया गया, जबकि बदले समीकरणों में कुलपति के विद्यार्थी और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने नेता विशाल शर्मा का पहले नंबर पर चयन कर दिया।

आरोप है कि कुलपति ओमप्रकाश सिंह नेगी ने अपने ढाई साल के कार्यकाल में अब तक करीब तीन दर्जन स्थाई नियुक्तियां की हैं। इनमें कोई भी ऐसी नियुक्ति नहीं है जो विवादों से परे हो।

आरोपों के मुताबिक एआरडी की नियुक्तियों में की गई गड़बड़ी से बच निकलने के बाद कुलपति ओम प्रकाश नेगी ने प्रोफ़ेसर के 37 पदों पर नियुक्ति की प्रक्रिया आगे बढ़ाई। भ्रष्टाचार के लिए पूरा होमवर्क करने के बाद ही विज्ञापन निकाला गया। उससे पहले ही अपने उम्मीदवारों की भर्ती को ध्यान में रखकर आरक्षण रोस्टर से खिलवाड़ किया गया, पदों को आरक्षित और अनारक्षित किया गया। पहले से चले आ रहे उत्तराखंड की महिलाओं के लिए घोषित 30 फीसदी आरक्षण को पूरी तरह ख़त्म कर दिया गया, जबकि इससे पहले पुराने कुलपति के कार्यकाल में इन्हीं पदों पर निकले विज्ञापन में महिलाओं का आरक्षण तय था। पत्र में आरक्षण रोस्टर से की गई इस गड़बड़ी का भी विस्तार से ज़िक्र किया गया है।

महिला आरक्षण का मामला मीडिया में आने के बाद राज्य की तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष इंदिरा ह्रदयेश ने मामले को विधानसभा में उठाने की बात कही, लेकिन उनकी असामयिक मौत के बाद ये मामला राजनीतिक तौर पर नहीं उठ पाया। आरक्षण रोस्टर में खिलवाड़ को लेकर अब भी एक केस नैनीताल हाईकोर्ट में लंबित पड़ा है और अपीलकर्ता को मैनेज करने की पूरी कोशिश की जा रही है । राज्य के अधिकांश पत्रकार और मीडिया संगठन सरकार से जुड़ा मामला होने की वजह से इस पर सवाल नहीं उठा रहे हैं।


शिकायत के मुताबिक मुक्त विश्वविद्यालय में भ्रष्टाचार को पूर्व नियोजित तरीके से अंजाम देते हुए सारे नियम-कानूनों की मनमानी व्याख्या की गई और पूर्व डील के मुताबिक अपने चहेतों की नियुक्ति का रास्ता साफ कर दिया गया। विश्वविद्यालय के सीनियर प्रोफेसर कुलपति की इस मनमानी के खिलाफ़ थे।

मुक्त विश्वविद्यालय के एक सीनियर प्रोफेसर ने नाम न बताने की शर्त पर जनज्वार से हुई बातचीत में कहा इससे पहले विश्वविद्यालय में इस स्तर का संगठित भ्रष्टाचार पहले कभी नहीं हुआ। आरक्षण के रोटेशन में सौ फीसदी गड़ब़ड़ी की गई है। एक अन्य अधिकारी ने भी नेगी की कार्यप्रणाली को लेकर असहायता दिखाई।

प्रोफेसरों की नियुक्ति से सात महीने पहले नौ उम्मीदवारों की नियुक्ति की पूर्व सूचना पर राज्यपाल कार्यालय की तरफ़ से राज्य सरकार और विश्वविद्यालय से जवाब भी मांगा गया था, लेकिन फिर मामले की लीपापोती कर आखिरकार 25 पदों पर नियुक्तियां कर दी गईं और सात महीने पहले घोषित नामों का ही बड़ी दबंगई से चयन कर लिया गया। राज्यपाल कार्यालय में संयुक्त सचिव जितेंद्र कुमार सोनकर की तरफ़ से राज्य के उच्च शिक्षा सचिव को शिकायती पत्र कार्रवाई के लिए भेजा गया था।

शिकायती पत्र में अवैध नियुक्तियों को लेकर परीक्षा नियंत्रक प्रो पीडी पंत पर एआरडी की परीक्षा में प्रश्नपत्र आउट करने का आरोप लगाया गया है। कुमाऊं विश्वविद्यालय से डेपुटेशन पर आये पंत ने विश्वविद्यालय में अपनी स्थाई नियुक्ति को लेकर कुलपति का पूरी तरह साथ दिया और आख़िरकार पंत की नियुक्ति भी विश्वविद्यालय में भूगर्भ विज्ञान में प्रोफेसर के पद पर कर दी गई। जबकि ये विषय विश्वविद्यालय में पढ़ाया ही नही जाता। इसके लिए पूर्व में घोषित दूसरे विषय को भूगर्भ विज्ञान में पूरी साजिश के तहत बदल दिया गया। इस काम को अंजाम देने में पीडी पंत पिछले कई साल लगे थे।

कुलपति ने पत्र में पहले से घोषित जिन लोगों की नियुक्ति की है उनके अलावा भी बड़े पैमाने पर बाक़ी लोगों की नियुक्ति में गड़बड़ियों के मामले सामने आये हैं। अधिकांश पदों पर स्क्रीनिंग कमेटी (विषय विशेषज्ञ समिति) ने जिन उम्मीदवारों को अयोग्य घोषित कर दिया था, कुलपति ने मनमाने तरीक़े से साक्षात्कार के लिए बुलाकर उनका चयन करवा लिया। चयन के लिए इंटरव्यू बोर्ड में भी ऐसे ही लोगों को बुलाया गया जो कुलपति के निर्देशों को आसानी से मान जाएं।

मुक्त विश्वविद्यालय के एक अन्य प्रोफेसर के मुताबिक कुलपति ने प्रोफेसरों के पदों पर कई ऐसे लोगों का चयन किया है जो विश्वविद्यालय और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) की पात्रता संबंधी न्यूनतम मान्यताओं को पूरा नहीं करते। कुछ प्रोफेसरों पर उत्तराखंड का फर्जी स्थाई निवास प्रमाणपत्र बनाने का आरोप है तो कुछ पर आर्थिक रूप से कमज़ोर तबके (ईडब्ल्यूएस) का सर्टिफ़िकेट बनाने का।

ऐसे में बड़ा सवाल यह बन रहा है कि अगर इस मामले की निष्पक्ष जांच कई लोगों को सलाखों के पीछे पहुंचा सकती है। आरटीआई से मिले दस्तावेज़ इस मामले में बड़े स्तर के भ्रष्टाचार की तरफ़ इशारा करते हैं।

हालांकि राज्यपाल की तरफ़ से सरकार को जांच के लिए कहे जाने के बाद भी इस मामले में कोई कदम न उठाना मौजदूा सरकार की मिलीभगत को दर्शाता है। उत्तराखण्ड ओपन यूनिवर्सिटी नियुक्ति महाघोटाला सामने आने के बाद आज 24 अगस्त को कांग्रेस ने आवाज उठायी है। युवा कांग्रेस ने मुक्त विश्वविद्यालय के बाहर किया प्रर्दशन कर कहा कहा कि वीसी और मंत्री की मिलीभगत से चहेतों भर्ती किया जा रहा है। उपाध्यक्ष संदीप चमोली नेतृत्व में युवा कांग्रेस के कार्यकर्ता उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय पहुंचे और आरोप लगाया कि एक तरफ उत्तराखण्ड में हर तरफ बेरोजगारी व्याप्त है। यहां का युवा भाजपा की गलत नीतियों के कारण काबिल होने पर भी रोजगार हासिल नहीं कर पा रहा है। वहीं दूसरी तरफ मंत्री अपने रिश्तेदारों को भर्ती कर रहे हैं। इससे प्रदेश के युवा का मनोबल निरंतर गिर रहा है।

युवा कांग्रेस ने मांग की कि मामले की इस मामले जांच हाईकोर्ट की ओर से बनाई गई एसआइटी से कराई जाए। इसके अलावा नैतिकता के आधार पर तत्काल प्रभाव से कुलपति और उच्च शिक्षा मंत्री डॉ. धन सिंह रावत को उनके पद से बर्खास्त किया जाये।

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