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कर्नाटक : बगैर ट्रायल के 8 सालों से जेल में बंद हैं 27 आरोपी, बीजेपी हेडक्वार्टर के बाहर हुआ था बम ब्लास्ट

Janjwar Desk
24 Jun 2021 5:06 AM GMT
कर्नाटक : बगैर ट्रायल के 8 सालों से जेल में बंद हैं 27 आरोपी, बीजेपी हेडक्वार्टर के बाहर हुआ था बम ब्लास्ट
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बैंगलुरू बम ब्लास्ट केस में पिछले 8 साल से बिना जुर्म साबित हुए बंद हैं 27 आरोपी (photo : social media)

यूएपीए के तहत 2013 से 2016 के बीच क्राइम ब्रांच ने 27 आरोपियों को गिरफ्तार किया, लेकिन बीते आठ सालों में इन पर आरोप तय नहीं हुए, ऐसे में कोर्ट में केस कैसे चले और कैसे तय हो कि ये दोषी हैं या निर्दोष

बेंगलुरू। कहते हैं Justice delayed is justice denied। कुछ ऐसा ही मामला नजर आ रहा है। कर्नाटक में, जहां बीते 8 सालों से 27 आरोपी जेल में यूएपीए (unlawful activities prevention amendment act) के तहत बंद हैं। बड़ी बात ये है कि आठ सालों में इन पर आरोप तक तय नहीं हुए हैं।

इन सभी को 2013 में कर्नाटक की राजधानी बेंगलूरु स्थित बीजेपी मुख्यालय के बाहर हुए बम धमाके के केस में गिरफ्तार किया गया है। बहरहाल इनके वकील और राज्य के जाने माने लॉयर बालचंद्रन बालन का कहना है कि ये सब जान-बूझकर किया जा रहा है। ताकि आरोपी खुद से अपना गुनाह कबूल कर लें।

बगैर ट्रायल के 8 सालों से काट रहे सजा

पिछले 8 सालों से 27 आरोपी कर्नाटक की जेलों में यूएपीए के तहत बंद हैं। बड़ी बात ये है कि इनका अब तक ट्रायल शुरू हुआ नहीं हुआ है। ये पूरा मामला 2013 में बीजेपी दफ्तर के बाहर हुए धमाके से जुड़ा हुआ है। 2013 से 2016 के बीच कर्नाटक की क्राइम ब्रांच ने इन आरोपियों को यूएपीए के तहत गिरफ्तार किया, लेकिन इतने सालों बाद भी इन पर आरोप तय नहीं हुए हैं, अब जब आरोप ही तय नहीं हुए हैं तो कोर्ट में केस कैसे चले और कैसे ये साबित हो कि पकड़े गये आरोपी दोषी हैं या निर्दोष।

ऐसा ही एक और मामला सामने आय़ा है, जहां 2008 में बेंगलूरु में हुए सीरियल ब्लास्ट के आरोप में एक शख्स को गिरफ्तार किया गया। 11 सालों बाद भी इस आरोपी पर आरोप तय नहीं किये गये हैं। इसे भी गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम कानून अधिनियम के तहत गिरफ्तार किया गया है। जिसमें ट्रायल तय करने की समय सीमा ही नहीं है।

क्या कहते हैं जानकार

पूरे मामले को लेकर क्रिमिनल लॉयर और हाईकोर्ट में सीनियर वकील बालचंद्रन बालन का कहना है कि ये सब जान-बूझकर किया जा रहा है। क्योंकि इस ब्लास्ट में किसी की मौत नहीं हुई थी, और यूएपीए के तहत 7-10 सालों की अधिकतम सजा हो सकती है।

ऐसे में आठ साल बीत चुके हैं, तो अगर आरोपी खुद ही अपना गुनाह कबुल कर लेते हैं तो जांच एजेंसी की कार्यशैली पर सवाल भी नहीं उठेगा। उनके अनुसार समाज के पिछड़े, दलित, अल्पसंख्यकों के खिलाफ इस तरह की कार्रवाई जान बूझकर की जाती है।

अधिवक्ता अकमल रिजवी की मानें तो यूएपीए अधिनियम राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा है, लेकिन आज की तारीख में इसका राजनीतिक इस्तेमाल खूब होता है।

गौरतलब है कि 17 अप्रैल 2013 को कर्नाटक की राजधानी बंगलुरू एक धमाके से दहल गई थी। ये धमाका सुबह करीब 11 बजे हुआ था। बीजेपी के मुख्यालय के बाहर ब्लास्ट हुआ था। जिसमें 16 पुलिसवालों समेत 18 लोग जख्मी हो गए थे। इस धमाके में मोटरसाइकिल का इस्तेमाल किया गया था। ब्लास्ट इतना जोरदार था कि आसपास की कई गाड़ियों में आग लग गई थी। तब सुरक्षा एजेंसियों ने इसके पीछे आतंकी संगठन इंडियन मुजाहिद्दीन का हाथ बताया था।

हमारे देश में यूएपीए के तहत गिरफ्तारियों का इतिहास पुराना है और हमारी सरकारें भी इस बात को स्वीकारती हैं। 2020 में केंद्र सरकार की ओर से संसद में जानकारी दी गई कि साल 2016 से 2018 के बीच गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के तहत कुल 3,005 मामले दर्ज किए गए और इसके तहत 3,974 लोगों को गिरफ्तार किया गया था। यानी जिस तरह से बिना जुर्म साबित हुए बैंग्लुरू बम ब्लास्ट 2013 के लिए पिछले 8 साल से 27 लोग जेल की सींखचों के पीछे हैं, उसी तरह के मामले सैकड़ों लोग झेल रहे होंगे।

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