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महाराष्ट्र सरकार ने मुसलमानों की हैसियत जानने के लिए सर्वे कराने का लिया फैसला, TISS को सौंपी जिम्मेदारी

Janjwar Desk
23 Sep 2022 4:58 AM GMT
महाराष्ट्र सरकार ने मुसलमानों की हैसियत जानने के लिए सर्वे कराने का लिया फैसला, TISS को सौंपी जिम्मेदारी
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महाराष्ट्र सरकार ने मुसलमानों की हैसियत जानने के लिए सर्वे कराने का लिया फैसला, TISS को सौंपी जिम्मेदारी

महाराष्ट्र सरकार के प्रस्ताव के मुताबिक टिस ( TISS ) मुस्लिम समुदाय की सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक, स्वास्थ्य, रोजगार, आवास, ऋणों तक पहुंच और बुनियादी ढांचे की नीतियों के प्रभाव का अध्ययन करेगा।

मुंबई। महाराष्ट्र सरकार ( Maharashtra government ) ने एक बड़ा फैसला लिया है। इस फैसले के तहत भाजपा-शिवसेना शिंदे गुट गठबंधन सरकार के तहत संचालित अल्पसंख्यक विकास विभाग ने प्रदेश में रहने वाले मुसलमानों की सामाजिक-आिर्थिक ( Muslim Community status ) हैसियत जानने के लिए एक सर्वे ( Survey ) कराने का फैसला लिया है। इसका मकसद अल्पसंख्यक समुदायों ( Minority community ) के लोगों की हकीकत को जानना है। साथ ही अल्पसंख्यक समुदायों की स्थिति को बेहतर करने के लिए सर्वे रिपोर्ट के अनुरूप ही नीतियों पर अमल भी किया जाएगा। प्रदेश सरकार ने सर्वे की जिम्मेदारी टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस ( Tata institute of social science ) को सौंपी है। इसके लिए 33 लाख रुपए का अनुदान भी जारी किया गया है।

टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज ( TISS ) को महाराष्ट्र ( Maharashtra ) के 56 शहरों में मुस्लिम समुदाय के सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक विकास पर एक अध्ययन करने के लिए कहा गया है। बता दें के महाराष्ट्र के इन शहरों में मुस्लिम आबादी काफी संख्या में है।

टिस ( TISS ) मुस्लिम समुदाय ( Muslim community ) की सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक स्थिति का विश्लेषण करेगा। सरकारी प्रस्ताव के अनुसार टिस मुस्लिम समुदाय पर राज्य की शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, आवास, ऋण पहुंच और बुनियादी ढांचे की नीतियों के प्रभाव का भी अध्ययन करेगा।

महमूद उर रहमान समिति के बाद यह मुस्लिम समुदाय पर पहला प्रदेश स्तरीय अध्ययन होगा जिसे 2008 में तत्कालीन कांग्रेस.एनसीपी सरकार द्वारा सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी महमूद उर रहमान के तहत स्थापित किया गया था। रहमान समिति का मकसद भी मुसलमानों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति का आकलन करना था।

महमूद उर रहमान समिति ने सर्वे का काम पांच साल में पूरा किया था। रहमान समिति ने महाराष्ट्र में मुसलमानों की सामाजिक आर्थिक स्थिति की निराशाजनक तस्वीर पेश की थी। 2013 में सौंपी गई रिपोर्ट में कहा गया था कि महाराष्ट्र में करीब 60 फीसदी मुसलमान गरीबी रेखा से नीचे हैं। सरकारी नौकरियों में उनकी हिस्सेदारी केवल 4.4 प्रतिशत थी। समुदाय में स्नातकों की कुल संख्या केवल 2.2 प्रतिशत थी। इसने राज्य, शिक्षा और आवास, सार्वजनिक और निजी दोनों में आठ प्रतिशत आरक्षण की सिफारिश की थी और कहा था कि आरक्षण की सिफारिश समुदाय के एक बड़े वर्ग की पीड़ा को कम करने का जरिया साबित होगां

महमूद उर रहमान समिति की रिपोर्ट के आधार पर 2014 में तत्कालीन कांग्रेस-एनसीपी सरकार ने सरकारी स्कूलों, कॉलेजों और नौकरियों में मुसलमानों के लिए पांच प्रतिशत आरक्षण की घोषणा की थी। इस फैसले को बॉम्बे हाई कोर्ट में चुनौती दी गई और तब राज्य में बीजेपी के सत्ता में आने के साथ सरकार में बदलाव देखा गया।

बंबई उच्च न्यायालय ने 14 नवंबर को अपने फैसले में नौकरियों में पांच प्रतिशत आरक्षण खंड को हटा दिया लेकिन कहा कि मुसलमानों को शिक्षा में पांच प्रतिशत आरक्षण मिलना चाहिए। 2014 में सत्ता में आई भाजपा सरकार ने यह कहते हुए आरक्षण को लागू करने के लिए कानूनी कदम नहीं उठाए कि वह धर्म के आधार पर आरक्षण का समर्थन नहीं करती है।

भाजपा-शिवसेना शिंदे गुट गठबंधन सरकार को अपने ताजा फैसले से उम्मीद है कि नया अध्ययन मुस्लिम समुदाय को उसकी सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक स्थितियों का अध्ययन करके मुख्यधारा में लाने के लिए सिफारिशें प्रदान करेगा। यह अध्ययन राज्य के छह राजस्व संभागों के 56 शहरों में किया जाएगा जहां मुस्लिम आबादी अच्छी खासी है। रिपोर्ट को पूरा करने के लिए ैसाक्षात्कार और समूह चर्चा आयोजित करेगा। रिपोर्ट चार महीने में पूरी होने की उम्मीद है।

सरकार के इस फैसले के बाद से मुस्लिम समुदायों की हैसियत को सियासी चर्चा में ला दिया है। इस मामले से जुड़े अधिकारियों ने कहा कि जीआर जारी कर दिया गया है लेकिन परियोजना को लागू करने पर अंतिम फैसला महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे करेंगे। बता दें कि सीएम शिंदे के पास ही अल्पसंख्यक विकास विभाग की कमान है।

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