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विदेशों से आ रही मदद कोरोना पीड़ितों तक पहुंचने नहीं दे रही है मोदी सरकार!

Janjwar Desk
6 May 2021 2:57 AM GMT
विदेशों से आ रही मदद कोरोना पीड़ितों तक पहुंचने नहीं दे रही है मोदी सरकार!
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मोदी सरकार ने कोरोना महामारी को दूसरी लहर के दौरान नरसंहार में तब्दील कर दिया

अमेरिका से क्रिटिकल केयर में इस्तेमाल होने वाले उपकरणों की कई खेप मदद के लिए भारत भेजी गई है, लेकिन कहा जा रहा है कि ज्यादातर सामान गोदाम या एयरपोर्ट पर ही पड़ा है....

दिनकर कुमार की रिपोर्ट

जनज्वार। कोविड त्रासदी की भयावहता ने केंद्र की मोदी सरकार को 16 साल बाद पहली बार विदेशी मदद लेने पर मजबूर कर दिया, लेकिन इसे लेकर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। पहले सरकार ने विदेशी मदद स्वीकार करने पर स्पष्टीकरण दिया था और कहा था कि भारत ने भी पूरी दुनिया को मदद की है इसलिए मदद लेने में कोई हर्ज नहीं है। लेकिन अब सवाल उठ रहे हैं कि भारत में विदेशी मदद कई देशों से आ रही है तो ये मदद जा कहाँ रही है?

अदालतें मोदी सरकार पर नरसंहार करने का आरोप लगा रही हैं, जो कोरोना पीड़ितों की जान बचाने के लिए ऑक्सीज़न, दवा, अस्पताल आदि मुहैया करवाने में पूरी तरह विफल रही है। अब जब दुनियाभर के देश मदद भेज रहे हैं तो उसे भी लोगों तक पहुंचने नहीं दे रही है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक अब तक दिल्ली एयरपोर्ट पर ही 25 से ज्यादा फ्लाइट्स विदेशी मदद लेकर आई हैं। जिनमें 5500 ऑक्सीजन कंसंट्रेटर्स, 3200 ऑक्सीजन सिलेंडर और एक लाख 36 हजार रेमडेसिविर के इंजेक्शन भारत को मिल चुके हैं। लेकिन सवाल यह है कि विदेशों से मेडिकल इमरजेंसी के तौर पर आ रही यह मदद किन-किन राज्यों को और कब पहुंचाई गई?

भारत में मेडिकल मदद का पहला कंसाइनमेंट 25 अप्रैल को पहुंचा था। उसके बाद मेडिकल ऑक्सीजन और लाइफ सेविंग ड्रग्स लगातार भारत पहुंच रहे हैं। कायदे में आपात स्थिति को देखते हुए पहले दिन से ही इन सामानों का वितरण जरूरत वाले राज्यों को पहुंच जाना चाहिए था, लेकिन केंद्र सरकार को इस बारे में एसओपी बनाने में ही सात दिन लग गए कि कैसे राज्यों और अस्पतालों में इसका वितरण किया जाए।

इस मामले में नौकरशाही किस तरह काम कर रही है इसे इस तरह समझा जा सकता है। विदेश से आ रही मेडिकल मदद को रिसीव करने के लिए नोडल मिनिस्टरी विदेश मंत्रालय है, जबकि राज्यों और अस्पतालों में इस मदद को बांटने का स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर, यानी एसओपी स्वास्थ्य मंत्रालय को बनाना था। 25 अप्रैल को पहली खेप आई और उसके वितरण के नियम स्वास्थ्य मंत्रालय ने 2 मई को जारी किए। यानी एक हफ्ते तक आई मेडिकल मदद एयरपोर्ट, बंदरगाहों पर यूं ही पड़ी रही, जबकि अगर आमद के साथ ही यह राज्यों में पहुंचना शुरू हो जाती तो कई मरीजों की जान बचाई जा सकती थी।

अमेरिका से क्रिटिकल केयर में इस्तेमाल होने वाले उपकरणों की कई खेप मदद के लिए भारत भेजी गई है, लेकिन कहा जा रहा है कि ज्यादातर सामान गोदाम या एयरपोर्ट पर ही पड़ा है।

भारत सरकार विदेशों से आ रही मेडिकल मदद रेडक्रॉस सोसायटी के जरिए ले रही है, जो एनजीओ है। मेडिकल सप्लाई राज्यों तक न पहुंच पाने के सवाल पर रेडक्रॉस सोसायटी के प्रबंधन का कहना है कि उसका काम सिर्फ मदद कस्टम क्लीयरेंस से निकाल कर सरकारी कंपनी एचएलएल (एचएलएल) को सौंप देना है। वहीं एचएलएल का कहना है कि उसका काम केवल मदद की देखभाल करना है। मदद कैसे बांटी जाएगी, इसका फैसला केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय करेगा। स्वास्थ्य मंत्रालय इस बारे में चुप्पी साधे हुए है।

कई कंसाइनमेंट अब भी कस्टम में उलझे हुए हैं। देश के कई बड़े अस्पतालों ने अपने स्तर पर मेडिकल जरूरत की कुछ चीजें मंगाई हैं, लेकिन उन्हें भी आसानी से कस्टम क्लीयरेंस नहीं मिल रहा है। सूत्रों के मुताबिक एचएलएल को इस मदद की देखरेख का जिम्मा दिया गया है। एयरपोर्ट के आसपास बनाए गए गोदामों में बहुत सारे मेडिकल उपकरण यूं ही पड़े हैं।

देश के कई राज्यों में ऑक्सीजन और उसके इस्तेमाल से जुड़े उपकरणों को लेकर हाहाकार मचा है, लेकिन छत्तीसगढ़, तमिलनाडु, झारखंड जैसे राज्यों का कहना है कि उन्हें विदेश से आई मदद के नाम पर अभी तक कुछ नहीं मिला है। भाजपा शासित राज्यों में भी अभी मदद नहीं पहुंची हैं, लेकिन वहां इस बारे में कोई बात नहीं करता।

हालांकि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय का इस पर कुछ और ही कहना है। मंत्रालय ने अपने एक बयान में कहा है कि विदेश से अब तक करीब 40 लाख आइटम्स आए हैं। इनमें दवाओं समेत तमाम मेडिकल इक्विपमेंट्स भी शामिल हैं। ये जो सामान आए हैं इनमें से ऑक्सीजन सिलेंडर और कुछ जीवनरक्षक दवाएं 38 इंस्टीट्यूसंस और अस्पतालों को दी गई हैं, लेकिन द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, इनमें से ज्यादातर अस्पताल वे हैं जिन्हें केंद्र सरकार संचालित करती है।

ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के अध्यक्ष और हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने मंगलवार को ट्वीट कर पूछा था कि भारत में अब तक 300 टन विदेशी मदद आ चुकी है लेकिन प्रधानमंत्री कार्यालय नहीं बता रहा है कि इनका क्या हुआ? ओवैसी ने पूछा था कि 'नौकरशाही ड्रामे के कारण कितनी जीवन रक्षक विदेशी मदद गोदामों में पड़ी है?'

विदेशी मीडिया में भी भारत आ रही विदेशी मदद को लेकर सवाल उठ रहे थे। ऐसा इसलिए क्योंकि भारत के अस्पतालों में कोविड मरीज़ों की दिक़्क़तों में अभी कोई ठोस कमी नहीं आई है। ये सवाल केवल भारत के भीतर ही नहीं उठ रहा है बल्कि मंगलवार 4 मई को अमेरिकी विदेश मंत्रालय से भी पूछा गया।

चार मई को अमेरिकी विदेश मंत्रालय की नियमित प्रेस कॉन्फ़्रेंस में मंत्रालय की प्रवक्ता जैलिना पोर्टर से पूछा गया, 'आपने कहा कि अमेरिका से भारत के लिए लगातार मदद भेजी जा रही है। इसकी लंबी लिस्ट भी बताई गई। आपने ये भी कहा कि यूएसए एड इंडिया आपूर्ति भेजने की निगरानी कर रहा है। भारत में यूएसए एड का बड़ा ऑफिस भी है। ये सामान कहाँ जा रहे हैं, क्या इसकी कोई निगरानी की जा रही है? भारत के पत्रकारों का कहना है कि लोगों तक मदद नहीं पहुँच रही है।'

इस सवाल के जवाब में जैलिना पोर्टर ने कहा, 'मैं फिर से यही बात दोहाराऊंगी कि अमेरिका ने 10 करोड़ डॉलर की मदद अब तक भारत पहुँचा दी है। यह मदद अमेरिकी एजेंसी के ज़रिए पहुँचाई गई है। इंडियन रेड क्रॉस को भारत सरकार के अनुरोध पर ये आपूर्ति दी गई है, ताकि ज़रूरतमंदों तक ज़रूरी सामान पहुँचाया जा सके। इस मामले में अब आपको भारत सरकार से पूछना चाहिए।'

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