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UKSSSC Bharti Scam के बाद विधानसभा में हुई भर्तियों का मामला सुर्खियों में, चहेतों को रोजगार देने की फैक्ट्री बनी विधानसभा में 70 विधायकों पर 560 कार्मिकों की फौज तैनात

Janjwar Desk
28 Aug 2022 10:59 AM GMT
UKSSSC Bharti Scam के बाद विधानसभा में हुई भर्तियों का मामला सुर्खियों में, चहेतों को रोजगार देने की फैक्ट्री बनी विधानसभा में 70 विधायकों पर 560 कार्मिकों की फौज तैनात
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UKSSSC Bharti Scam के बाद विधानसभा में हुई भर्तियों का मामला सुर्खियों में, चहेतों को रोजगार देने की फैक्ट्री बनी विधानसभा में 70 विधायकों पर 560 कार्मिकों की फौज तैनात

Vidhansabha Bharti Ghotala Uttarakhand : उत्तराखंड में प्रति विधायक आठ कार्मिकों का औसत है, कार्मिकों की इतनी बड़ी फौज होने के बाद भी विधानसभा चलने का सालाना औसत एक पखवाड़े से अधिक का नहीं है, जबकि देश की सबसे बड़ी विधानसभा उत्तर प्रदेश की बात करें तो यहां सदस्यों की संख्या 405 है, कुल कार्मिकों की संख्या 543....

Vidhansabha Bharti Ghotala Uttarakhand : उत्तराखंड में सरकारी नौकरियों के प्रश्न पत्र लीक होने सहित कई और भर्तियों में घपले उजागर होने के बाद उत्तराखंड विधानसभा में हुई तमाम भर्तियां भी सवालों के घेरे में आ गई हैं। उत्तराखंड प्रदेश की तदर्थ विधानसभा सहित चारों निर्वाचित विधानसभाओं में खुले हाथों से हुई इन भर्तियों में भाजपा-कांग्रेस दोनों के ही नेताओं के दामन पर भ्रष्टाचार के छींटे पड़ रहे हैं। इन भर्तियों को लेकर विपक्ष अब सरकार पर हमलावर हो रहा है। फिलहाल उत्तराखंड विधानसभा की करीब 73 लोगों की तदर्थ भर्तियां भी विवादों में आ गई हैं। इन भर्तियों की जांच की मांग के साथ ही नियुक्ति पाने वालों के नामों की सूची सोशल मीडिया पर वायरल हो गई। विधानसभा सचिवालय में नियुक्ति पाने वालों में सत्ता पक्ष और विपक्ष से जुड़े लोगों के साथ ही कई पत्रकारों से जुड़े लोग शामिल हैं।

सभी सरकारों के कार्यकाल में युवाओं से हुआ धोखा

नियम-कायदों को ताक पर रखकर पिछले दरवाजे से सिफारिशों पर लोगों को नौकरियां देने का सिलसिला किसी एक सरकार के कार्यकाल में नहीं, बल्कि अब तक की सभी चार निर्वाचित सरकारों के कार्यकाल में समान रूप से हुआ। कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष व वरिष्ठ विधायक प्रीतम सिंह ने उत्तराखंड विधानसभा के राज्य गठन से लेकर अब तक जितनी भी भर्तियां हुई हैं, सभी की जांच की मांग की है। अंतरिम सरकार के पहले विधानसभा अध्यक्ष प्रकाश पंत और उनके बाद की सरकारों में स्पीकर रहे यशपाल आर्य, हरबंस कपूर, गोविंद सिंह कुंजवाल और प्रेमचंद अग्रवाल के कार्यकाल में हुई भर्तियां किसी न किसी वजह से विवादों में रही हैं। इन भर्तियों में सिफारिशों के आधार पर अपने चहेतों को नौकरी दिए जाने का आरोप लगते रहे हैं।

तीसरी विधानसभा में तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष व गांधीवादी नेता गोविंद सिंह कुंजवाल तक के कार्यकाल में हुई विधानसभा की 158 भर्तियों पर भी विवाद पैदा हो रहा है। तमाम नियमों-कायदों को ताक पर रख कर राजनेताओं के करीबियों और चहेतों को केवल एक ऐसे आवेदन को आधार बनाकर नौकरियां दे दी गईं, जिन आवेदनों को देखकर ही आवेदनकर्ताओं की योग्यता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

तमाम नियमों-कायदों को ताक पर रख कर राजनेताओं के करीबियों और चहेतों को केवल एक ऐसे आवेदन को आधार बनाकर नौकरियां दे दी गईं, जिन आवेदनों को देखकर ही आवेदनकर्ताओं की योग्यता पर सवाल खड़े हो रहे हैं

129 भर्तियां हुई चौथी विधानसभा में

जिस चौथी विधानसभा में भारतीय जनता पार्टी ने तीन मुख्यमंत्री देकर कीर्तिमान स्थापित किया था, इस विधानसभा के कार्यकाल में कुल 129 नियुक्तियां दी गई थीं। तीन चरण में हुई इन भर्तियों में पहले चरण में 72, दूसरे चरण में 25 तथा तीसरे चरण में 32 लोगों को भर्ती किया गया था।

कांग्रेस हुई हमलावर तो भाजपाई बन रहे हैं अनजान

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष करन माहरा ने तो बाकायदा उन नेताओं के नाम लिए हैं, जिनके नजदीकी लोगों को विधानसभा में नौकरी पर रखा गया। कांग्रेस का आरोप है कि भर्ती के नाम पर हजारों अभ्यर्थियों से आवेदन मांगे गए, लेकिन वह भर्ती परीक्षा आयोजित नहीं हुई। उलटे पिछले दरवाजे से मंत्रियों, सत्तारूढ़ दल के वरिष्ठ नेताओं के करीबियों को नौकरियों पर रख लिया गया।

पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के मुताबिक जब वह मुख्यमंत्री थे तो उनके पास विधानसभा की भर्ती की फाइल आई थी तो उन्होंने भर्तियां आयोग के माध्यम से करने के लिए कहा था। ऐसे में जिन भर्तियों पर सवाल उठ रहे हैं, उन्हें मालूम नहीं कि वह कैसे हुई। त्रिवेंद्र के कार्यकाल में ही विधानसभा में करीब 73 पदों पर तदर्थ आधार पर भर्तियां की गई थीं। उन्होंने विधानसभा को सर्वोच्च सदन बताते हुए वहां पारदर्शिता की बात करते हुए कहा है कि विधानसभा की भर्तियों में क्या हुआ, कैसे हुआ, ये मेरे संज्ञान में नहीं है। मौजूदा वित्त मंत्री व पूर्व विधानसभा अध्यक्ष प्रेमचंद अग्रवाल का अपने कार्यकाल की भर्तियों को लेकर कहना है उनके कार्यकाल में जो भर्तियां विधानसभा में हुई थीं, उन्हें पहले हाईकोर्ट नैनीताल और फिर सुप्रीम कोर्ट भी वैध करार दे चुका है।

उत्तराखंड में 70 विधायकों की विधानसभा में 560 तो यूपी के 405 विधायकों की विधानसभा में 543 हैं कार्मिक

उत्तराखंड की विधानसभा नेताओं के चहेतों को सिफारिशी चिट्ठी के आधार पर रोजगार दिए जाने की फैक्ट्री बनी हुई है। विधानसभा में सदस्य केवल 70 हैं तो कार्मिकों की संख्या 560 है। मतलब उत्तराखंड में प्रति विधायक आठ कार्मिकों का औसत है। कार्मिकों की इतनी बड़ी फौज होने के बाद भी विधानसभा चलने का सालाना औसत एक पखवाड़े से अधिक का नहीं है, जबकि देश की सबसे बड़ी विधानसभा उत्तर प्रदेश की बात करें तो यहां सदस्यों की संख्या 405 है। जबकि कुल कार्मिकों की संख्या 543 है। यहां प्रति विधायक सवा कार्मिक का औसत है। कार्यकाल की बात करें तो यूपी विधानसभा में सालाना साठ-सत्तर दिन काम का औसत है। ऐसे में यह समझना कोई मुश्किल काम नहीं है कि उत्तराखंड विधानसभा विधानसभा में कार्मिकों की इतनी बड़ी फौज आखिर खड़ी क्यों की गई होगी।

विपक्ष की भूमिका पर सवाल उठाने से आहत हैं रणजीत रावत

दूसरी ओर भर्ती घोटाले के उजागर होने के बाद भी जनता में कोई हलचल न होने पर खफा पूर्व विधायक रणजीत सिंह रावत का कहना है कि अशासकीय विद्यालयों में अध्यापकों की भर्ती को भी जोड़ लिया जाये तो यह भ्रष्टाचार मध्य प्रदेश के व्यापम से भी कई गुना बड़ा निकलेगा। भाजपा और संघ द्वारा जिस राज्य में उनकी सरकारें है, वहाँ व्यापम मॉडल से भ्रष्टाचार कर युवाओं के हक़ों को बाक़ायदा बेचा गया है, जिसकी जड़ें अंतिम रूप से भाजपा के नेताओ और संघ से जुड़ती है। वर्तमान में एसटीएफ की जाँच केवल छोटी-छोटी मछलियों को पकड़ सकती है, लेकिन बड़े-बड़े नामों को बचाने का खेल जारी रहेगा।

विधानसभा भर्तियों में भ्रष्टाचार अब सवाल यह है की इतना बड़ा घोटाला विपक्ष और यूकेएसएसएससी अभ्यर्थी युवाओं ने उजागर कर दिया है जनता कहा है? जबकि लोगों को इस समय विपक्ष के साथ मिलकर सड़कों पर होना चाहिए था जिससे सीबीआई जाँच हो ? चौथी विधानसभा से ठीक पहले क़रीब 129 भर्तियाँ उत्तराखंड विधानसभा में पिछले दरवाजे से हो गईं। कुम्भ से लेकर कोविड तक के भ्रष्टाचार के बावजूद 2022 के चुनाव में जनता भाजपा के साथ खड़ी रही। लेकिन सवाल विपक्ष पर उठाए जा रहे थे कि वह क्या रहा है, जबकि सवाल तो यह होना चाहिए कि इसके बाद भी जनता कहां है? क्या फेसबुक पर ही कमेंट करने से लोगों की जिम्मदारियों की इतिश्री हो जाती है?

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