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उत्तराखण्ड : चुनावी साल में एक के बाद एक हो रहे कर्मचारियों के आंदोलन से सांसत में पड़ती धामी सरकार

Janjwar Desk
27 July 2021 8:44 AM GMT
उत्तराखण्ड : चुनावी साल में एक के बाद एक हो रहे कर्मचारियों के आंदोलन से सांसत में पड़ती धामी सरकार
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अपनी मांगों को लेकर समय—समय पर धरना-प्रदर्शन करते रहते हैं सफाईकर्मी, पिछले दिनों उत्तराखण्ड में व्यापक स्तर पर किया प्रदर्शन

उत्तराखण्ड के इतिहास में पहली बार पुलिसकर्मियों का असंतोष भी उस समय सतह पर आ गया जब पुलिसकर्मियों के परिजनों ने बीस साल की सेवा पूरी कर चुके पुलिसकर्मियों को 2800 रुपये की जगह 4600 रुपये ग्रेड पे की मांग को लेकर देहरादून व रुद्रपुर में अपना आंदोलन शुरू कर दिया...

सलीम मलिक की रिपोर्ट

देहरादून। आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों में जुटी भाजपा की राज्य सरकार द्वारा प्रचार माध्यमों के सहारे प्रदेश की गुलाबी तस्वीर दिखाने की कोशिशों पर उसके ही कर्मचारियों के आंदोलन भारी पड़ने लगे हैं। बीते एक सप्ताह से गले की हड्डी बन चुके सफाईकर्मियों के आंदोलन से सरकार निबट भी न पाई थी कि प्रदेश में पुलिस परिवार का अभूतपूर्व आंदोलन शुरू हो गया। प्रदेश सरकार के लिए शायद पुलिसकर्मियों के परिजनों का आंदोलन के लिए सड़कों पर उतरना ही पर्याप्त न था, बिजली महकमे के कर्मचारियों ने भी आंदोलन की राह पकड़ते हुए सरकार के खिलाफ एक और मोर्चा खोल दिया।

वैसे तो हर सरकार के कार्यकाल के आखिरी साल में कर्मचारियों के आंदोलनों के होना नई बात नहीं है। अपनी मांगों के लिए राज्य कर्मचारियों के विभिन्न संगठन चुनाव से ऐन पहले आंदोलन पर जाते ही हैं। सरकार भी इस प्रेशर पॉलिटिक्स को समझते हुए कर्मचारियों की कुछ लड्डूनुमा मांगों को मानकर बची मांगों को भविष्य में पूरा करने का आश्वासन देते हुए कर्मचारियों को साधने का काम करती रही है। वर्तमान सरकार के कार्यकाल के अन्तिम वर्ष में हो रहे कर्मचारियों के आन्दोलनों के मामले में पुलिसकर्मियों के परिजनजनों द्वारा आंदोलन में कूदे जाने से स्थिति विपरीत बन गयी है।

सरकार के मुख्यमंत्री बदल-बदलकर नई पॉलिश के साथ मुख्यमंत्री बनाये गए युवा विधायक पुष्कर धामी ने मुख्यमंत्री बनते ही जिस प्रकार आक्रामक बल्लेबाजी करते हुए प्रदेश की गुलाबी तस्वीर दिखाने की कोशिशें शुरू की थीं, कर्मचारियों के आन्दोलनों ने उन कोशिशों को पलीता लगाना शुरू कर दिया है। प्रदेश भर सफाईकर्मियों का आंदोलन अपने चरम पर है। आंदोलन के एक सप्ताह बाद भी कर्मचारियों व राज्य सरकार के बीच का गतिरोध समाप्त नहीं हुआ है।

सफाईकर्मियों के इस आंदोलन का व्यापक असर धरातल पर जगह-जगह कूड़े के पड़े ढेरों के रूप में दिखना लगा है, जिसके चलते सरकार को आउटसोर्सिंग द्वारा कर्मचारियों को हटाकर नई भर्ती करने, वेतन रोक देने, वैकल्पिक सफाई व्यवस्था में रोड़े अटकाने वाले कर्मचारियों के खिलाफ मुकदमें दर्ज कराए जाने जैसे कड़े फैसले लेने पड़े, लेकिन इसके बाद भी सफाईकर्मियों के तेवर कम नहीं पड़े हैं। वह अपनी मांगों के लिए अभी भी आंदोलनरत हैं। इस मामले में एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए नैनीताल उच्च न्यायालय ने भी सोमवार 26 जुलाई को सरकार से इस मामले में बुधवार तक जवाब तलब किया है। न्यायालय के इस रुख से सरकार पर सफाईकर्मियों की हड़ताल जल्द समाप्त करवाने का दबाव बन गया है।

इसी बीच उत्तराखण्ड के इतिहास में पहली बार पुलिसकर्मियों का असंतोष भी उस समय सतह पर आ गया, जब पुलिसकर्मियों के परिजनों ने बीस साल की सेवा पूरी कर चुके पुलिसकर्मियों को 2800 रुपये की जगह 4600 रुपये ग्रेड पे की मांग को लेकर देहरादून व रुद्रपुर में अपना आंदोलन शुरू कर दिया।


परिजनों का कहना है कि वह कोई नई मांग या सुविधा के लिए आंदोलन नहीं कर रहे हैं, बल्कि पहले से ही मिल रहे वेतनमान में कटौती के खिलाफ हैं। वर्तमान में जब सभी कर्मचारियों का वेतन लगातार बढ़ रहा है तो पुलिसकर्मियों के वेतन घटाया जाना उनके साथ सरासर अन्याय है। पहली नज़र में यह आंदोलन भले ही पुलिसकर्मियों के परिजनों का दिख रहा हो लेकिन आंदोलन के पीछे पुलिसकर्मियों के असंतोष की अनदेखी नहीं की जा सकती। अनुशासित बल होने के बाद भी पुलिसकर्मियों का यह असंतोष एक बारगी पहले भी उस समय सतह पर आ चुका है, जब पुलिसकर्मियों ने काले फीते बांधकर अपनी नाराजगी जाहिर की थी।

पुलिसकर्मियों के परिजनों के इस एक दिन के आंदोलन की गूंज से ही महकमे के आला अधिकारियों की पेशानी पर बल पड़ गए हैं। राज्य सरकार की ओर से ग्रेड पे के मामले को सातवें वेतनमान की तकनीकी उलझन बताते हुए नए पद का सृजन करते हुए समस्या के समाधान के तौर पर बीच का रास्ता निकालने का आश्वासन दिया गया है, लेकिन इस मामले में विभाग के एक सूत्र ने नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर बताया कि प्रभावित जवानों के लिए जो नया पद सृजित करने की बात की जा रही है वह भी वेतन की विसंगति को दूर नहीं कर सकता। सृजित संभावित पद पर जो वेतनमान मिलेगा, उससे अधिक वेतनमान वर्तमान में मिल रहा है।

बहरहाल सातवें वेतनमान के चलते जवानों के वेतन में आई इस विसंगति को दूर करना सरकार के लिए एक चुनौती से कम नहीं है। सफाईकर्मियों के साथ ही पुलिसकर्मियों के परिजनों के आंदोलन के साथ प्रदेश के बिजली विभाग के कर्मियों ने भी आंदोलन का रास्ता अख्तियार कर सरकार की मुश्किलों में इजाफा कर दिया है।

कुल मिलाकर चुनावी साल में युवा जोश के नारे के साथ मुख्यमंत्री पद पर आसीन हुए पुष्कर धामी के सामने प्रदेश की सत्ता में अपनी पार्टी की एक बार फिर वापसी के साथ ही इन आंदोलनों के झंझावतों से पार पाना आसान चुनौती नहीं हैं।

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