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ग्राउंड जीरो : लोकल पर वोकल सरकार के कार्यकाल में बंद हो गई कटिहार की जूट मिल, हजारों का छिना रोजगार

Janjwar Desk
5 Nov 2020 12:45 PM GMT
ग्राउंड जीरो : लोकल पर वोकल सरकार के कार्यकाल में बंद हो गई कटिहार की जूट मिल, हजारों का छिना रोजगार
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कटिहार की नई जूट मिल के दरवाजे बंद होने से हजारों लोगों के रोजगार के दरवाजे भी बंद हो गए।

कटिहार का जूट मिल पिछले साढे चार साल से बंद है। बिहार विधानसभा चुनाव में सीमांचल इलाके में मक्का किसानों व जूट मिल का मुद्दा गूंजता रहा, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या यह विषय चुनावी चर्चा के शोर तक सीमित रहेगा या फिर इसकी तकदीर व तसवीर भी बदलेगी। पढिए जनज्वार की यह ग्राउंड रिपोर्ट...

कटिहार से राहुल सिंह की रिपोर्ट

71 साल के रतन पोद्दार 1971 से कटिहार के पुरानी जूट मिल में काम कर रहे हैं। वे 290 रुपये की दिहाड़ी पर काम करते हैं और हर दिन यह सोचते हैं कि अब यह काम छोड़ दूंगा। पूछने पर कहते हैं : यहां कुछ नहीं मिलता, सिर्फ दिहाड़ी मिलती है। न इएसआइ, न पीएफ। मशीन पर काम करते हुए हाथ पैर कट-छिल जाए तो कोई पूछने वाला नहीं, जैसे हो खुद ही इलाज करवाओ। वे इस संवाददाता से बातचीत के दौरान प्रबंधन से थोड़े घबराए हुए दिखते हैं और फोटो लेने से मना करते हैं। वे कहते हैं कि अब अगले ही महीने काम छोड़ देंगे और दूसरा कोई काम करेंगे। लेकिन, शाम के धंुधलके में उनसे बातचीत करते हुए यह बात समझ में आती है कि उनके लिए ऐसा कर पाना आसान नहीं होगा और इस उम्र में उन्हें स्वरोजगार के अलावा शायद ही कोई दूसरा रोजगार मिले।

1991 से जूट मिलों में काम कर रहे मुन्ना पोद्दार भी संतुष्ट नहीं हैं। जूट मिलों में मजदूरी करते हुए 29-30 साल के लंबे वक्त में वे बीच में काम छोड़ भी चुके हैं, लेकिन फिर मजबूरन उन्हें यह काम करना पड़ा।

कटिहार का पुराना जूट कारखाना कोलकाता के एक कारोबारी द्वारा संचालित किया जाता है, जहां अभी 200-250 मजदूर दो शिफ्टों में काम करते हैं और वह किसी तरह संचालित होता है। पुराना जूट मिल पहले बिहार सरकार का उपक्रम रहा है, जिसका संचालन बिहार स्टेट इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कारपोरेशन करता था, पर बाद में सनबायो मैन्युफैक्चरिंग प्राइवेट लिमिटेड, कोलकाता को इसका संचालन सौंप दिया गया।

मनमोहन ने दिया था आर्थिक पैकेज, मोदी सरकार के समय बंद हुई नई मिल

कटिहार की पुरानी जूट मिल जहां किसी तरह चल रही है, वहीं नई जूट मिल पूरी तरह से बंद है। यह मिल 8 जनवरी 2016 से बंद है। नई मिल जब बंद हुई तो उस समय उसमें 1200 मजदूर काम करते थे और करीब 150-200 स्थायी कर्मचारी थे। मिल के एक कर्मचारी बताते हैं कि इस मिल की क्षमता 5000 मजदूरों की है और एक समय में यहंा करीब इतने कर्मचारी काम भी करते थे, लेकिन बाद में इनकी संख्या घटती गई।

कटिहार के नया जूट मिल की स्थापना 1935 में हुई थी। अपनी स्थापना के बाद यह मिल पहली बार 1977 में बंद हुई। उसी दौरान जनता पार्टी चुनाव जीत गई और मोरारजी देसाई देश के प्रधानमंत्री बने। तब कटिहार के सांसद व दिग्गज समाजवादी नेता युवराज सिंह ने मिल के पुनरुद्धार के लिए अपनी ही सरकार के खिलाफ 37 दिनों की लंबी भूख हड़ताल की और मोरारजी सरकार को उनकी शर्ताें को मानना पड़ा था। इसके बाद 18 अगस्त 1978 को इसका परिचालन दोबारा आरंभ हुआ। फिर 1980 में पश्चिम बंगाल की पांच मिलों सहित इसका केंद्र सरकार द्वारा अधिग्रहण कर लिया गया और इसे कपड़ा मंत्रालय के निगम नेशनल जूट मैन्युफैक्चरिंग काॅरपोरेशन के तहत ले आया गया।

हालांकि 2004 के मार्च में यह यह मिल एक बार फिर बंद हो गई और मिल के मजदूरों को कार्य मुक्त कर दिया गया और कर्मचारियों के लिए वीआरएस स्कीम लायी गई।


जूट मिल का प्रशासनिक भवन। सभी तसवीरें : राहुल सिंह।

हालांकि 2009 में दूसरी बार जब मनमोहन सिंह चुनाव जीत कर आए तो 2010 में मिल के पुनरुद्धार की प्रक्रिया एक बार फिर आरंभ हुई। मनमोहन सरकार ने कटिहार की आरबीएचएम सहित पश्चिम बंगाल की दो जूट मिलों को पुनरुद्धार के लिए पैकेज दिया और यह शुरू हो गई। लेकिन, इस बार इसका परिचालन बहुत छोटी अवधि के लिए ही हो पाया औरी मोदी सरकार के दौरान आठ जनवरी 2016 को यह मिल फिर बंद हो गई। बढते घाटे व उधार को आधार बनाते हुए इस मिल को बंद किया गया।

एयरपोर्ट की तरह मिल भी निजी हाथों में सौंप दे

मिल के एक कर्मचारी बताते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाले नीति आयोग ने इस मिल को बंद करने पर मुहर लगा दिया। वे कहते हैं, यह मिल चलनी चाहिए क्योंकि इससे जहां हजारों लोगों को रोजगार मिलता है, वहीं बड़ी संख्या में कटिहार शहर में अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार का भी सृजन होता है। मिल चलने से बाजार में पैसा आता है और दूसरे कारोबार को भी प्रोत्साहन मिलता है। यह मिल जूट उत्पादक किसानों को छोड़ दिया जाए तो सीधे तौर पर श्रमिकों व दूसरे सहयोगी कारोबार से जुड़े 20 से 25 हजार लोगों के जीवन व जीविका को प्रभावित करने की क्षमता रखती है। कटिहार जैसे छोटे शहर की अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए एक बड़ी संख्या है।

मिल के कर्मचारी कहते हैं, सरकार जैसे एयरपोर्ट को निजी हाथों में संचालन के लिए अडानी को सौंप रही है, उसी तरह इसे भी सौंप दे, किसी तरह तो यह चले, क्योंकि इसके बंद होने से कटिहार के हजारों लोगों के सामने घोर संकट पैदा हो गया है। यहां काम करने वाले श्रमिक सब्जी बेचने, रिक्शा चलाने व मजदूरी करने को इस वजह से मजबूर हैं।

कहिटार जूट मिल के संचालन के लिए प्रयासरत रहे इंटक नेता विकास सिंह कहते हैं मिल के बंद होने से मजदूरों में काफी आक्रोश है। विकास सिंह के अनुसार, जिस ठेकेदार को मिल का संचालन करने के लिए दिया गया वह मजबूत नहीं था, इस कारण स्थिति बिगड़ती गई, हमने इसको फिर से शुरू कराने के लिए पटना, दिल्ली तक कोशिश की।


विकास सिंह कहते हैं कि अगर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इस मामले को गंभीरता से लेते तो यह शुरू हो गई होती। वे कहते हैं हैं कि इसको लेकर कटिहार के जदयू सांसद दुलार चंद गोस्वामी, पूर्व सांसद तारीक अनवर व अन्य ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को ज्ञापन भी सौंपा लेकिन कुछ हुआ नहीं।

दरअसल नई राजनीति में अब युवराज सिंह जैसे सांसद तो मिलना मुश्किल है कि वे अपने इलाके की मांगों को लेकर अपनी ही सरकार के खिलाफ अनशन पर बैठ जाएं और अपनी मांगें मनवा ले।

विकास सिंह कहते हैं : मिल के सारी मशीन दुरुस्त हैं और सरकार चाहे तो कल से यह मिल शुरू हो सकती है और इसमें बिहार सरकार को अधिक सक्रियता दिखानी होगी।

वहीं, एक कर्मचारी का कहना है कि मिल को मात्र एक सप्ताह के अंदर शुरू किया जा सकता है, क्योंकि सभी चीजें यहां ठीक हैं। पहले यहां से पंजाब, मध्यप्रदेश व हरियाणा सरकार सीधे आर्डर मिलता था, लेकिन प्लास्टिक की बोरियों का चलन बढने से मांग भी प्रभावित हुई है।

विकास सिंह, कटिहार से राजद के उम्मीदवार रामप्रकाश महतो आदि ने मिल के सामने गेट मीटिंग कर भी सरकार के सामने अपनी मांगें रखी थीं, लेकिन कुछ हुआ नहीं।

पुरानी मिल के बारे में वे कहते हैं पहले वहां इएसआइ, पीएफ की सुविधा थी और कारखाना अधिनियम भी लागू था। पर अब जो थोड़े-बहुत श्रमिक वहां हैं भी उनके लिए ऐसी कोई सुविधा हासिल नहीं है।


जूट मिल के विशाल परिसर में कारखाने की ओर जाने का रास्ता।

उसी तरह आरबीएचएम मिल के मजदूरों-कर्मचारियों को सारी सुविधाएं हासिल थीं। मिल बंद होने के बाद बहुत सारे श्रमिक यहां से पलायन कर गए और जो रहे वे दूसरे छोटे-मोटे काम धंधे में रोटी की जुगाड़ के लिए लग गए।

कटिहार की जूट मिलें नई अर्थव्यवस्था का वह चेहरा है जिसमें बात तो लोकल पर वोकल की होती है, लेकिन सबकुछ बहुराष्ट्रीयकृत-केंद्रीयकृत होता जा रहा है और छोटे उद्योग में लाखों लोग घोर आर्थिक व सामाजिक असुरक्षा के चक्र में फंसते जा रहे हैं।

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