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बिहार में कोरोना पॉजिटिव के गांव-घर सील, लेकिन घरों में नहीं हैं शौचालय तो कैसे करें निपटान

Janjwar Desk
13 Jun 2020 5:24 AM GMT
बिहार में कोरोना पॉजिटिव के गांव-घर सील, लेकिन घरों में नहीं हैं शौचालय तो कैसे करें निपटान
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प्रतीकात्मक फोटो
कोरोना पॉजिटिवों के घर और गांव को कंटेनमेंट जोन घोषित किया गया। कंटेनमेंट जोन में बाहर से आना और बाहर जाना दोनों प्रतिबंधित होता है, लेकिन जब घर में शौचालय ही नहीं तो आखिर कैसे होगा इन नियमों का पालन...

जनज्वार ब्यूरो, पटना। कोरोना देश में भयावह रूप लेता जा रहा है। संक्रमितों का आंकड़ा 3 लाख पार कर चुका है। बिहार में भी स्थिति बिगड़ रही है। पॉजिटिवों का आंकड़ा 6 हजार से ऊपर हो चुका है। कोरोना के संक्रमण को क्षेत्र विशेष तक सीमित करने के लिए पॉजिटिव मरीज के घर और आसपास के इलाकों को कंटेनमेंट जोन ज़ोन घोषित कर सील कर दिया जाता है।

कंटेनमेंट जोन ज़ोन में किसी को बाहर से आने और इलाके के किसी निवासी को बाहर जाने की इजाजत नहीं होती। वहीं संक्रमित मरीज के घर के लोगों के घर से बाहर निकलने की मनाही होती है। पर यह नियम बनाने वालों ने संभवतः एक बात पर गौर नहीं किया था कि संक्रमित के घर में अगर शौचालय नहीं हो तो वह शौच कहां करेगा।

ऐसे ही कुछ मामले बिहार के सारण जिला के गरखा प्रखंड में सामने आए हैं। गरखा के भैंसमारा, मुसाहिब टोला और टहल टोला के संक्रमित युवकों के घरों में शौचालय नहीं है, लिहाजा शौच के लिए बाहर जाना इनके परिजनों की मजबूरी है।

यहां के स्थानीय मुखिया प्रतिनिधि एक आश्चर्यजनक बात बताते हैं। उनका कहना है कि भैंसमारा के एक संक्रमित युवक का वार्ड सरकारी कागज में ओडीएफ़, यानी खुले में शौच से मुक्त वार्ड घोषित किया जा चुका है। अब किस नियम के तहत पूरे वार्ड को ओडीएफ घोषित किया गया है, यह तो शासन-प्रशासन के नुमाइंदे ही बता पाएंगे, पर जमीनी हकीकत यही है कि संक्रमित युवक के घर सहित गांव के कुछ और घरों में भी शौचालय नहीं है।

शौचालय न होने के कारण क्षेत्र के कंटेनमेंट ज़ोन घोषित होने और सील होने के बावजूद शौच के लिए बाहर जाना मजबूरी हो जाती है। इससे संक्रमण फैलने का खतरा भी बढ़ जाता है। भैंसमारा के दो और टहल टोला का एक युवक बाहर से आए थे। क्वारंटीन पीरियड पूरा करने के बाद घर गए थे। इस बीच कुछ लक्षण सामने आने के बाद इनकी कोरोना जांच कराई गई और ये पॉजिटिव निकल गए। इस बीच ये शौच के लिए बाहर ही जाते रहे थे। इन लोगों का कहना है कि वे खाने-कमाने वाले लोग हैं। पैसे के अभाव में शौचालय नहीं बना पाए हैं। सरकारी मदद के लिए हरसंभव कोशिश की, जगह-जगह गुहार लगाई, पर मिशन स्वच्छ भारत के तहत शौचालय नहीं बन सका।

अब यह सवाल उठना भी वाजिब है कि वास्तविक लाभुकों को शौचालय के लिए सरकारी सहायता की हालत क्या है और आनन-फानन में ओडीएफ घोषित किए गए गांव-वार्डों की जमीनी हकीकत क्या है।

शायद किसी ने यह गौर करने की जरूरत भी नहीं समझी होगी कि कोरोना को लेकर बनाए गए कंटेनमेंट के नियम पालन में शौचालय का न होना भी बाधा खड़ा कर सकता है।

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