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पूर्ण शराबबंदी वाले बिहार में किसी तरह की रोक नहीं लगाने वाले महाराष्ट्र से भी 2 फीसद ज्यादा शराब की खपत

Janjwar Desk
18 July 2021 8:45 AM GMT
पूर्ण शराबबंदी वाले बिहार में किसी तरह की रोक नहीं लगाने वाले महाराष्ट्र से भी 2 फीसद ज्यादा शराब की खपत
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(राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे : ग्रामीण क्षेत्रों में 15.8 फीसदी लोग शराब पीते हैं, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह आंकड़ा 14 फीसदी था।)

बिहार में शराब के सिंडिकेट को रोकने में बिहार सरकार पूरी तरह से असफल साबित हो रही है, नीतीश सरकार की सहयोगी वीआईपी और हम के अध्यक्षों ने भी तीन माह पूर्व मुजफ्फरपुर में शराब पीने से 5 लोगों की हुई मौत पर सवालिया निशान लगा दिए थे.....

जितेंद्र उपाध्याय की रिपोर्ट

जनज्वार। जहरीली शराब से मौत को लेकर बिहार एक बार फिर सुर्खियों में है। पश्चिमी चंपारण जिले के लौरिया थाना क्षेत्र के देउरवा गांव में जहरीली शराब पीने से अब तक 16 लोगों की जान जा चुकी है। अभी भी आधा दर्जन से अधिक लोग जीवन व मौत के बीच जुझ रहे हैं। पूर्ण शराबबंदी वाले राज्य में प्रत्येक दिन हजारों लीटर शराब बरामदगी व पांच वर्ष में जहरीली शराब से मौत की हो चुकी अब तक की कई घटनाएं सरकार के दावे को झुठला रही है। नतीजतन कहा जा रहा है कि शराब के काला कारोबार में बिहार देश का पहला राज्य बन गया है। एक सर्वे एजेंसी की रिपोर्ट के मुताबिक पूर्ण शराबबंदी के बाद भी महाराष्ट्र से दो फीसद अधिक बिहार में शराब की खपत है। जबकि महाराष्ट्र में शराब पर कोई रोक नहीं है।

वर्ष 2016 के एक अप्रैल को बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने शराबबंदी लागू कर दी। जिसके बाद से यह ड्राई स्टेट बन गया। कानून लागू होने के बाद सरकार इसके अमल को लेकर भले ही तमाम दावा कर ले, पर आंकड़ों में सच्चाई कुछ और ही बयान कर रही है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे (एनएफएचएस-5) के आंकड़ों के मुताबिक बिहार में महाराष्ट्र से ज्यादा शराब पी जाती है। सर्वे के मुताबिक बिहार में 15.5 फीसदी पुरुषों ने शराब पीने की बात स्वीकार की है। शहर की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों में शराब की खपत अधिक है।

ग्रामीण क्षेत्रों में 15.8 फीसदी लोग शराब पीते हैं, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह आंकड़ा 14 फीसदी था। वहीं महाराष्ट्र, जहां शराबबंदी लागू नहीं है, 13.9 फीसदी पुरुष शराब का सेवन करते हैं। महाराष्ट्र के ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में शराब की खपत का अनुपात बिहार की तुलना में कम है। ऐसे में तकरीबन महाराष्ट्र से दो फीसद अधिक शराब की खपत बिहार में हो रही है। यह बात दीगर है कि लोगों को दो या तीन गुनी कीमत चुकानी पड़ती है चाहे शराब देशी हो या विदेशी। इसके अलावा तेलंगाना और गोवा की तुलना में बिहार में शराब की खपत आज भी ज्यादा है।

हर घंटे औसतन 1341 लीटर जब्त होती है शराब

बिहार में झारखंड, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश एवं नेपाल से शराब की बड़ी खेप तस्करी कर लाई जाती है। हालात यह है कि पुलिस और मद्य निषेध विभाग की टीम यहां हर घंटे औसतन 1341 लीटर शराब जब्त कर रही है, मिनट के हिसाब से आंकड़ा 22 लीटर प्रति मिनट आता है। विभागीय आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2020 में करीब एक करोड़ लीटर से अधिक देसी और विदेशी शराब पकड़ी गईं। मुजफ्फरपुर, वैशाली, गोपालगंज, पटना, पूर्वी चपारण, रोहतास और सारण वाले इलाकों में शराब की अधिकतम बरामदगी हुई।

बिहार सरकार को प्रति वर्ष 7000 करोड़ का नुकसान

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की वर्ष 2005 से 2015 तक के कार्यकाल के बिहार में शराब दुकानों की संख्या दोगुनी हो गई। शराबबंदी से पहले बिहार में शराब की करीब छह हजार दुकानें थीं और सरकार को इससे करीब डेढ़ हजार करोड़ रुपये का राजस्व आता था। 1 अप्रैल, 2016 को बिहार देश का ऐसा पांचवां राज्य बन गया जहां शराब के सेवन और जमा करने पर प्रतिबंध लग गई।

कैग (कॉम्पट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल) की रिपोर्ट के मुताबिक शराबबंदी के कारण वित्त वर्ष 2016-2017 में टैक्स रेवेन्यू में गिरावट आई। वर्ष 2016-2017 के लिए टैक्स रेवेन्यू का अनुमान 29730.26 करोड़ रुपये रखा गया था, लेकिन सरकार के खाते में 23742.26 करोड़ रुपये ही आए। यानी अनुमान से 5,988 करोड़ रुपये कम जमा हुए।वित्त विभाग से मिली जानकारी के अनुसार, स्टेट एक्साइज के रूप में वर्ष 2015-16 में 3141.75 करोड़ रुपये रेवेन्यू आया था। इससे पहले वित्त वर्ष 2014-15 में रेवेन्यू के रूप में 3216.58 करोड़ रुपये और वित्त वर्ष 2013-14 में 3167.72 करोड़ रुपये मिले थे।

भारतीय मादक पेय कंपनियों (सीआईएबीसी) के परिसंघ के मुताबिक राज्य सरकार को शराबबंदी के चलते मौजूदा समय में 7000 से 8000 करोड़ रुपये के वार्षिक राजस्व का नुकसान है। जबकि राजस्व के बड़े नुकसान के कारण राज्य ऋण संकट की ओर बढ़ रहा है। परिसंघ के महानिदेशक विनोद गिरी ने कहा है कि बिहार सरकार अपनी मद्य निषेध नीति की समीक्षा करे। राज्य सरकार को धीरे-धीरे शराबबंदी को समाप्त करने और राज्य में शराब व्यापार को नियंत्रित करने की आवश्यकता है। शराब जो अधिक हानिकारक हो बाजार में नहीं बेची जाए। दिल्ली जैसे राज्यों की तरह सरकार को सार्वजनिक रूप से पीने से सख्ती से निपटना चाहिए।

जो पहनाते रहे हैं ताज सबसे अधिक जहरीली शराब की उनपर गिरी गाज

2015 में नीतीश कुमार भारतीय जनता पार्टी से अलग होकर राष्ट्रीय जनता दल के साथ महागठबंधन के तहत बिहार विधानसभा का चुनाव लड़े। उस वक्त पुरुषों की शराब की लत से परेशान महिलाओं ने पारिवारिक कलह, घरेलू हिंसा, शोषण व गरीबी का हवाला देते हुए राज्य में शराबबंदी की मांग की थी।

नीतीश कुमार ने वादा किया कि अगर वे फिर सत्ता में आए तो शराबबंदी लागू कर देंगे। आधी आबादी ने उन पर भरोसा किया और महिलाओं का मतदान प्रतिशत 59.92 से ज्यादा हो गया। कई क्षेत्रों में 70 फीसदी से अधिक महिलाओं ने मतदान किया। नीतीश विजयी हुए और सत्ता में लौटते ही राज्य में शराबबंदी की घोषणा कर दी।

बीते पांच साल में करीब दो लाख से अधिक लोगों को शराबबंदी के उल्लंघन पर जेल हुई । जिनमें करीब चार सौ से अधिक लोगों को सजा मिली। स्थिति अब ऐसी हो गई है कोई भी दिन ऐसा नहीं बीतता जब राज्य के किसी ना किसी कोने से शराब की बरामदगी और शराबबंदी कानून तोड़ने की खबरें सुर्खियां ना बनती हों। खास बात यह है कि शराब बंदी लागू होने के छह माह बाद गोपालगंज में जहरीली शराब से 19 लोगों के मौत की खबर आई। मृतकों में सर्वाधिक दलित व महादलित परिवार की संख्या रही।

एक बार फिर गोपालगंज की घटना 5 वर्ष बाद पश्चिमी चंपारण के लौरिया थाना क्षेत्र के देउरवा गांव में दोहराई जा रही है। अब तक मरने वाले कुल 16 लोगों में लतीफ साह, रामवृक्ष चौधरी, भगवान पंडा, नईम हजाम, सुरेश साह, इजहार हुसैन, रातुल मियां, झुन्ना मियां, भुट्टु मियां, तेज मोहम्मद, जवाहिर मियां, जुलफान मियां, हीरालाल डोम, अमिरूल साह, इजहारूल अंसारी, झुन्ना मियां (2) शामिल हैं।

ऐसे में खास बात यह कि नीतीश कुमार का लंबे समय से जिन मतदाताओं के ऊपर सर्वाधिक भरोसा रहता है उनमें दलित व महादलित वर्ग से आते हैं। उधर आंकड़ों में हकीकत यह है कि जहरीली शराब से मरने वालों में इसी तबके के लोग सर्वाधिक है। अर्थात कहा जा सकता है कि जो चुनाव में हर बार ताज पहनाता है, जहरीली शराब की गाज भी उन्ही पर सर्वाधिक गिर रही है ।

नीतीश के मंत्री ही शराब बंदी को बताते रहे हैं फ्लॉप

बिहार में शराब के सिंडिकेट को रोकने में बिहार सरकार पूरी तरह से असफल साबित हो रही है । नीतीश सरकार की सहयोगी वीआईपी और हम के अध्यक्षों ने भी तीन माह पूर्व मुजफ्फरपुर में शराब पीने से पांच लोगों की हुई मौत पर सवालिया निशान लगा दिए थे। सरकार के मंत्री मुकेश साहनी ने तो शराबबंदी कानून को ही विफल करार दिया।

हम पार्टी के अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने कहा कि जिन जिलों में शराब की वजह से लोगों की मौत हो रही है वहां के एसपी के ऊपर हत्या का मुकदमा दर्ज किया जाना चाहिए। मांझी ने नीतीश सरकार के शराबबंदी कानून पर सवाल खडे़ करते हुए कहा कि यह सोचने वाली बात है कि जब राज्य में शराबबंदी कानून लागू है तो आखिर शराब बेची कैसे जा रही है।

न्यायालय में पुलिस ने लगाया जवाब चूहे पी गए शराब

इस अवैध कारोबार के फलने फूलने में पुलिस भी पीछे नहीं है। इसका पता तब चला जब साल 2018 में कैमूर में जब्त कर रखे गए 11 हजार बोतल शराब के बारे में पुलिस ने अदालत को बताया कि चूहों ने शराब की बोतलें खराब कर दीं। एक अन्य घटना में पुलिस ने नौ हजार लीटर शराब खत्म होने का दोष चूहों के मत्थे मढ़ दिया।

उस समय विपक्षी दलों ने यह कहकर खूब हंगामा किया कि अब तो चूहे भी शराब पीने लगे हैं। मुजफ्फरपुर का तो एक पूरा थाना ही शराब की बिक्री के आरोप में निलंबित कर दिया गया। पुलिसकर्मियों द्वारा शराब की बिक्री करने से संबंधित वीडियो भी आए दिन खूब वायरल हुए। शराबबंदी कानून की आड़ में पुलिस पर लोगों को उत्पीडि़त करने के आरोप भी खूब लगे। यह बात दीगर है कि आला अधिकारी समेत पूरा महकमा इस बात की शपथ लेता है कि शराब के सेवन या उससे संबंधित किसी भी तरह की गतिविधि में शामिल नहीं होगा और कानून को लागू करने के लिए विधि सम्मत कार्रवाई करेगा।

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