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CAA असंवैधानिक है क्योंकि यह धर्म के आधार पर व्यक्तियों के बीच भेद करता है- जस्टिस वी. गोपाल गौड़ा

Janjwar Desk
22 March 2021 12:53 PM GMT
CAA असंवैधानिक है क्योंकि यह धर्म के आधार पर व्यक्तियों के बीच भेद करता है- जस्टिस वी. गोपाल गौड़ा
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जस्टिस गौड़ा ने कहा कि भारतीय संविधान लागू होने के 70 साल के बाद आप कानून में संशोधन करते हैं और कहते हैं कि अन्य देशों के वो लोग जो अपने देश में प्रताड़ित होने के कारण यहां आकर निवास कर रहे हैं, उन्हें नागरिकता दी जाएगी लेकिन भारतीय मूल के जो व्यक्ति श्रीलंका आदि देशों में हैं या यहां हैं, उन्हें कोई नागरिकता नहीं दी जाएगी....

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस वी. गोपाल गौड़ा ने कहा कि 1994 में एस. आर. बोम्मई के मामले में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ द्वारा दिए गए कानून में कहा गया है कि संसद या राज्य विधानमंडल द्वारा धर्म के आधार पर कोई कानून नहीं बनाया जा सकता है। मेरे अनुसार, सीएए (नागरिकता संसोधन अधिनियम) धर्म के आधार पर व्यक्तियों के बीच अंतर करता है जो कि बोम्मई के अनुसार भी असंवैधानिक है।

जस्टिस वी. गोपाल गौड़ा ने यह बातें वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ.के.एस. चौहान की किताब 'नागरिकता, अधिकार और संवैंधानिक सीमाएं' के विमोचन के अवसर कहीं। डॉ. चौहान की इस किताब को मोहन लॉ हाउस के द्वारा प्रकाशित किया गया है। इस कार्यक्रम में देश के पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी भी मौजूद थे।

उन्होंने असम में प्रचलित तथ्यात्मक स्थिति का संकेत दिया, जहां 2019 में एनआरसी का अभ्यास किया गया था और वह वहां एक फैक्ट फाइंडिंग कमिटी के अध्यक्ष रूप में गए थे।' उन्होंने कहा, "यह वो लोग हैं जिन्हें अपने दावों को साबित करना होगा, यह वह लोग हैं जिन्हें अपने जन्म प्रमाण पत्रों को प्रस्तुत करना होगा, यह वो लोग हैं जिन्हें यह साबित करना होगा कि उनके माता-पिता में से कोई एक इसी देख का निवासी हैं। ये सब तब हो रहा था जब हम ये जानते हैं कि इस देश की 50% से अधिक की आबादी निरक्षर है और अपने पास कागजात नहीं रखती है।"

कानूनी मामलों की समाचार वेबसाइट लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक उन्होंने कहा, 'भारतीय संविधान लागू होने के 70 साल के बाद आप कानून में संशोधन करते हैं और कहते हैं कि अन्य देशों के वो लोग जो अपने देश में प्रताड़ित होने के कारण यहां आकर निवास कर रहे हैं, उन्हें नागरिकता दी जाएगी लेकिन भारतीय मूल के जो व्यक्ति श्रीलंका आदि देशों में हैं या यहां हैं, उन्हें कोई नागरिकता नहीं दी जाएगी।'

उन्होंने आगे कहा, इससे केवल एक धर्म ही प्रभावित नहीं होगा। एनआरसी (भारतीय राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर) हर व्यक्ति पर बिना पर धर्म के परवाह किए बिना लागू होती है, हमें यह याद रखना चाहिए।

उन्होंने कहा कि चाहे वह किसान हों या महिलाएं या कोई अन्य वर्ग, चाहे वह असम, पूर्वोत्तर भारत या देश के अन्य हिस्सों में हो, चाहे वह किसी भी धर्म से हो, अगर उन्हें अपनी नागरिकता साबित करना अनिवार्य किया जाता है, उन्हें राज्यविहीन कर दिया जाता है, तो यह मानवाधिकारों का बड़ा उल्लंघन होगा।

यह देखते हुए कि 1980 के मिनेरवा मिल्स केस में संविधान पीठ के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने पाया था कि न्यायधीश समाज में चल रही वास्तविकताओं के संरक्षक देवदूत हैं। जस्टिस गौड़ा ने 'मानवाधिकार संरक्षक, कानून के छात्रों, कानूनी बिरादरी और अदालतों से बचाव के लिए आगे आने का आग्रह किया।'

'सैकड़ों मामले सुप्रीम के समक्ष लंबित हैं, जो पूरी दुनिया में सबसे स्वतंत्र और जीवंत न्यायपालिका है, मेरा अनुरोध है कि इस मामले को उठाया जाए और शीघ्रता से निस्तारण किया जाए! यह देश के हर उस व्यक्ति को चिंतित करता है जिसके अधिकारों का फैसला किया जाना आवश्यक है।''

जस्टिस गौड़ ने विस्तार से बताया कि भारतीय संविधान के निर्माता डॉ. बी.आर.अंबेडकर ने संविधान सभा में धर्म के आधार पर नागरिकता देने को अस्वीकार करते हुए किस तरह से बहस की, ताकि संविधान में स्वतंत्रता की सुबह निष्पक्षता, समावेशिता, समानता और परिष्कार और एक अंतर्निहित संवेदनशीलता सुनिश्चित हो सके।'

"नागरिकता एक राष्ट्र का मौलिक निर्माण खंड है। यह सर्वोत्कृष्ट डीएनए है जो एक लोकतंत्र के जीवन और जीवन शक्ति का निर्माण करता है। जस्टिस गौड़ा ने वर्तमान समय को एक के रूप में परिभाषित किया जब "देशवासियों को भारी संकट का सामना करना पड़ रहा है व कानून का शासन दांव पर है और नागरिकता के अधिकार की समस्याएं बहुत बड़ी है।

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