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एडिटर्स गिल्ड की मीडिया को नसीहत, किसानों को 'खालिस्तानी' और 'देशद्रोही' कहना करें बंद

Janjwar Desk
4 Dec 2020 3:35 PM GMT
एडिटर्स गिल्ड की मीडिया को नसीहत, किसानों को खालिस्तानी और देशद्रोही कहना करें बंद
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एडिटर्स गिल्ड ने आज शुक्रवार को एक एडवाइजरी जारी कर साफ शब्दों में कहा है कि किसान आंदोलन के कवरेज में मीडिया को नैतिकता और जिम्मेदार पत्रकारिता के मानदंडों का ध्यान रखना होगा...

जनज्वार। कृषि बिल के विरुद्ध किसानों के प्रदर्शन को लेकर मीडिया की भूमिका पर पहले से कई तरह की बातें की जा रही हैं, अब एडिटर्स गिल्ड ने भी इसे लेकर एक कड़ा एडवाइजरी जारी कर बिना किसी नैतिकता और प्रमाण के किसानों को 'खालिस्तानी' और 'देशद्रोही' जैसे अलंकारों से नवाजने वाले मीडिया के धड़ों को नसीहत दी है।

एडिटर्स गिल्ड ने आज शुक्रवार को एक एडवाइजरी जारी कर साफ शब्दों में कहा है कि किसान आंदोलन के कवरेज में मीडिया को नैतिकता और जिम्मेदार पत्रकारिता के मानदंडों का ध्यान रखना होगा। किसान आंदोलन के दौरान मीडिया के एक धड़े द्वारा किसानों को कथित तौर पर खालिस्तान समर्थक और देशद्रोही साबित करने की कोशिश को लेकर एडिटर्स गिल्ड की यह एडवाइजरी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

किसानों पर रिपोर्टिंग करते हुए मीडिया संस्थान संयम बरतें, ये सुझाव है एडिटर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया को इसलिए देना पड़ा है कि बीते कुछ सालों में एक अजीब सा ट्रेंड चल पड़ा है कि देश में कहीं भी कोई भी सरकार का विरोध करे तो उसे बदनाम करो। बदनाम करने के लिए भी हर तरह के हत्कंडे अपनाए जाने लगे हैं। देशद्रोही या एंटीनेशनल कहना तो फैशन सा हो गया है। मुसलमान सरकार का विरोध करे तो उसे देशद्रोही या आतंकवादी कहो, आदिवासी विरोध करे तो नक्सली, वुद्धिजिवी विरोध करे तो अर्बन नक्सल, छात्र वरोध करें तो टुकड़े टुकड़े गैंग, और पंजाब के किसान विरोध करें तो उन्हें खालिस्तानी कहा जाने लगा है। हलांकि राजसत्ता से विरोध जताना जनता का संबैधानिक अधिकार है। लेकिन ये भी बेहद दुखद है कि आज सरकारें जनता से उसके संबैधानिक अधिकार लगातार छीन रही हैं या उन्हें बाधित कर रही हैं।

पिछले दिनों केंद्र सरकार ने खेती किसानी को लेकर तीन कानून पास किये हैं, janjwar अपने पाठकों तक इनकी पूरी तफसील पहुंचाता रहा है, अब देश भर के किसान इन कानूनों के खिलाफ़ लामबंद हुए हैं और सभी किसान दिल्ली पहुचने की कोशिश कर रहे हैं। सरकार उन्हें दिल्ली से बाहर ही रोकने की कोशिश कर रही है। हलांकि देश भर के किसान इन कानूनों के खिलाफ़ गोलबंद हो चुके हैं लेकिन अभी फ़िलहाल दिल्ली के आसपास पंजाब और हरियाणा के किसानों की भारी संख्या एकत्रित है।

इस बीच उनके खानपान, वेशभूषा सहित जातीय व नस्लीय टिप्पणियाँ मीडिया में की जा रही हैं। ये बेहद अच्छी बात है कि एडिटर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया ने इसका संज्ञान लिया है और मीडिया संस्थानों को याद दिलाया है कि अगर किसान विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं तो ये उनका संवैधानिक अधिकार है। यही नहीं EGI ने साफ़-साफ़ कहा कि किसानों के विरोध प्रदर्शन पर रिपोर्ट करते हुए उनकी गरिमा का पूरा ख्याल रखा जाये और उन पर जातीय, सांस्कृतिक या नस्लीय टिप्पणी न की जाये, EGI ने साफ़ कहा कि ऐसा करने वाले मीडिया संस्थानों की विश्वसनीयता घटती है।

पंजाब के संगरूर जिले से आए हरप्रीत बादल के मुताबिक मीडिया के कई संस्थानों को अपनी विश्वनीयता की कोई चिंता नहीं है। जिन चैनलों और जिन एंकरों ने दो हज़ार की नोट में चिप बताया और दिखाया था उन सभी ने आज तक अपनी इस बेशर्मी के लिए माफ़ी नहीं मांगी है और न ही अफ़सोस का इज़हार किया है, यही नही ये सभी पूरी बेशर्मी के साथ नये नये झूठ रात-दिन गढ़ने में लगे हुए हैं।

आंदोलनकारी किसानों में से एक हरनाम सिंह कहते हैं, 'मीडिया संस्थान पूरी तरह एक पार्टी के भोपूं बनकर रह गये हैं, उन्हें देश या देश की जनता से कोई सरोकार नहीं रह गया है। यही कारण है कि किसानों ने धरना स्थल से कई बड़े चैनलों के रिपोर्टर्स को धक्के देकर भगा दिया है। धक्के देकर तो नहीं लेकिन सीएए विरोधी आन्दोलन के दौरान भी दो बड़े चैनलों के कार्यकर्ताओं (उन्हें पत्रकार कहना मुश्किल है) को, सम्मान से ही सही लेकिन भगाया था। लगातार जनता से अपमानित होती गोदी मीडिया के लोग कहीं से भी सबक लेते हुए नज़र नहीं आते।'


एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया की अध्यक्ष सीमा मुस्तफा, महासचिव संजय कपूर और ट्रेजरर अनन्त नाथ के संयुक्त हस्ताक्षर से जारी की गई एडवायजरी में साफ तौर पर कहा गया है कि मीडिया के कुछ धड़ों द्वारा बिना किसी प्रमाण के किसानों के लिए 'खालिस्तानी' और देशद्रोही जैसे शब्दों का प्रयोग किया जा रहा है, जो जिम्मेदार और नैतिक पत्रकारिता के सर्वथा प्रतिकूल है।

इसे लेकर एडिटर्स गिल्ड काफी गंभीर है। एडवाइजरी में यह भी कहा गया है कि इससे मीडिया की विश्वसनीयता पर भी खतरा उत्पन्न हो रहा है।

एडिटर्स गिल्ड ने कहा है कि किसानों की वेशभूषा के आधार पर लकीर के फकीर नहीं बनें। रिपोर्टिंग में पक्षपाती न हों, बैलेंस रखें और उद्देश्यपरक पत्रकारिता करें। अपनी तरफ से कोई अलग नैरेटिव बनाने की कोशिश न करें।

उल्लेखनीय है कि किसान आंदोलन के दौरान मीडिया के एक धड़े द्वारा किसानों को ही दोषी ठहराने, उन्हें खालिस्तान समर्थक और देशद्रोही बताने की कोशिश की जा रही थी। इसे लेकर आंदोलनकारी किसान मीडिया के प्रति आक्रोशित हो रहे हैं और कई समाचार चैनलों का बायकाट कर दिया है।

कुछ समाचार चैनलों के विरोध में नारेबाजी व प्रदर्शन भी किसानों ने किया है तो एक मीडिया हाउस के पत्रकारों के साथ बात करने से इंकार कर दिया और उन्हें प्रदर्शन स्थल से खदेड़ दिया।

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