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Gyanvapi Masjid Row : विश्वनाथ मंदिर के पूर्व महंत का ज्ञानवापी सर्वे पर बड़ा खुलासा, बोले- हंगामा करने वालों की मंशा साफ नहीं

Janjwar Desk
10 May 2022 5:56 AM GMT
Gyanvapi Masjid Row : विश्वनाथ मंदिर के पूर्व महंत का ज्ञानवापी सर्वे पर बड़ा खुलासा, बोले- हंगामा करने वालों की मंशा साफ नहीं
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Gyanvapi Masjid Row : विश्वनाथ मंदिर के पूर्व महंत का ज्ञानवापी सर्वे पर बड़ा खुलासा, बोले- हंगामा करने वालों की मंशा साफ नहीं

Gyanvapi Masjid Row : जिन महिलाओं ने ये याचिका कोर्ट में दाखिल की है वे पांचों ही महिलाएं बनारस की नही हैं। उनमें से एक ​महिला ने आज अपनी याचिका वापस ले ली है। वह दिल्ली की महिला थी...

Gyanvapi Masjid Row : कुछ दिनों से आस्था और गंगा जमुनी तहजीब की नगरी बनारस में एक नया नरेटिव फैलाने (Gyanvapi Masjid Row) की कोशिश की जा रही है। ज्ञानवापी मस्जिद को लेकर जिन महिलाओं ने याचिका दाखिल की थी कि शृंगार गौरी का दर्शन हमें नित्य प्रतिदिन करने की अनुमति प्रदान की जाए, सबसे पहले तो उनकी मंशा पर ही सवाल उठाए जाने चाहिए। अहम सवाल यह है कि याचिकाकर्ता कितने इमानदार और धर्म के प्रति अभिरूचि रखने वाले है।

जिन महिलाओं ने ये याचिका कोर्ट में दाखिल की है वे पांचों ही महिलाएं बनारस की नही हैं। उनमें से एक ​महिला ने आज अपनी याचिका वापस ले ली है। वह दिल्ली की महिला थी। चार अन्य महिलाएं भी बाहर की ही हैं। ​ये कितनी इमानदार हैं ये इसी से पता चल जाता है कि जब वे बाहर की हैं तब उन्हें नित्य प्रतिदिन मां श्रृंगार गौरी के दर्शन की अनुमति क्यों चाहिए?

उन्हें ये भी पता होना चाहिए कि शृंगार गौरी का मंदिर कहां है? शृंगार गौरी का जो विग्रह है वह मस्जिद परिसर के बाहर है। अब जब से नया काशी विश्वनाथ कॉरिडोर बना है उसे आम रास्ते में कर दिया है। अब इसका लोग रोज दर्शन कर सकते हैं। तब फिर इस तरह का सियासी तांडव (Gyanvapi Masjid Row) फैलाने का क्या मतलब है? इससे इनकी नीयत का पता चलता है। बहरहाल कोर्ट ने उनके आवेदन पर एक कमीशन बना दिया है।

आपको बता दें कि विश्वनाथ मंदिर में पिछले कॉरिडोर के निर्माण के समय भी एक कमीशन आया था। पर प्रशासन ने उन्हें अंदर नहीं घुसने दिया। जिससे कमीशन अपनी रिपोर्ट नहीं पेश कर सका था। उसके बाद दुर्मुख विनायक और प्रमोद विनायक के मंदिर को तोड़कर तोड़ ध्वस्त कर दिया गया। ये काम इसी सरकार ने किया है। वो भी काशी खंडों के देवता थे। ये करवाई औरंगज़ेब के समय में नहीं वर्तमान सरकार के समय में ही हुई है। क्या ऐसा करना धर्म विरुद्ध नहीं था?

औरंगज़ेब के समय मे क्या हुआ था इसकी किसी के पास कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है। पर अभी कुछ समय पूर्व ही काशी विश्वनाथ मंदिर के कॉरिडोर के निर्माण के समय जिस तरीके से देव विग्रहों के साथ शिवलिंगों के साथ अनैतिक काम किए गए, 286 शिवलिंगों को तोड़कर मलबे में फेंक दिए गए। क्या ये उचित था?

आज के समय मे इस देश मे जो कुछ भी चल रहा है वह सही नही है। दो सेक्टर हैं वर्तमान में इस देश के अंदर। पहला धर्माधिकारी और दूसरा धर्म के व्यापारी का। धर्म के व्यापारी इस तरीके से धर्म का राजनीतिकरण कर रहे है। वे अपनी वोट बैंक की तैयारी कर रहे है। वर्तमान में इस सरकार के कई सेक्टर हैं, ​जैसे बजरंग दल, वीएचपी, हिंदू वाहिनी। ये कहते हैं कि इनका सरकार से लेना-देना नहीं है पर असल में लेना-देना इन्हीं लोगों से है।

मस्जिद के भीतर उसके तहखाने में सर्वे कराने की तैयारी चल रही है। निश्चित रूप से जहां मस्जिद का निर्माण हुआ है वह मंदिर को तोड़कर बनाया गया है। पर उस समय किन परिस्थितियों में ऐसा किया गया ये कोई नहीं जानता है। हमारे पास आज भी दारा शिकोह का लिखा एक पट्टा है जिसके अनुसार मंदिर की सारी जिम्मेदारी हमारे पूर्वजों को सौंपी गई थी। इसके अलावे हमारे पूर्वजों से हमारे पास जो उपलब्ध जानकारी है उसके अनुसार मस्जिद तोड़े जाने के पहले ही वहां से शिवलिंग हटा लिया गया था। उसके बाद महारानी अहिल्याबाई की पहल पर हमारे पूर्वजों की सहमति से नए मंदिर का निर्माण करवा दिया गया था, जिसमें आज तक पूजा हो रही है। फिर दिक्कत कहाँ है?

आज ज्ञानवापी मस्जिद को लेकर जो चल रहा है, नया नरेटिव फैलाया जा रहा है कि शिवलिंग मस्जिद के नीचे दबा हुआ है। जो यह बात फैला रहे हैं उनसे यह बात पूछा जाना चाहिए कि उन्हें ये कैसे पता है कि मंदिर के पीछे शिवलिंग दबा हुआ है। आज जो कुछ हो रहा है उसका एकमात्र मकसद देश में सिर्फ जहर घोलना है।

वर्तमान में जो देश में चाहे आर्थिक क्षेत्र हो, सामाजिक क्षेत्र हो शिक्षा हो या स्वास्थ्य हर क्षेत्र में सरकार असफल साबित हुई है। इसे ही छुपाने के लिए इस तरह का माहौल (Gyanvapi Masjid Row) बनाया जा रहा है। सरकार के पास कोई ऐसा एजेंडा नहीं है जिससे सरकार अपना बचाव कर सके इसलिए इस तरह की बातें की जा रही है।

विश्वनाथ मंदिर के पूर्व महंत राजेंद्र तिवारी से बातचीत पर आधारित

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