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जब शिक्षा न रोजगार तो कैसे कहें उत्तर प्रदेश नहीं रहा बीमारू राज्य, भाजपा का आईटी सेल गढ़ रहा झूठी छवि

Janjwar Desk
28 Aug 2021 8:52 AM GMT
जब शिक्षा न रोजगार तो कैसे कहें उत्तर प्रदेश नहीं रहा बीमारू राज्य, भाजपा का आईटी सेल गढ़ रहा झूठी छवि
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सीएम योगी आदित्यनाथ ने कहा था कि हमारी सरकार के सतत प्रयास के कारण ही उत्तर प्रदेश साढे चार वर्ष में बीमारू राज्य से उबरकर अब विकास की ओर उन्मुख विकसित राज्य के रूप में बदल रहा है....

जितेंद्र उपाध्याय की रिपोर्ट

जनज्वार। योगी हैं तो यकीन है, मोदी हैं तो मुमकिन है। भाजपा के आईटी सेल द्वारा रचित ऐसे नारों का खेल आगे बढ़ते हुए अब यह कहा जाने लगा है कि यूपी अब बीमारू राज्य नहीं रह गया। अपने विकास कार्यों के बदौलत उस पुरानी छवि से राज्य को मुक्ति मिल चुकी है। हाल ही में दिए गए योगी के इस बयान को लोग खारिज भी करने लगे हैं। लोगों के जेहन में यह बातें नहीं उतर पा रही है।

दलित बस्ती निवासी सूर्यप्रताप एमएससी व बीटीसी किए हैं। वे कहते हैं कि उच्च योग्यता के बाद भी नौकरी का इंतजार खत्म नहीं हो रहा है। साढे चार लाख युवाओं को रोजगार देने का योगी सरकार का दावा झूठा है। अभी पंचायतों में छह हजार के मानदेय पर सहायकों की भर्ती प्रक्रिया चल रही है। मजबूरी में इसके लिए एमए,पीएडी,बीटेक जैसे योग्यताधारी आवेदन किए हैं। इस मानदेय के भुगतान के लिए भी सरकार द्वारा कोई ठोस उपाय नहीं किया गया है। ऐसे हालात में कैसे कहा जाए कि यूपी अब बीमारू राज्य नहीं रहा।

उत्तर प्रदेश के पूर्वी क्षोर पर मौजूद देवरिया जिला मुख्यालय से सटे सोनूघाट गांव के दलित बस्ती के निवासी सूर्यप्रताप जैसे अन्य नौजवान भी कुछ ऐसी ही बात करते हैं। हाल यह है कि आंकड़ों में जीडीपी घट गई और बेरोजगारी ढाई गुना से भी ज्यादा बढ़ गई। आरबीआई के आंकड़ों के मुताबिक, साल 2011 से 2017 के बीच उत्तर प्रदेश की जीडीपी 6.9 की दर से बढ़ रही थी। हालांकि 2017 से 2020 के बीच यह घटकर 5.6 की दर पर आ गई। इसी तरह उत्तर प्रदेश में साल 2011 से 2017 के बीच सोशल सेक्टर पर जितना खर्च किया जा रहा था, इसमें भी 2.6 की कटौती कर दी गई। यूपी में रोजगार के मोर्चे पर भी झटके लगे।

साल 2011-12 में शहरी इलाकों में 1000 में से 41 लोग बेरोजगार थे। 2017-18 के बीच यह आंकडा बढ़ कर 97 तक पहुंचा और 2018-19 के बीच 106 तक पहुंच गया। ग्रामीण इलाकों की बात करें तो 2011-12 के बीच प्रति 1000 में से 9 लोग बेरोजगार थे। 2017-18 में यह आंकडा बढ कर 55 तक पहुंच गया। हालांकि 2018-19 में थोडा घटकर 43 तक आया।

फरवरी 2020 में यूपी के श्रम मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य ने कहा था कि राज्य में कुल 33.94 लाख लोग बेरोजगार हैं। जबकि 30 जून 2018 तक यह आंकड़ा 21.39 लाख था। यानी जून 2018 से फरवरी 2020 के बीच बेरोजगारों की संख्या 58.43 प्रतिशत तक बढ़ गई।

प्रेमचंद्र प्रसाद के मुताबिक मजदूरी कर पांच सदस्यों के परिवार का खर्च उठाता हूं। कभी कभी काम न मिलने पर चुल्हा बुझ जाता है।कोरोना काल में हमें कोई आर्थिक मदद नहीं मिली। पक्का मकान के अभाव में झोपड़ी में किसी तरह परिवार का गुजारा करना पड़ रहा है। ऐसी ही कहानी सुदर्शन की भी है। चार बच्चे समेत छह सदस्यों के परिवार का खर्चा मजदूरी से चलाना मुश्किल हो गया है। इन्हें भी कोरोना काल में कोई सरकारी मदद नहीं मिली।

रीता देवी के पति की बीमारी से तीन वर्ष पूर्व इलाज न होने से मौत हो गई। इसके बाद घर में आमदनी का कोई साधन नहीं है।मायके के मदद से रीता व उसके बच्चों का खर्च चलता है। विधवा पेंशन के लिए अफसरों ने कई बाद आश्वासन दिया,पर अब तक यह आसरा भी अधूरी है। यहां के अधिकांश दलित परिवारों के पास पक्का मकान नहीं है। ऐसे में झोपडी में दिन गुजारना इनकी मजबूरी बन गई है। मुनेशरी देवी का दर्द भी कम नहीं है। इसके दो लडके हैं,जिनकी मेहनत मजदूरी के बल पर घर का खर्च चलता है।

मुनेशरी के मुताबिक पक्का मकान न होने से बरसात के दिनों में परेशानी बढ़ जाती है।सरकार लाख दावा कर ले पर अब तक कोरोना काल में कोई आर्थिक मदद नहीं मिली। राजेश प्रसाद की पत्नी चंपा देवी की सरकार व प्रशासन से काफी शिकायतें हैं। बकौल चंपा,पक्का मकान हो या सूखा राहत कोई मदद सरकार के तरफ से नहीं मिली। राशन कार्ड बनवाने के लिए आठ बार ऑनलाइन आवेदन कर चुका हूं। इसके बाद भी अब तक कार्ड नहीं बन पाया। संकट में परिवार की न्यूनतम जरूरत भी पूरा कर पाना मुश्किल होता है।जल निकासी की समस्या से तो अधिकांश परिवार जुझ रहे हैं।जिन्हें राहत दिलाने के नाम पर प्रशासन की तरफ से मात्र आश्वासन ही मिलता रहा।

कोरोना काल में अजीत ने अपने पिता को इलाज के अभाव में खो दिया। अजीत के मुताबिक 18 अप्रैल को एंटीजन टेस्ट में पिता रामसागर की रिपोर्ट पॉजिटिव आया। जिला चिकित्सालय के कोविड वार्ड में भर्ती करने के बजाय चिकित्सकों ने बस्ती कोरोना अस्पताल के लिए रेफर कर दिया। यहां दस दिनों तक मौत से जुझने के बाद आखिरकार दम तोड़ दिया।

रामकेश प्रसाद का कहना है कि राम राज्य की बात करने वाली सरकार में दलितों, गरीबों का उत्पीड़न बढ़ा है। आंकडों के मुताबिक साल 2017 के बाद खासकर दलितों के खिलाफ अपराध के मामलों में बढोतरी हुई। साल 2017 में जहां दलितों के खिलाफ होने वाली कुल आपराधिक घटनाएं 27.7 प्रतिशत थीं। वहीं, 2019 में ये बढ़कर 28.6 प्रतिशत तक पहुंच गई। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की वर्ष 2019 की रिपोर्ट के अनुसार भारत में सबसे ज्यादा अपराध उत्तर प्रदेश में हुए हैं। यानी अपराध के मामले में यूपी "नंबर वन" है। यूपी में वर्ष 2019 में 6,28,578 आपराधिक मामले दर्ज किये गये।

वर्ष 2017 में ये आंकड़ा 3,10,084 था। यानि अपराध के मामलों में कमी नहीं बल्कि दोगुनी बढोतरी हुई। जबकि योगी सरकार दावा कर रही है कि मामलों में 25ः से 75ः तक की कमी हुई है। वर्ष 2017 में अपहरण के कुल 19,921 मामले दर्ज़ हुए जबकि वर्ष 2019 में 16,590 मामले दर्ज़ किए गए। लेकिन इस कमी के बावजूद उत्तर प्रदेश अपहरण के मामलों में देश मे "नंबर वन" स्थान पर बना हुआ है। इसी प्रकार हत्या के 3,806 मामलों के साथ देश में "नंबर वन" है। लूट और डकैती के 4,213 मामलों के साथ देश में पांचवें स्थान पर है।

उत्तर प्रदेश में महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों में कमी नहीं आई है बल्कि बढ़ोतरी हुई है। यूपी वर्ष 2017 में महिलाओं के खिलाफ अपराध के कुल 56,011 मामले दर्ज हुए थे, जो वर्ष 2019 में बढ़कर 59,853 हो गए। महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामलों में यूपी वर्ष 2017 में भी "नंबर वन" पर था और वर्ष 2019 में भी "नंबर वन" की पोज़ीशन पर कायम रहा। सूबे में बलात्कार के 3,065 मामले दर्ज़ किए गए हैं और यूपी इस अपराध में देश में दूसरे नंबर पर है।

दलितों के खिलाफ अपराध के मामलों में वर्ष 2017 का आंकडा 11,444 था, जो वर्ष 2019 में बढ़कर 11,829 हो गया। देश में दलितों के खिलाफ होने वाले अपराधों में उत्तर प्रदेश की हिस्सेदारी 25.8 प्रतिशत है। यानी दलितों पर हर चौथा अपराध उत्तर प्रदेश में होता है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2019 में दंगों के कुल 5,714 मामले दर्ज किए गए हैं। उत्तर प्रदेश दंगों के मामले में देश में तीसरे स्थान पर है।

प्रधान प्रतिनिधि अमरेन्द्र यादव कहते हैं कि तीन दर्जन प्रवासी मजदूरों के तरफ से आर्थिक मदद के लिए आवेदन जमा किया गया है।ठेला लगाकर घर का खर्च चलानेवाले आठ लोगों को भी आर्थिक मदद के लिए रिपोर्ट तैयार कर लेखपाल के ले जाने के बाद भी कोई सहायता नहीं मिली। कोरोना काल में एक व्यक्ति की मौत के बाद भी उसके परिवार को अब तक कोई सहायता नहीं मिली।सरकार व प्रशासन लोगों को सुविधा उपलब्ध कराने के नाम पर मात्र धोखा देने में लगा है। ऐसे हाल में बीमारू राज्य के कलंक से उत्तर प्रदेश के मुक्त होने की फिलहाल उम्मीद नजर नहीं आ रही है।

बीमारू से मुक्ति के पक्ष में सीएम ने दिए थे ये तर्क

सीएम योगी आदित्यनाथ ने कहा था कि हमारी सरकार के सतत प्रयास के कारण ही उत्तर प्रदेश साढे चार वर्ष में बीमारू राज्य से उबरकर अब विकास की ओर उन्मुख विकसित राज्य के रूप में बदल रहा है। हमने वैश्विक महामारी कोरोना वायरस संक्रमण के बीच जीवन और जीविका बचाने का रास्ता निकाला है। चार साल में यूपी देश की दूसरी अर्थव्यवस्था के रूप में सामने आया है। प्रदेश में 40 लाख लोगों को आवास मिला है। पीएम आवास उपलब्ध कराने में भी यूपी नंबर-वन रहा है। 45 लाख किसानों को गन्ना मूल्य का भुगतान किया गया।

15 करोड़ लोगों को प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना से राशन बांटे गए। 2017 तक मस्तिष्क ज्वर का कहर पूर्वी यूपी समेत 38 जिलों में जारी रहा। अब इस पर काफी हद तक नियंत्रण पा लिया गया है। आज प्रदेश देश में कानून व्यवस्था बेहतर बनाए रखने वाला पहला राज्य बनकर सामने आया है। निवेश के लिए यूपी आ रहे हैं निवेशक। चार सौ करोड़ से अधिक का निवेश चार वर्षों में हुआ। साढ़े चार लाख नौजवान को नौकरी दी है। स्वच्छ भारत अभियान को समय से पूरा किया गया। सभी गरीब परिवार को इज्जत घर दिया।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने स्वतंत्रता दिवस समारोह को संबोधित करते हुए कहा था कि उत्तर प्रदेश बीमारू राज्य के कलंक से उबर चुका है। ।मुख्यमंत्री के बयान में कितनी सच्चाई है। यह एक बहस का विषय बना हुआ है। राज्य के आर्थिक विकास से लेकर अपराध के आंकडों को विश्लेषण का आधार माना जाय तो मुख्यमंत्री के दावे जमीनी हकीकत से काफी दूर नजर आ रहे हैं।

1980 के दशक के मध्य में बीमारू राज्य का पहली बार हुआ था प्रयोग

बीमारू शब्द मूलतः भारत के चार राज्यों बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, और उत्तर प्रदेश.के अंग्रेजी नाम के पहले अक्षर से गढा गया एक शब्द है। 1980 के दशक के मध्य में एक आर्थिक विश्लेषक आशीष बोस ने बीमारू शब्द का प्रयोग तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी को प्रस्तुत एक पेपर में किया था। कई अध्ययनों, यू.एन. के अध्ययन सहित, से पता चलता है कि बीमारू राज्यों के प्रदर्शन ने भारत के सकल घरेलू उत्पाद की संवृद्धि दर को नकारात्मक तौर पर प्रभावित किया है।

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