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बाघ संरक्षण के नाम पर झारखंड में आदिवासियों को विस्थापित कर बदहाल-आवासविहीन और बेरोज़गार कर रहा वन विभाग

Janjwar Desk
10 Dec 2023 9:59 AM GMT
बाघ संरक्षण के नाम पर झारखंड में आदिवासियों को विस्थापित कर बदहाल-आवासविहीन और बेरोज़गार कर रहा वन विभाग
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चूंकि ये दोनों गांव वन क्षेत्र में हैं, जिसके परिणाम स्वरूप लोगों के पास खतियानी दस्तावेज़ न होकर वन पट्टा है, खतियानी दस्तावेज़ न होने के कारण यहां पर निवास कर रहे आदिवासियों को राज्य सरकार ने जनजातीय प्रमाणपत्र उपलब्ध नहीं कराया है और न ही इन्हें झारखंड के स्थाई निवासी होने का प्रमाणपत्र ही प्राप्त है...

विशद कुमार की रिपोर्ट

रांची। वर्ष 2017 के वन विभाग झारखंड के पलामू व्याघ्र परियोजना (दक्षिणी भाग) द्वारा निर्गत एक पत्र के आलोक में लातेहार जिले में स्थित 8 वन गांव – लाटू, कुजरूम, रमनदाग, हेनार, विजयपुर, पंडरा, गुटवा और गोपखाड़ के ‘ईको विकास समिति’ को भेजा गया था। इस पत्र में वन विभाग ने इन आठ गावों को विस्थापन एवं पुनर्वास हेतु प्रस्तावना भेजा था।

इस प्रस्तावना के तार भारत सरकार द्वारा बाघों के संरक्षण के लिए प्रयासों से जुड़े हैं। राष्ट्रीय व्याघ्र संरक्षण प्राधिकार के अध्ययन अनुसार, बाघों के लिए न्यूनतम 800-1000 वर्ग कि०मी० का कोर एरिया चाहिए, जो मनुष्यों के अतिक्रमण से परे हो। पलामू व्याघ्र परियोजना, जिसकी स्थापना केंद्र सरकार ने वर्ष 1974 में की थी, का कुल दायरा 1129.93 वर्ग किमी है। वर्तमान में पलामू व्याघ्र आरक्षण के 414.08 वर्ग किमी को कोर एरिया घोषित किया, जिसके अंतर्गत उपरोक्त 8 वन गांव आते हैं। वन विभाग का पुनर्वास सम्बंधित प्रस्ताव इन 8 वन गांवों को कोर एरिया से हटाने का है।

ऐतिहासिक दस्तावेज़ों के अनुसार इन 8 वन गांवों को अंग्रेज़ी हुकूमत ने 1910-1920 के आसपास बसाया था। इन गांवों के अधिकांश निवासी आदिवासी समुदाय यानी सरकारी भाषा में जनजातीय समुदाय से आते हैं। वर्ष 2006 में वन अधिकार क़ानून पारित होने के पश्चात इन सभी निवासियों के पास इस क्षेत्र में रहने का औपचारिक हक़ है। इन्होंने अपने अपने गांवों में रहने लायक घर, खेती लायक ज़मीन, परम्परा अनुसार सरना मसना स्थापित व बनाया है। इन क्षेत्रों में इनका निवास 100 वर्षों से ऊपर हो चला है।

अब भारत सरकार द्वारा 2006 में गठित राष्ट्रीय व्याघ्र संरक्षण प्राधिकार के अंतर्गत कोर जोन से ग्रामीणों के स्वैच्छिक पुनर्वासन हेतु निर्गत दिशा निर्देश एवं वन विभाग द्वारा इन निर्देशों की अवहेलना ने इन आदिवासी गांवों की जीविका पर प्रश्नचिन्ह खड़ा कर दिया है। आज वन विभाग ने इस क्षेत्र के लाटू और कुजरूम के आदिवासियों को आने वाले दिनों में, बदहाली, गृहहीनता एवं बेरोज़गारी जैसी परिस्थिति में खड़ा कर दिया है।

गौरतलब है कि जब 2017 में वन विभाग द्वारा विस्थापन एवं पुनर्वास के लिए प्रस्तावना भेजा गया तो अधिकांश गांवों ने इसका प्रत्यक्ष रूप से पुरज़ोर विरोध किया। हालांकि दो गांव लाटू और कुजरूम ने वन विभाग के इस प्रस्ताव को बोझिल मन से स्वीकारा। उल्लेखनीय है कि पलामू व्याघ्र परियोजना के तहत आने वाले ये दोनों गांवों लाटू और कुजरूम वनग्राम में केवल अनुसूचित जनजाति एवं आदिम जनजाति के लोग रहते हैं।

लाटू और कुजरूम, दोनों गांव गारू प्रखंड के सुदूर वन क्षेत्र में बसे हैं। इन गांवों तक न सड़क जाती है और न ही बिजली। बाड़ेसार के मुख्य मार्ग तक आने के लिए इन ग्रामीणों को 6-13 किमी का लम्बा सफ़र पैदल तय करना पड़ता है। बारिश के मौसम में इन गांवों को जोड़ती कच्ची सड़क भी जवाब दे देती है। यहां न तो स्वास्थ्य केंद्र है और न ही मोबाइल फोन सिग्नल, ऐसे में किसी भी प्रकार की स्वास्थ्य समस्या के लिए मदद मिलना नामुमकिन हो जाता है।

यह कहना अनुचित न होगा की लाटू और कुजरूम की इन परिस्थितियों का ज़िम्मेदार वन विभाग है। वन विभाग ने इन सुदूरवर्ती क्षेत्रों में विकास का कोई काम नहीं होने दिया है। चूंकि ये दोनों गांव वन विभाग के अधिकार क्षेत्र में आते हैं, इसलिए यहां किसी भी प्रकार के विकास के लिए वन विभाग की अनुमति चाहिए होती है, परंतु वन विभाग ने लोगों की जरूरतों को अनदेखा कर, वन्यजीवों की सुरक्षा की आड़ में, यहां किसी भी जन उपयोगी कार्य को आगे बढ़ने नहीं दिया। इस क्रम में वन विभाग शायद यह भूल गया है कि इंसान और प्रकृति को साथ चलना होता है, जो यहां रह रहे आदिवासियों के मूल में है।


वन विभाग द्वारा इन गांवों में ऐसी सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियां बनाई गयी हैं, जहां लोग खुद गांव छोड़कर जाने को मजबूर हो जायें। इसके अतिरिक्त चूंकि ये दोनों गांव वन क्षेत्र में हैं, जिसके परिणाम स्वरूप लोगों के पास खतियानी दस्तावेज़ न होकर वन पट्टा है। खतियानी दस्तावेज़ न होने के कारण यहां पर निवास कर रहे आदिवासियों को राज्य सरकार ने जनजातीय प्रमाणपत्र उपलब्ध नहीं कराया है और न ही इन्हें झारखंड के स्थाई निवासी होने का प्रमाणपत्र ही प्राप्त है, जिसके कारण यहां के लोग राज्य एवं केंद्र सरकार की कई सारी योजनाओं से वंचित रह जाते हैं।

वर्ष 2017 के पुनर्वास प्रस्तावना के पीछे एक तरफ़ वन विभाग द्वारा संरचित परिस्थितियां थीं, तो दूसरी तरफ़ वन विभाग द्वारा गांव वालों को किए गए अनौपचारिक वादे थे। वन अधिकारियों ने न केवल पक्के मकान, अच्छी शिक्षा एवं उज्ज्वल भविष्य का सपना दिखाया, वरन लोगों को जाति प्रमाण पत्र और झारखंड के स्थाई प्रमाण पत्र तक दिलाने का वादा कर डाला। इस संदर्भ में लाटू और कुजरूम के लोगों ने बोझिल मन से अपने घर छोड़ने के लिए हामी भर दी।

वन विभाग द्वारा प्रस्तावित पुनर्वास राष्ट्रीय व्याघ्र संरक्षण प्राधिकार के दिशानिर्देशों के अनुसार होने थे। इन निर्देशों के आलोक में लाटू और कुजरूम निवासियों को दो विकल्प दिए गए। पहले विकल्प के अन्तर्गत लोग 10 लाख रुपए का मुआवजा लेकर अपने घरों से विस्थापित हो जाएंगे और अपने पुनर्वासन की ज़िम्मेदारी वे ख़ुद उठाएंगे। इस विकल्प के तहत 10 लाख की राशि देने के बाद वन विभाग की इनके पुनर्वास के प्रति कोई ज़िम्मेदारी नहीं रहेगी। झारखंड राज्य सरकार ने प्रथम विकल्प को और आकर्षित बनाने के लिए इसमें 5 लाख की अतिरिक्त राशि जोड़ दी। मतलब लोग 15 लाख लेकर अपने घर से बेदख़ल हो जाएं और अपने पुनर्वास की व्यवस्था खुद करें।

दूसरे विकल्प में यह कहा गया कि समुचित 10 लाख की राशि लोगों को न देकर वन विभाग उनके पुनर्वास से सम्बंधित कार्य करेगी। इस कार्य के तहत, वन विभाग लोगों को 5 एकड़ ज़मीन दिलाएगी, खतियानी हक़ दिलाएगी, उनके लिए मकान बनवाएगी और सामूहिक सुविधाएं, जैसे - सड़क, पेयजल, शौचालय, मोबाइल टावर व बिजली इत्यादि उपलब्ध कराएगी।

इन विकल्पों का अध्ययन करने के बाद कुजरूम गांव के 120 परिवारों में से 70 परिवारों ने दूसरे विकल्प को चुना, वहीं लाटू गांव के 90 परिवारों में से 57 परिवार ने दूसरे विकल्प को चुना। कुजरूम गांव वालों की सहमति से उनके विस्थापन की जगह लाई-पैलापत्थल में चुना गया, जो कि एक आरक्षित वनभूमि है। लाटू गांव वालों के लिए विस्थापन की जगह पोलपोल में चुना गया। हालांकि इस चिन्हित जगह पर लोगों की सहमति नहीं बन पाई थी, जिसे वन विभाग ने नज़रंदाज कर दिया। आज भी लाटू गांव के लोग पोलपोल जाना नहीं चाहते।

राष्ट्रीय व्याघ्र संरक्षण प्राधिकार के निर्देशानुसार वन विभाग ने लाई-पैलापत्थर में 70 परिवारों के लिए 350 एकड़, सामूहिक सुविधाएं हेतु अतिरिक्त 65 एकड़, और पोलपोल में 57 परिवारों के लिए 285 एकड़, सामूहिक सुविधाएं हेतु अतिरिक्त 48 एकड़ (अनुमानित), ज़मीन मुहैया कराने की अनुसंशा की।

सामूहिक सुविधाओं के लिए जो अतिरिक्त भूमि मुहैया करायी जा रही है, वह झारखंड पुनर्स्थापन एवं पुनर्वास नीति 2008 के अधीन है। इस नीति के तहत अगर पुनर्स्थापित क्षेत्र का दायरा 250 एकड़ से ज़्यादा होता है तो सामूहिक सुविधाएं मुहैया कराना अनिवार्य होगा। अतएव लाटू और कुजरूम से पुनर्वासित हो रहे लोगों के लिए (जिन्होंने दूसरे विकल्प को चुना है) सामूहिक सुविधाएं उपलब्ध कराना वन विभाग की ज़िम्मेदारी बनती है।

ये सभी प्रक्रिया क़ानूनी विधि के अनुरूप की जा रही है, जिसका व्याख्यान ख़ुद वन विभाग अपने पत्राचार, जो की केंद्र सरकार के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय को सम्बोधित था (दिनांक 1/04/2022), में किया है। इस पत्राचार में राज्य वन विभाग ये स्पष्ट करता है कि पुनर्वास हेतु जो ज़मीन मुहैया करायी जा रही है, उसका कुल क्षेत्र (क़रीबन 750 एकड़) खाली करायी जा रही ज़मीन के कुल क्षेत्र (क़रीबन 827 एकड़) से कम है। अतः यह पुनर्वास पर्यावरण मंत्रालय द्वारा जारी दिशानिर्देश (दिनांक 22/05/2019) का अनुपालन करता है।

जैसे-जैसे पुनर्वास का समय नज़दीक आता जा रहा है, वन विभाग का दोहरा चरित्र देखने को मिल रहा है। कुछ दिनों पूर्व वन विभाग ने विकल्पों को दरकिनार करते हुए ऐसे ग्रामीण (जिन्होंने दूसरा विकल्प चुना था) को प्रथम विकल्प के तहत 15 लाख थमा दिए। ऐसे में वन विभाग अपने निर्धारित ज़िम्मेदारियों से बचता दिख रहा है। दूसरी ओर वन अधिकारी लाटू और कुजरूम के ग्रामीणों को पर्यावरण मंत्रालय के 2019 के दिशानिर्देश का ग़लत हवाला देते हुए यह कह रहे हैं कि उनकी पुनर्स्थापित ज़मीन 5 एकड़ ना होकर केवल उतनी ही मिलेगी, जितना उनका तत्कालीन वन पट्टा है। यहां स्पष्ट कर दें कि वन पट्टा में उल्लिखित भूमि, मांगी गई भूमि से अक्सर कम रहती है।

अगर आकलन किया जाए तो वन विभाग अपनी सामूहिक सुविधाएं - बिजली, पेयजल इत्यादि उपलब्ध करने की ज़िम्मेदारियों से भी बचता फिर रहा है। झारखंड पुनर्स्थापन एवं पुनर्वास नीति 2008 के अनुसार यह जिम्मेदारियां तभी लागू होती हैं, जब पुनर्स्थापित क्षेत्र का दायरा 250 एकड़ से ज़्यादा हो। परंतु वन विभाग द्वारा वन पट्टा के समकक्ष पुनर्स्थापित ज़मीन मुहैया कराना, कुल पुनर्स्थापित क्षेत्र की सीमा को 250 एकड़ से कम पर ले आता है।

ऐसी परिस्थिति में वन विभाग न केवल अपने वादों से मुकरता दिख रहा है, बल्कि क़ानूनी विधि की भी अवहेलना कर रहा है। ऐसे में लाटू और कुजरूम के ग़रीब आदिवासी पिसते दिख रहे हैं, जिन्हें हर दिन एक नया सपना दिखाया जाता और दूसरे दिन उस सपने को तोड़ दिया जाता है। इन बदलती परिस्थितियों में कुजूरूम और लाटू वनग्राम के आदिवासी अपने हक़ के लिए दो मांगें वन विभाग के समक्ष रखते हुए कहते हैं कि हमें भी भारत का नागरिक समझते हुए हमें हमारा अधिकार दिया जाए।

ग्रामवासी कहते हैं कि यदि हमारा विस्थापन होता है तो सम्पूर्ण ग्रामीणों की सहमति से हो और हर उस वादे को पूरा किया जाए जो वन विभाग ने ग्रामीणों से किया है। वन विभाग कुजरूम के 70 एवं लाटू के 57 परिवारों के लिए 5 एकड़ ज़मीन, मकान, प्रोत्साहना राशि, खतियानी दस्तावेज़ एवं सामूहिक सुविधाएं जैसे बिजली, पानी, मोबाइल, सड़क इत्यादि उपलब्ध कराया जाए। वहीं अगर वन विभाग अपने पुनर्वास के वादे को नहीं पूरा करती है तो वह लाटू और कुजरूम में रह रहे ग्रामीणों की पीड़ा को समझे और उन्हें भारत के नागरिकों को मिलने वाले सभी सरकारी लाभ से वंचित न करें।

इस बाबत कुजरूम के ग्राम प्रधान लालू उरांव ने बताया कि पलामू व्याघ्र परियोजना के (कोर एरिया) कुजूरूम गांव के 70 परिवारों के लिए राष्ट्रीय व्याघ्र संरक्षण प्राधिकार की मार्ग दर्शिका में प्रस्तावित पुनर्वास विकल्प - 2 के तहत 5-5 एकड़ खेती योग्य जमीन, मकान, खतियानी दस्तावेज एवं सामूहिक सुविधा के तहत बिजली, पानी, सड़क मोबाइल टावर इत्यादि उपलब्ध कराने को लेकर वन विभाग द्वारा आना-कानी करने के संबंध में 4 दिसंबर 2023 को कुजूरूम गांव में ग्रामसभा का आयोजन किया गया।

ग्रामसभा में हुई चर्चा के बाद सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि जब तक वन विभाग कुजूरूम गांव के 70 परिवारों के लिए राष्ट्रीय व्याघ्र संरक्षण प्राधिकार की मार्ग दर्शिका में प्रस्तावित पुनर्वास विकल्प 2 के तहत 5-5 एकड़ खेती योग्य जमीन, मकान, जमीन की खतियानी दस्तावेज एवं सामूहिक सुविधा उपलब्ध नहीं कराती है, तब तक हम कुजूरूम गांव के निवासी गांव खाली नहीं करेंगे।

सर्वसम्मति से इस बात का भी निर्णय लिया गया कि ग्रामसभा में आज की बैठक का निर्णय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय भारत सरकार, सचिव पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय झारखंड सरकार, मुख्यमंत्री झारखंड, प्रधान सचिव झारखंड सरकार एवं उपायुक्त लातेहार को इस संबंध में पत्र प्रेषित किया जाए। ग्रामसभा के इस प्रस्ताव के बाद 6 दिसम्बर को उक्त तमाम पदाधिकारियों को रजिस्ट्री डाक से पत्र भेजा गया।

बताते चलें कि पलामू व्याघ्र परियोजना, दक्षिणी प्रमंडल, मेदिनीनगर के उप निदेशक द्वारा चतरा संसदीय क्षेत्र के सांसद सुनील कुमार सिंह, मनिका विधान सभा क्षेत्र के विधायक रामचन्द्र सिंह, लातेहार जिला परिषद अध्यक्ष श्रीमती पुनम देवी, जिला परिषद सदस्य गारू, बरवाडीह पूर्वी, बरवाडीह पश्चिमी और महुआडांड़ तथा केन्द्रीय जनसंघर्ष समिति, लातेहार-गुमला के सचिव जेरोम जेराल्ड कुजूर को पत्र भेजकर कहा गया कि विभाग द्वारा कुजरूम के 120 परिवार एवं लाटु के 90 परिवार के पुनर्वास हेतु प्रस्ताव समर्पित किया गया। प्रति परिवार 15 लाख रुपये की राशि प्रदान करने के लिए विभाग को आवंटन प्राप्त है। इसके उपरांत लाई पैलापत्थल के 166 हे0 एवं पोपोल के 133.64 हे0 वन भूमि उपयोग हेतु प्रस्ताव समर्पित किया गया। दोनों ही प्रस्ताव लाटु एवं कुजरूम गांव के लिए समर्पित किया गया।

ज्ञातव्य है कि वन भूमि का चुनाव भी लाटु एवं कुजरूम के ग्रामीणों द्वारा ही किया गया था। ग्रामीणों द्वारा 10-10 लोगों की कमेटी का निर्माण कर भूमि का चुनाव किया गया था। वहीं पत्र में कहा गया है कि वर्तमान में वनभूमि उपयोग पर मंत्रालय द्वारा यह शर्त लगाया है कि जितनी भूमि खाली होगी, उतना ही वनभूमि का उपयोग हो सकता है, अतः लाटू एवं कुजरूम के पुनर्वास के लिए 166 हेक्टेयर एवं 133.64 हेक्टेयर भूमि के उपयोग के पूर्व ये तय करना होगा कि कितनी भूमि खाली हो रही है। अधोहस्ताक्षरी का मानना है कि खाली भूमि की माप जीपीएस (गूगल मैप) से हो सकती है, क्योंकि सामुदायिक पट्टा जंगल का मिलता है, खाली जगह का नहीं। माननीय सर्वोच्च न्यायालय का आदेश एवं मंत्रालय का दिशा निर्देश इस तथ्य पर निर्भर है कि उतनी ही वन भूमि का नुकसान किया जाए, जितना वनरोपण के लिए खाली भूमि उपलब्ध हो।

वर्तमान में यह भ्रांति उत्पन्न हो रही है कि वन विभाग द्वारा ग्रामीणों को कम भूमि प्रदान की जा रही है। अधोहस्ताक्षरी का अनुरोध है कि जिला स्तरीय कमेटी का निर्माण कर सभी गाईडलाइन को ध्यान में रखते हुए लाटू एवं कुजरूम के ग्रामीणों को कितनी भूमि प्रदान की जाये, पर निर्णय लिया जाना उचित होगा। वर्तमान में अधोहस्ताक्षरी पर कम भूमि देने का आरोप लग रहा है। भविष्य में यह भी आरोप लगेगा कि नियमों की अवहेलना कर जंगल की जमीन को लाटू एवं कुजरूम के ग्रामीणों को बांट दिया गया। उस समय इस आरोप को झेलने के लिए अधोहस्ताक्षरी कोर्ट में अकेले रहेंगे।

इस राज्य में 30 प्रतिशत वन होने के बाद भी यहां वन्यप्राणियों के रहने के लिए जगह उपलब्ध नहीं है। राज्य में हाथियों की संख्या केरल, कर्नाटक आदि राज्यों से बहुत कम है, परंतु प्रतिवर्ष 100 से अधिक लोग हाथियों से मारे जा रहे हैं। यदि, इनके लिए पर्यावास का निर्माण कर, सभी हाथियों को उसी प्रर्यावास में रखा जाए, तो निर्दोष लोगों को मरने से बचाया जा सकता है। लाटू, कुजरूम एवं हेनार गांव पक्की सड़क से जुड़े हुए नहीं हैं। कोर क्षेत्र में होने के कारण भविष्य में कभी भी यहां पक्की सड़क नहीं बन सकती है। देश में बने नियमों के कारण यह परिस्थिति उत्पन्न हुई है, इसमें विभाग का कोई दोष नहीं है।

पत्र में कहा गया है कि लाटू एवं कुजरूम के ग्रामीण भूमिहीन हैं। सरकार द्वारा इन्हें रैयती जमीन प्रदान करने की कोई योजना भी नहीं है। इन्हें मुख्य सड़क के किनारे जिला मुख्यालय एवं प्रखण्ड मुख्यालय के समीप भूमि प्रदान किया जा रहा है। जहां इन्हें आवागमन, शिक्षा एवं स्वास्थ्य की बेहतर सुविधा मिलेगी। पोलपोल में स्थित भूमि कुछ वर्षों में मेदिनीनगर शहर का हिस्सा होगा। जहां भूमि की कीमत एकड़ के हिसाब से नहीं, बल्कि डिसमिल के हिसाब से लगाई जाती है। कुजरूम में कुछ परिवार में 05 से अधिक लाभुक हैं।

उदाहरण के लिए यहां के ग्राम प्रधान लल्लु उरॉव की बात की जाए, तो इनके परिवार से ही 06 लाभुक हैं। यदि 04 लाभुक को विकल्प-1 एवं 02 लाभुक को विकल्प-2 में रखा जाए, तो ऐसी परिस्थिति में लल्लु उरॉव के परिवार को खाते में 60 लाख रुपये, 10 एकड़ रैयती भूमि तथा मकान निर्माण तथा सुविधाओं के विकास के लिए 30 लाख रूपये अलग से खर्च किए जायेंगे। क्या किसी भूमिहीन आदिवासी परिवार के विकास के लिए सरकार के पास इससे बेहतर योजना है? अतः अनुरोध है कि समिति का निर्माण कर उपलब्ध भूमि एवं उपलब्ध राशि को लाटु एवं कुजरूम के ग्रामीणों के बीच किस तरह से बांटा जाए, इस पर निर्णय लेने की कृपा की जाए। समिति का निर्णय अधोहस्ताक्षरी को मान्य होगा।

उप निदेशक के पत्र पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए और वन विभाग पर कई सवाल उठाते हुए केन्द्रीय जनसंघर्ष समिति, लातेहार-गुमला के सचिव जेरोम जेराल्ड कुजूर कहते हैं - पलामू व्याघ्र परियोजना के उप निदेशक ने मुख्य मीडिया और सोशल मीडिया के माध्यम से सांसद सुनील कुमार सिंह, चतरा संसदीय क्षेत्र, विधायक रामचन्द्र सिंह, मनिका विधान सभा क्षेत्र, श्रीमती पूनम देवी अध्यक्ष - जिला परिषद लातेहार, जिला परिषद सदस्य, गारु/बरवाडीह पूर्वी/ बरवाडीह पशिमी/ महुआडांड़ और मेरे नाम पर (जिसमें मेरा पता ही गलत है) पत्रांक- 959, दिनांक- 28,11,2023 को जारी पत्र में कुजूरूम और लाटू गांव के पुनर्वास के लिए ज़िला स्तरीय समिति बनाने का अनुशंसा कर रहे हैं, जबकि इन दोनों गांव के पुनर्वास की जिम्मेदारी पलामू व्याघ्र परियोजना और जिला पुनर्वास कमिटी की है।

उप निदेशक के पत्र के अनुसार, मंत्रालय द्वारा जारी दिशा निर्देश का उल्लेख करते हुए वे कहते हैं कि 'जितनी भूमि ख़ाली होगी, उतनी ही वन भूमि का उपयोग हो सकता है।“ उप निदेशक जी का कहना है कि समिति बनाकर इस बात का हल निकाला जाए कि किसे कितनी भूमि और राशि दी जाएगी।'

इसके विरोध का कारण दो महत्वपूर्ण बिंदुओं पर केंद्रित है। पहला - यह एक स्वैछिक पुनर्वास योजना है, जिसके तहत लाटू और कुजूरूम के ग्रामीणों ने स्वैछा से पुनर्वास की शर्तों को माना था। इन शर्तों के अनुसार, सरकार ग्रामीणों (जिन्होंने ने पुनर्वास का दूसरा विकल्प चुना था) को 5 एकड़ भूमि (खेती करने योग्य बनाकर एवं उनके नाम पर रजिस्ट्री कराकर) और मूल-भूत सुविधाएं मुहैया कराएगी। इन शर्तों का ज़िक्र ख़ुद वन विभाग के तत्कालीन उप निदेशक, पलामू व्याघ्र परियोजना के मुकेश कुमार ने अपने पत्राचार में केंद्र सरकार के वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय,भारत सरकार को भेजा है।

इसी पत्र के आधार पर केन्द्रीय मंत्रालय ने कुजूरूम एवं लाटू गांव को पुनर्वासित करने की अनुमति दी है। उपर्युक्त दस्तावेजों को forestsclearance.nic.in/online_status.aspx में देखा जा सकता है। अगर सरकार इन किसी भी शर्तों को बदलती है, तो ग्रामीणों द्वारा दी गयी स्वैछा स्वयं वापस हो जाती है, अर्थात वह स्वेच्छा मान्य नहीं रहेगी।

दूसरा बिंदु - वन विभाग ने इस पुनर्वास की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए जिन दस्तावेज़ों पर मुहर लगायी थी और पत्राचार के मध्यम से केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय को भेजा था, उसमें ये साफ़ साफ़ ज़िक्र है कि प्रत्येक पुनर्वासित परिवार को 5 एकड़ एवं मूल सुविधाएं दी जाएगी (जिसमें घर तक का नक़्शा शामिल है)। इन दस्तावेज़ों के उपरांत ही वन विभाग को पुनर्वास के लिए सहमति मिली थी। इस पत्राचार में यह भी वर्णित था कि ख़ाली करायी जा रही ज़मीन का कुल क्षेत्रफल 331 हेक्टर है, जो की बसायी जाने वाली ज़मीन के कुल क्षेत्रफल (300 हेक्टर) से ज़्यादा है, अतएव यह मंत्रालय के दिशा निर्देशों के अनुरूप है। इस वर्णन के बाद ही वन विभाग को पुनर्वास की प्रक्रिया आगे बढ़ाने के लिए केंद्रीय मंत्रालय से सहमति मिली, परंतु अगर वन विभाग अब इन मूल मुद्दों से भटकती है, तो पुनर्वास की सारी प्रक्रिया (जिसमें केंद्र से सहमति शामिल है) निराधार हो जाती हैं।

केन्द्रीय जनसंघर्ष समिति लातेहार-गुमला के सचिव जेरोम जेराल्ड कुजूर आगे कहते हैं ज़िला स्तरीय समिति बनाने का कोई तर्क नहीं है, जब वन विभाग न ही अपने क़ानूनी प्रक्रिया को मान रहा है और न ही लोगों की स्वैछा को। अतः वन विभाग के वर्तमान प्रक्रिया पर मेरा विरोध स्वाभाविक है। केन्द्रीय जनसंघर्ष समिति, लातेहार-गुमला के सचिव जेरोम जेराल्ड कुजूर बड़े ही दुखी स्वर में कहते हैं कि वन विभाग की इस वादा खिलाफी से इन गांवों के आदिवासियों की आवाज कोई सुनने को तैयार नहीं है। वे कहते हैं कि यह जितना गंभीर मसला है उस हिसाब से इसकी गंभीरता को यहां का मीडिया भी नहीं समझ पा रहा है जबकि मीडिया समाज, देश, काल का आईना होता है। मीडिया केवल विभागीय अघिकारियों को अधिक तरजीह देता दिख रहा है, जो काफी निराशाजनक बात है।

बताना जरूरी होगा कि राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण ( एनटीसीए ) की स्थापना टाइगर टास्क फोर्स की सिफारिश के बाद दिसंबर 2005 में की गई थी। जो संशोधित रूप में 4 सितंबर 2006 को लागू हुआ। यह अधिनियम बाघ और अन्य लुप्तप्राय प्रजाति यानी वन्यजीव अपराध नियंत्रण बनाने का प्रावधान करता है। इसके अलावा यह टाइगर रिजर्व के आसपास के क्षेत्रों में स्थानीय लोगों के आजीविका के हितों को सुनिश्चित सहित और यह सुनिश्चित करेगा कि अनुसूचित जनजातियों और आसपास रहने वाले ऐसे अन्य लोगों के अधिकारों में हस्तक्षेप या प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। वहीं अनुसूचित जनजातियों और ऐसे अन्य वन निवासियों के हितों की रक्षा करते हुए कोर (क्रिटिकल) और बफर (परिधीय) क्षेत्रों को परिभाषित किया गया है।

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