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झारखंड

देश की कोयला राजधानी का काला सच, जान जोखिम में डालकर कम मजदूरी पर काम कर रहे मजदूर

Janjwar Desk
8 Feb 2021 1:36 PM GMT
देश की कोयला राजधानी का काला सच, जान जोखिम में डालकर कम मजदूरी पर काम कर रहे मजदूर
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छात्र नेता सोमनाथ कहते हैं, वर्तमान में जो स्थिति आप इस इलाके में देख रहे हैं। पहली बात तो यह है कि पहले जब कोयला मंत्रालय जब यहां खुद खनन कराता था तो उनके मजदूरों की तनख्वाह इसी काम के लिए 80-90 हजार रुपये के आसपास होती थी।

अजय प्रकाश की ग्राउंड रिपोर्ट

धनबाद। इस देश में कोयला की अपनी एक दुनिया है। जिसकी बदौलत ये देश चमकता है, महानगरों में आपको उजाला दिखाई देता है, आप दिन रात भूल जाते हैं दरअसल उसके पीछे कोयला खदानों में काम करने वाले मजदूर हैं। भारत की कोयला राजधानी के नाम से मशहूर धनबाद में कोयला मजदूर बहुत कम पैसे पर जान जोखिम में डालकर मजदूरी करते हैं। जनज्वार' कोयलरी में काम करने वाले मजदूरों की असल हालत जानने की कोशिश की।

कोयलरी में कोयला उठाने वाले मजदूरों से जब सवाल पूछा कि अभी तो मशीनें ज्यादा आने लगेंगी तो बेरोजगारी बढ़ेगी ? इस पर एक मजदूर कहते हैं, बेरोजगारी तो वैसे भी है ही। हम तो बैठे रहते हैं। हमें काम ही नहीं मिलता है। लोडिंग के लिए चार दिन में गाड़ी मिलती है। एक दूसरा मजदूर कहते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी युवाओं के लिए कुछ नहीं किया है। हम तक उनकी कोई योजना नहीं पहुंचती हैं। हम लोग सिर्फ मजदूरी करते हैं, वहीं खाते हैं, उसी पर जिंदा हैं। मनरेगा के काम लेकर सवाल करने पर एक मजदूर ने बताया कि दो साल से नरेगा में काम नहीं मिला है।

छात्र नेता सोमनाथ कहते हैं, वर्तमान में जो स्थिति आप इस इलाके में देख रहे हैं। पहली बात तो यह है कि पहले जब कोयला मंत्रालय जब यहां खुद खनन कराता था तो उनके मजदूरों की तनख्वाह इसी काम के लिए 80-90 हजार रुपये के आसपास होती थी।

[ छात्र नेता सोमनाथ ]

''इसी में जो बीसीसीएल मजदूर के मजदूर हैं, जिनकी संख्या पहले 80 हजार के आसपास थी अब वह 20-30 हजार रह गई है। बीसीसीएल स्थायी रोजगार के तौर पर मजदूरों की बहाली नहीं करना चाहता है। इसके लिए वह कोयला खनन क्षेत्र को प्राइवेट कंपनी को आउटसोर्स में दे देती है। अगर वह खुद कोयला निकाले तो उसे सरकारी नीति के आधार पर उन्हें वह चलाना पड़ेगा। यहां कॉमरेड एके राय के समय से कोल श्रमिकों को लेकर कई आंदोलन हुए हैं।''

एक मजदूर ने कहा कि मोदी सरकार में हमें कोई फायदा नहीं हुआ है। मैं पढ़ा लिखा हूं। 12वीं पास हूं। कांग्रेस सरकार सबसे ज्यादा नौकरी रेलवे में देती थी। लेकिन मोदी सरकार में पिछले पांच साल में एक बार ही ग्रुप डी का फॉर्म भरा है। घपलेबाजी हो रही है। ये सब कांग्रेस राज में नहीं होता था। इस देश में पढ़ाई लिखाई करने वाले को कुछ हासिल नहीं होता है। वह मजदूरी करने जाएगा तो उसे शर्म आएगा ही।

जब उनसे पूछा कि आप रोज का कितना रूपये कमा लेते हैं। तो उन्होंने कहा कि रोज कहां कमा लेते हैं। सुबह पांच बजे आए हुए हैं और रात नौ बजे घर जाएंगे। कभी-कभी 200-300 रूपये कमा लेते हैं।

डुमूरकुंडा के पूर्व नगर उपाध्यक्ष दीपक बताते हैं कि यहां का जो मजदूर है। छोटा-मोटा व्यवसाय करता है। कोरोना काल में पूरा व्यवसाय तो बंद था। बहुत से युवक यहां से दूसरे प्रदेशों में पलायन कर चुका है।

लॉकडाउन से इलाका कितना प्रभावित हुआ, यह सवाल जब पूर्व विधायक अरूप चटर्जी से पूछा तो उन्होंने कहा कि यहां कोरोना का बहुत असर नहीं हुआ लेकिन सबसे ज्यादा गरीब मजदूर प्रभावित हुए। चूंकि कोयला ट्रक, हाईवे, रेल से जाता है तो ये जो काम तमाम मजदूर करते थे, उनपर काफी असर हुआ।

[ पूर्व विधायक अरूप चटर्जी ]

एक अन्य स्थानीय व्यक्ति ने कहा कि मोदी सरकार में कोयला मजदूरों की परिस्थिति दयनीय है। चौतरफा आउटसोर्सिंग खुल गया है। मोदी सरकार आने के बाद तमाम फैक्टरी जैसे कोयलरी निजी हाथों में जा रहा है। निजीकरण में मजदूरों की ऐसी हालत है कि जहां मजदूरों को 1000 रूपये हाजिरी मिलता था अब मजदूरों को 150-200 रूपये मिलता है। अभी हैंड लोडिंग का जो काम चल रहा है एक टन लोड करने पर एक मजदूर को 170-180 रूपये मिलता है। मजदूरों की कोई सुरक्षा नहीं है।

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