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झारखंड में शिबू सोरेन व दीपक प्रकाश राज्यसभा के लिए चुने गए, पहली बार थैलीशाह व केंद्रीय नेताओं से मुक्त हुआ चुनाव

Janjwar Desk
19 Jun 2020 2:27 PM GMT
झारखंड में शिबू सोरेन व दीपक प्रकाश राज्यसभा के लिए चुने गए, पहली बार थैलीशाह व केंद्रीय नेताओं से मुक्त हुआ चुनाव
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जीत के बाद दीपक प्रकाश का अभिनंदन करते भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ओम माथुर, विधायक दल के नेता बाबूलाल मरांडी व अन्य.
झारखंड में पहली बार राज्यसभा चुनाव में थैलीशाह व केंद्रीय नेता नहीं थे। तीनों उम्मीदवार स्थानीय राजनीतिक कार्यकर्ता थे। इस चुनाव में शिबू सोरेन व दीपक प्रकाश को जीत मिली...

जनज्वार, रांची। झारखंड में राज्यसभा की दो सीटों पर हुए चुनाव में एक सीट मुख्य सत्ताधारी दल झामुमो और एक सीट भाजपा के खाते में गई है। झारखंड मुक्ति मोर्चा से पार्टी के अध्यक्ष शिबू सोरेन उम्मीदवार थे और उन्हें जीत मिली है। वहीं, भाजपा की ओर से प्रदेश अध्यक्ष दीपक प्रकाश उम्मीदवार बनाए गए थे, जो चुनाव जीत गए हैं। दीपक प्रकाश का मुकाबला कांग्रेस के शाहजादा अनवर से था।

81 सदस्यीय झारखंड विधानसभा में इस समय 79 विधायक हैं। ऐसे में जीत के लिए 27 विधायकों का समर्थन चाहिए। प्राप्त जानकारी के अनुसार, शिबू सोरेन को 30 विधायकों का, दीपक प्रकाश को 31 विधायकों व कांग्रेस के शाहजादा अनवर को 18 विधायकों का समर्थन हासिल हुआ। चुनाव में सभी विधायकों ने मतदान किया।


चुनाव में किसी भी तरह की चूक न रह जाए इस वजह से भाजपा ने अपने विधायकों को रांची के सरला बिरला स्कूल परिसर में रख रखा था। इस बार का चुनाव इस मायने में भी खास रहा कि बाहर के थैलीशाह व बड़े कारोबारियों की जगह विशुद्ध स्थानीय राजनीतिक कार्यकर्ता चुनाव मैदान में थे। शिबू सोरेन को उनकी पार्टी से बाहर के एक विपक्षी विधायकों का समर्थन मिला है। झामुमो के पास 29 विधायक हैं और ऐसा उनके राजनीतिक कद के मद्देनजर हुआ है।

सत्तापक्ष के समर्थन में सरकार में शामिल राजद के एक विधायक सहित, भाकपा माले व एनसीपी के एक-एक विधायक थे।

शिबू सोरेन मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के पिता हैं और पूर्व में राज्य के मुख्यमंत्री व केंद्रीय मंत्री रहे हैं। वे कई बार लोकसभा चुनाव जीत चुके हैं और झारखंड से सबसे कद्दावर नेता हैं।

वहीं, भाजपा के दीपक प्रकाश संगठन से जुड़े आदमी हैं। वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के रास्ते भाजपा में आए। दीपक प्रकाश विनम्र व सबको साथ लेकर चलने की छवि वाले नेता हैं। इस कारण उनके नाम पर विपक्ष के विधायकों को एकजुट करना भाजपा के रणनीतिकारों के लिए अधिक आसान हुआ।

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