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Police Custody Death : देश में पिछले तीन वर्षों में पुलिस हिरासत में 348 लोगों की गई जान, कितने दोषी अफसरों पर हुई कार्रवाई सरकार के पास नहीं जवाब

Janjwar Desk
12 Oct 2021 11:58 AM GMT
Police Custody Death : देश में पिछले तीन वर्षों में पुलिस हिरासत में 348 लोगों की गई जान, कितने दोषी अफसरों पर हुई कार्रवाई सरकार के पास नहीं जवाब
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(देश में पिछले तीन वर्षों में पुलिस हिरासत में 348 लोगों की मौत हुई : लोकसभा में केंद्रीय गृह राज्यमंत्री नित्यानन्द राय)

Police Custody Death : पीएम मोदी के गृहराज्य गुजरात में बीते तीन सालों में सबसे ज्यादा पुलिस हिरासत में मौतें हुई हैं।

Police Custody Death। पुलिस हिरासत (Police Custody) में मौतें किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए शर्मनाक कही जाएगी। जो लोग पुलिस हिरासत में लिए जाते हैं, उनके अपराधी होने का संदेह भले हो, लेकिन उनका अपराध (Crime) साबित नहीं हुआ होता है। इसलिए उनके साथ क्रूरतापूर्ण व्यवहार की इजाजत संविधान नहीं देता। केंद्रीय गृह राज्यमंत्री नित्यानन्द राय (Nityanand Rai) ने लोकसभा (LokSabha) में एक सवाल के जवाब में बताया कि देश में पिछले तीन वर्षों में पुलिस हिरासत में 348 लोगों की मौत हुई और 1,189 लोगों को यातनाएं दी गईं।

इसके साथ दिए गए वर्षवार आंकड़े बताते हैं कि हर साल इस संख्या में कमी देखी गई है। 2018-19 में 136 लोगों की मौत हुई थी, जो 2019-20 में घटकर 112 हुई और 2020-21 में और कम होकर 100 पर आ गई। मगर इसी सवाल के अगले हिस्से में यह भी पूछा गया था कि इन मौतों के लिए दोषी अफसरों के खिलाफ किस तरह की कार्रवाई की गई। इसका जवाब केंद्र सरकार के पास नहीं था क्योंकि कानून व्यवस्था और पुलिस से जुड़े मामले राज्य सरकार के अंतर्गत आते हैं।

ऐसे में सवाल यह उठता है कि राज्य सरकारें ऐसे मसलों को किस रूप में देखती हैं और क्या वे इसे पर्याप्त अहमियत देती हैं। औपचारिक तौर पर दावे चाहे जो भी किए जाएं, विभिन्न रिपोर्टों के आंकड़ों का अधूरापन बताता है कि उस तरह की पारदर्शिता बरतने में हमारी सरकारों की दिलचस्पी नहीं है, जैसी कि किसी लोकतांत्रिक देश में अपेक्षा की जाती है। उदाहरण के लिए, एनसीआरबी (National Crime Records Beureu) के आंकड़ों के मुताबिक पिछले दस वर्षों में देश में हिरासत में हुई कुल 1004 मौतों में से 40 फीसदी या तो स्वाभाविक मौत थी या फिर बीमारी का परिणाम।

इसके अलावा 29 फीसदी मौतें खुदकुशी थीं। यानी 69 फीसदी मौतों के लिए ये दोनों कारण जिम्मेदार थे। फिर भी इन रिपोर्टों से यह स्पष्ट नहीं होता कि बीमारी लंबे समय से चल रही थी या अचानक हुई या पुलिस हिरासत में मारपीट का नतीजा थी। यही नहीं, हिरासत में होने वाली मौतों की संख्या को लेकर भी एनसीआरबी और एनएचआरसी (National Human Rights Commission) के आंकड़ों में अक्सर अंतर देखा जाता है। जानकारों के मुताबिक इस मामले में सरकारी तंत्र को उत्तरदायी बनाने की राह में एक बाधा यह भी है कि मौजूदा कानूनों के मुताबिक संबंधित पुलिस अधिकारियों पर मुकदमा चलाने के लिए सरकार की पूर्वानुमति लेनी पड़ती है और अमूमन सरकारें इस मामले में उदार रुख नहीं अपनातीं।

देश के अलग- अलग राज्यों में पिछले 3 वर्षों के दौरान पुलिस हिरासत में मौत की संख्या देखा जाए तो गुजरात में यह संख्या अधिक है। गुजरात में 2018 में 13 लोगों की पुलिस हिरासत में मौत हुई, वहीं इसके बाद मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश का नंबर आता है इन दोनों ही राज्यों में 2018 में पुलिस हिरासत में मरने वालों की संख्या 12-12 है। तीसरे नंबर पर महाराष्ट्र और तमिलनाडु है यहां 11-11 लोगों की पुलिस हिरासत में मौत हुई। दिल्ली में 8 और बिहार में 5 लोगों की मौत इस वर्ष पुलिस हिरासत में हुई।

2019 में पुलिस हिरासत (Police Custody) में सबसे अधिक मौत मध्यप्रदेश (Madhya Pradesh) में हुई। इस साल यहां पुलिस कस्टडी में 14 लोगों की मौत हुई। वहीं गुजरात में इस वर्ष 12 लोगों की तो वहीं तमिलनाडु में भी 12 लोगों की मौत पुलिस कस्टडी में हुई। दिल्ली में 9 लोगों की मौत हुई तो वहीं बिहार में 5 और उत्तर प्रदेश में इस वर्ष 3 लोगों की मौत हुई।

2017 से लेकर 2019 तक देश में राजनीतिक कारणों के लिए हत्या के मकसद के तहत कुल 213 मामले दर्ज किये गये। इनमें सर्वाधिक 98 मामले 2017 में दर्ज किये गये। 2018 में 54 और 2019 में 61 ऐसे मामले दर्ज किये गये। लोकसभा में दिये गए लिखित उत्तर के अनुसार, एनसीआरबी के 2019 तक के आंकड़े उपलब्ध हैं और आंकड़ों के अनुसार तीन साल में ऐसे मामलों में पीड़ितों की कुल संख्या 230 रही। 2017 में ऐसे सर्वाधिक मामले झारखंड में दर्ज हुए जिनकी संख्या 42 रही। इनमें पीड़ितों की संख्या भी 42 रही। 2018 में इस तरह के सर्वाधिक मामले बिहार में दर्ज किये गये जिनमें प्रकरण और पीड़ितों की संख्या 9-9 रही।

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