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EXCLUSIVE : 'मिशन शक्ति' के फ्रॉड का शिकार बना पेंटर, बच्चे की फीस को भी नहीं पैसे

Janjwar Desk
14 Dec 2020 1:13 PM GMT
EXCLUSIVE : मिशन शक्ति के फ्रॉड का शिकार बना पेंटर, बच्चे की फीस को भी नहीं पैसे
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कानपुर के गोविंदनगर निवासी अमित पुत्र जगदीश पेंटिंग का काम करता है, उसका कहना है कि उसे रानियां के रायपुर का रहने वाला एक ठेकेदार 'मिशन शक्ति' की पेंटिंग का काम करने के लिए अयोध्या ले गया था...

जनज्वार ब्यूरो/कानपुर। उत्तर प्रदेश में चल रहा योगी आदित्यनाथ सरकार का परम महत्वकांक्षी प्रोजेक्ट मिशन शक्ति शुरू से सुर्खियों में है। अब एक नया मसला प्रकट हुआ है। नया वो कि इसके प्रोजेक्ट के तहत किये जा रहे प्रचार प्रसार की पेंटिंग करने वाले एक पेंटर के साथ फ्रॉड हो गया है। पेंटर के मुताबिक उसे उसके ठेकेदार ने सरकार की मिशन शक्ति का काम कराकर ठग लिया।

कानपुर के गोविंदनगर निवासी अमित पुत्र जगदीश पेंटिंग का काम करता है। उसका कहना है कि उसे रानियां के रायपुर का रहने वाला एक ठेकेदार 'मिशन शक्ति' की पेंटिंग का काम करने के लिए अयोध्या ले गया था। वहां उसका काम बहुत बढ़िया बताकर दो दिन बिठाए रहा। दो हफ्ते चले काम के बाद उसने महज हजार रुपये ही दिए। बाकी के रुपये उसने खाते में भेज देने की बात कही थी। अभी कई रोज बीत गए उसके खाते में एक भी रुपये नहीं आया है।

फ्रॉड का शिकार अमित 'जनज्वार' से बात करते हुए आगे बताता है कि वह 20 नवंबर 2020 को अयोध्या में मिशन शक्ति के तहत वॉल पेंटिंग इत्यादि करने के लिए गया था। वह वहां रनिया सरवनखेड़ा निवासी ठेकेदार दीपक सिंह जो खुद पेशे से पेंटर है के साथ काम करने गया था। दीपक ने अमित से पहले 7 सौ रुपये दिहाड़ी पर ले जाने के बाद पहुंचते ही 500 रुपये कर दी। अमित इसपर भी तैयार हो गया और काम करता रहा।

'जनज्वार' से बात करते हुए अमित के पिता जगदीश के मुताबिक जब दीपक उनके पुत्र को काम पर ले गया था तब उनने उसके कहने पर अमित को पड़ोसी से कर्जा मांगकर 1 हजार रुपया दिया था। दीपक ने कहा था कि चाचा अमित के हाथ ये रुपये भिजवा दूंगा। अब एक-डेढ़ हफ्ते बाद जब अमित वापस लौट कर आया तो ठेकेदार दीपक सिंह ने उसे एक हजार रुपये दिए। इतने तो वह मुझसे पहले ही ले जा चुका है। ऐसे काम मे क्या स्वारथ हुआ, जिसमे घर के धान पयारे में लगें।

अमित कहता है कि वह अपने बड़े भाई जो किराए पर सीएनजी चलाते हैं, उसके बच्चे की फीस भी भरता है। लॉकडाउन और उसके बाद उसके भाई की कमाई मध्यम होने या कभी नहीं होने के बाद वो भी जहां तहां कुछ कमाकर घर के खर्चों में मददगीर बनता था। अपने भाई के बच्चे की फीस भर दिया करता था, जो अब इस तरह के काम से सिवाय सदमे के कुछ नहीं मिलता। उसका कहना है कि ऐसा अधिकतर सरकारी कामो वाले कामों में ही होता है। लेकिन फिर भी ठेकेदार की कुछ जिम्मेदारी भी होती है, बावजूद इसके दीपक सिंह ने फ़ोन उठाना ही बन्द कर दिया है।

अमित ने 'जनज्वार' संवाददाता को एक मोबाइल नम्बर दिखाते हुए कहा कि ना मानो तो आप ही लगा के देख लो। हमने वो नम्बर डायल किया। पहली तो नहीं पर दूसरी बार मे नम्बर उठा गया। उधर से बात करने वाले को हमने हमारा परिचय दिया तो बोला कि 'हां बताव।' हमने उससे उसका नाम पूछा और एक बार फिर अपना परिचय दिया। जिसके बाद उसने हमसे बात की। हमने उसे पूरा मामला बताया तो ओहले उसने इधर-उधर करने की कोशिश की बाद में बोला कि 'भाई साहब मैं आपको शाम में बात करूंगा तब पूरी बात बताऊंगा।'

शाम के इंतजार में रात हो गई। ठेकेदार दीपक सिंह का फ़ोन नम्बर हमारे मोबाइल की स्क्रीन पर एक बार चमका तो पर चमककर फिर बुझ गया। हमने उसका नम्बर देखकर वापस फ़ोन किया। पर फिर फ़ोन ना उठा और ना ही उठना था। और गलत आदमी फोन उठाता भी कहां है। अमित अपने बड़े भाई के बेटे का हाथ पकड़े हुए असहाय सा हो चुका हमारे सामने खड़ा है। लेकिन इसे जवाब देने के लिए हमारे पास शब्द नहीं है। और इन शब्दों को समझने के लिए सरकार नहीं है।

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