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उत्तर प्रदेश

ठंड के इस सीजन में भी कानपुर विश्व बैंक बस्ती के लोग कर रहे हैं पानी की किल्लत का सामना

Janjwar Desk
30 Dec 2020 10:24 AM GMT
ठंड के इस सीजन में भी कानपुर विश्व बैंक बस्ती के लोग कर रहे हैं पानी की किल्लत का सामना
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दो-दो निगम पार्षदों वाले इस मुहल्ले में पानी की लड़ाई को 10 साल हो चुके हैं, लोग कभी बंगलेनुमा बने घरों से तो कभी किसी पड़ोस के हैंडपंप से पानी मांगकर गुजारा कर रहे हैं.......

कानपुर से मनीष दुबे की रिपोर्ट

जनज्वार ब्यूरो। ठंड के सीजन में पानी के लेबल का कुदरती तौर पर ठीक हो जाना कहा सुना और बताया जाता है। बावजूद इसके शहर के विश्व बैंक की दो मलिन बस्तियों में पानी की किल्लत चल रही है। ठंड के समय मे यह हाल है तो गर्मी के सीजन में हालात और भी अधिक बदतर हो जाते हैं।

दो-दो निगम पार्षदों वाले इस मुहल्ले में पानी की लड़ाई को 10 साल हो चुके हैं। लोग कभी बंगलेनुमा बने घरों से तो कभी किसी पड़ोस के हैंडपंप से पानी मांगकर गुजारा कर रहे हैं। जिम्मेदार सुबह और शाम में बर्तन धोने और नहाने मात्र भर का पानी देकर अपनी जिम्मेदारियों से पिंड छुड़ा लेते हैं। जबकि इनके पास पीने के लिए एक एक बूंद पानी की किल्लत होती है।

यहां रहने वाले 84 वर्षीय बुजुर्ग रामशंकर बताते हैं कि ये हाल ठंड का है, गर्मी में 4-4 दिन पानी नहीं आता। ये समस्या देखते देखते 10 साल हो चुके हैं, लेकिन यहां के हालातों में कोई अंतर नहीं आया। कहीं जाओ तो कोई सुनवाई ही नहीं होती। सुनवाई तो इस समय सिर्फ उसकी हो रही जो सफेद कपड़े पहने हो और लाल टीका लगाए हो।

यहां पिछले 12 साल से रह रहे 53 वर्षीय कामता प्रसाद ने बताया कि पार्षद अर्पित यादव से जाकर कहने पर 2-4 दिन तो पानी ठीक आता है बाद में फिर से वही हालात हो जाते हैं। हमारी समस्या का कोई भी निराकरण ही नहीं होता। इस बस्ती में 150 से 200 घर हैं और सभी गरीब लोग रहते हैं। कुल आबादी पूछने पर ढाई से तीन हजार मय बच्चों सहित बताई जाती है।


इसी बस्ती का रहने वाला रामजी कहता है कि सामने वाले शौचालय में कई कई घंटे पानी चलाकर भैंसों को नहलवाया जाता है, जब हम लोग पानी मांगते हैं तो डांट कर भगा दिया जाता है। कहते हैं कि पानी भरायेंगे तो हमारी मोटर जल जाएगी। यहीं का निवासी मनोज कुमार भी रामजी के सुर में सुर मिलाते हुए कहता है कि हमे पानी भरवाने से मोटर जल जाएगी और घण्टों भैंसें नहलवाने से मोटर नहीं जलेगी।

विश्व बैंक के D ब्लॉक और C ब्लॉक को मिलाकर एक ठीक ठाक आबादी है जिसके पास पीने वाले पानी की किल्लत है। इन दोनों ब्लॉको में नाले के उस पार पार्षद जितेंद्र सचान का क्षेत्र है जो भाजपा के पार्षद हैं तो नाले के इस तरफ समाजवादी पार्टी के पार्षद अर्पित यादव का क्षेत्र लगता है। लेकिन दोनों ही पार्षदों के बीच किसी थाने की सीमा जैसा विवाद और मुद्दा सालों से लटका है, जिसमें हजारों की संख्या में ये गरीब बिन पानी पिस रहे हैं।

इस मुहल्ले की किरन, गीता, राजेश वर्मा, आरती, मुन्नी, सोनी, रश्मि, पार्वती, उषा, पूरनलाल वर्मा इत्यादि सैंकड़ो लोग अपना गुस्सा जाहिर करते हुए बताते हैं कि भैया कइयो दफे हम लोगन की फोटू खींच के लइ गए पर आज तक समस्या नहीं खतम हो पाई। बताइए हमारे छोटे-छोटे बच्चे हैं, पूरे पूरे दिन पियासे रहते हैं। ये पानी जो आता है इतना बदबू करता है कि पीने लायक है ही नहीं।

पानी भरने का भी जो सिस्टम है वह भी अपने आप मे अलबेला है। एक से डेढ़ हाथ की लगी रबड़ जो नाले में जाकर खुल रही है उसमें ही बर्तन रखकर भरे जाते हैं। एक नल या टोंटी तक नहीं लगी है। पानी दो टाइम सुबह और शाम आता है। सरकारी सप्लाई वाला जो पीने लायक तो कतई नहीं कहा जा सकता है।

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