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Prayagraj News: योगी-राज में अकबर इलाहाबादी बनाये गए अकबर प्रयागराजी, शिक्षा आयोग की वेबसाइट पर बदले गए नाम!

Janjwar Desk
28 Dec 2021 2:23 PM GMT
Prayagraj News: योगी-राज में अकबर इलाहाबादी बनाये गए अकबर प्रयागराजी, शिक्षा आयोग की वेबसाइट पर बदले गए नाम!
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Prayagraj News: शहरों और स्टेशनों का नाम बदलने के बाद अब उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने नया कांड कर दिया है। योगी आदित्यनाथ की सरकार ने अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ साहित्यिक तलवार चलाने वाले क्रन्तिकारी शायर अकबर इलाहाबादी का नाम को बदल दिया है।

Prayagraj News: शहरों और स्टेशनों का नाम बदलने के बाद अब उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने नया कांड कर दिया है। योगी आदित्यनाथ की सरकार ने अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ साहित्यिक तलवार चलाने वाले क्रन्तिकारी शायर अकबर इलाहाबादी का नाम को बदल दिया है। अकबर इलाहाबादी अब अकबर प्रयागराजी के नाम से जाने जाएंगे। योगी सरकार के इस कारनामे की साहित्य जगत में तीखी आलोचना हो रही है।

दरअसल, यह कारनामा उत्तर प्रदेश उच्चतर शिक्षा आयोग (UPHESC) ने किया है। आयोग ने अपनी आधिकारिक वेबसाइट uphesc.org के अबाउट अस कॉलम के अबाउट इलाहाबाद सब कॉलम में दे रखा है। इसमें इलाहाबाद (अब प्रयागराज) का इतिहास लिखा गया है। इसमें अकबर इलाहाबादी को अकबर प्रयागराजी के रूप में मशहूर शायर बताया गया है। साथ ही तेग इलाहाबादी को तेग प्रयागराजी और राशिद इलाहाबादी को राशिद प्रयागराजी बताया गया है।


मामले पर बवाल बढ़ने के बाद उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग के अध्यक्ष ईश्वर शरण विश्वकर्मा ने कहा कि उन्हें इस बारे में कोई जानकारी नहीं है। मशहूर कथाकार राजेंद्र कुमार ने उच्चतर शिक्षा आयोग के इस बदलाव को मूर्खता करार दिया है। राजेंद्र कुमार कहते हैं कि, 'नाम तो शहर का बदला गया है, लेकिन कोई कालजयी साहित्यकार अपने नाम के आगे इलाहाबादी लिखता रहा है और वही उसकी पहचान है तो उसे कैसे बदला जा सकता है? यह तो इतिहास को मिटाने जैसा काम है। आयोग को इसे तत्काल ठीक करना चाहिए।'

अकबर इलाहाबादी की शायरी ज़माने और ज़िंदगी का आईना दिखाने वाली होती हैं. 'हम आह भी करते हैं तो हो जाते हैं बदनाम, वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होता' और हंगामा है क्यूँ बरपा थोड़ी सी जो पी ली है, डाका तो नहीं मारा चोरी तो नहीं की है' जैसी सदाबहार लाइनें लिखने वाले इस शायर की लिखी नज्में आज के जमाने में भी इतनी मौजूं होती हैं कि कोई इन्हें पढ़कर यकीन नहींं कर सकता कि वे 175 साल पहले जन्मे होंगे. उन्होंने अपने दौर में अंग्रेज़ हाकिमों की परवाह किए बिना अपनी कलम चलाई और आज हुकूमत के कुछ महकमे उनके ही नाम को बदले दे रहे हैं.

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