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उत्तर प्रदेश

वाराणसी में दर्ज मुकदमे के खिलाफ हाईकोर्ट पहुंचे Scroll के नरेश फर्नांडीस और सुप्रिया शर्मा

Janjwar Desk
27 Jun 2020 11:35 AM GMT
वाराणसी में दर्ज मुकदमे के खिलाफ हाईकोर्ट पहुंचे Scroll के नरेश फर्नांडीस और सुप्रिया शर्मा
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सुप्रिया शर्मा और नरेश फर्नांडीस की ओर से अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर, श्वेताश्व अग्रवाल और राघव द्विवेदी की अगुवाई में यह याचिका दायर की गई है। याचिका में एफआईआर की वैधता और शुद्धता को चुनौती दी गई है....

जनज्वार ब्यूरो। पीएम नरेंद्र मोदी के गोद लिए गांव पर रिपोर्ट प्रकाशित करने के बाद माला नाम की एक महिला के द्वारा रामनगर थाने में दर्ज कराई गई एफआईआर के खिलाफ स्क्रॉल डॉट इन के संपादक नरेश फर्नाडीस और कार्यकारी संपादक सुप्रिया शर्मा इलाहाबाद हाईकोर्ट का रूख किया है। एफआईआर को याचिका दाखिल कर चुनौती दी गई है। बता दें कि रिपोर्ट में बताया गया था कि लॉकडाउन में गांव के लोग भूखे रह रहे हैं।

सुप्रिया शर्मा के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 269 (किसी बीमारी को फैलाने के लिए किया गया गैरजिम्मेदाराना काम जिससे किसी अन्य व्यक्ति की जान को खतरा हो सकता है), 501 (मानहानिकारक जानी हुई बात को मुद्रित करना), अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (नृशंसता निवारण) अधिनियम 1989 की धारा 3(1)(द), 3(1) (घ) के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है।

कानूनी मामलों की समाचार वेबसाइट लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुातबिक, सुप्रिया शर्मा और नरेश फर्नांडीस की ओर से अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर, श्वेताश्व अग्रवाल और राघव द्विवेदी की अगुवाई में यह याचिका दायर की गई है। याचिका में एफआईआर की वैधता और शुद्धता को चुनौती दी गई है और याचिकाकर्ताओं की स्वतंत्रता की सुरक्षा के लिए कोर्ट से निर्देश की मांग की गई है। याचिका में एफआईआर को पूरी तरह से झूठी, प्रेरित, दुर्भावनापूर्ण, आधारहीन अस्थिर बताया गया है।

याचिका में आगे कहा गया है, उक्त प्राथमिकी न केवल तथ्यों पर गलत है बल्कि कानूनन भी न टिकने वाली है। क्योंकि भारतीय दंड संहिता के तहत या अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत कोई अपराध नहीं बनता है। उक्त एफआईआर का उद्देश्य स्वतंत्र पत्रकारिता को डराना, चुप करना, दंड देना और कानूनी प्रक्रिया के दुरूपयोग करना है। याचिकाकर्ताओं के खिलाफ कोई कठोर कार्रवाई न्याय की गंभीर विफलता होगी।

8 जून की रिपोर्ट में शर्मा ने वाराणसी के डोमरी गांव की एक कथित घरेलू कामकाजी महिला का जिक्र किया था जिसमें बताया गया था कि लॉकडाउन के दौरान उन्हें भोजन या राशन की कमी के कारण अत्यधिक कठिनाइ का सामना करना पड़ा और ग्राम प्रधान से भी कोई सहायता नहीं मिली जबकि लॉकडाउन के दौरान रास्ते पूरी तरह बंद हैं और पुलिस राह चलते लोगों की पिटाई कर रही है।

याचिका में कहा गया है कि अच्छे पत्रकारीय अभ्यास को ध्यान में रखते हुए शर्मा ने माला का इंटरव्यू लिया है। याचिका के साथ उसी का एक प्रतिलेश भी संलग्न किया गया है। शर्मा और फर्नांडीस के खिलाफ 13 जून गलत तरीके से रिपोर्ट प्रकाशित करने के आरोप में मुकदमा दर्ज कराया गया था। महिला ने दावा किया है कि वह आउटसोर्सिंग के माध्यम से वाराणसी शहर नगरपालिका में एक स्वच्छता कार्यकर्ता है और उसने लॉकडाउन के दौरान किसी भी संकट का सामना नहीं किया और भोजन तक उसकी पहुंच थी।

शिकायतकर्ता माला ने आगे आरोप लगाया है कि उक्त लेख शिकायतकर्ता की गरीबी और उसकी जाति का मखौल उड़ाता है, जिससे शिकायतकर्ता को मानसिक आघात लगा है और समाज में उसका तिरस्कार हुआ है।


वहीं याचिका में सुप्रिया शर्मा की ओर से कहा गया है कि संबंधित समाचार लेख में सुश्री माला के बारे में सभी रिपोर्टिंग बोंडें की गई हैं और उनके द्वारा दिए गए प्राथमिक खाते पर आधारित हैं। सुश्री माला के बयानों की रिपोर्ट में याचिकाकर्ता ने किसी भी तरह अपमानजनक, झूठी या काल्पनिक, अत्याचार का काम नहीं किया है। याचिका में आगे इस एफआईआर को रद्द करने की मांग की गई है।

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