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जनज्वार विशेष

माओवादी बताकर मारे गए 17 आदिवासियों की हत्या का सच बताने वाली कमला काका से जनज्वार खास बातचीत

Prema Negi
3 Dec 2019 3:35 PM GMT
माओवादी बताकर मारे गए 17 आदिवासियों की हत्या का सच बताने वाली कमला काका से जनज्वार खास बातचीत
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बीजापुर के सारेगुड़ा गांव में सुरक्षाबलों ने माओवादी बताकर 17 आदिवासियों को मारी थी गोली, एक सदस्यीय जांच आयोग की रिपोर्ट में खुलासा, सुरक्षाबल नहीं दे सके नक्सली होने के सबूत....

जनज्वार। छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले के सारकेगुड़ा गांव में 28 जून 2012 की रात सुरक्षाबलों ने 17 आदिवासी ग्रामीणों को माओवादी बताकर गोलियों से भून डाला था। इस दौरान गांववालों की ओर से किसी प्रकार की गोलीबारी नहीं की गई थी। ग्रामीणों के मुताबिक मारे गए लोग नक्सली नहीं थे, वे अपना पारंपरिक त्योहार बीज पंडुम मना रहे थे। मारे गए लोग नक्सली ही थे इस बात के सबूत सुरक्षाबल नहीं दे सके। इन मौतों को लेकर तत्कालीन राज्य सरकार ने एक सदस्यीय जांच आयोग का गठन किया था। इस एक सदस्यीय जांच आयोग के अध्यक्ष जस्टिस विजय कुमार अग्रवाल बनाए गए। करीब सात साल की सुनवाई के बाद 17 अक्टूबर को यह रिपोर्ट मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को सौंपी गई थी। इस रिपोर्ट के मुताबिक मारे गए लोग नक्सली नहीं बकसूर ग्रामीण आदिवासी थे।

सारकेगुड़ा में 17 आदिवासियों को गोली से उड़ाने के बाद सरकार ने एसडीएम को राहत सामग्री लेकर भेजा था। तब गांव की आदिवासी लड़की कमला काका ने एसडीएम और प्रशासन के अधिकारियों की जमकर क्लास लगाई थी। तब कमला का यह वीडियो सामने आया था। एक सदस्यीय जांच आयोग की रिपोर्ट सामने आने के बाद अब यही वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।

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वीडियो में कमला कहते हुए सुनाई दे रही हैं कि सुरक्षाबलों ने हमारे 17 लोगों को मार दिया है। आप लोगों यहां क्यों आए हैं, क्या हमें खाने के राशन नहीं मिल रहा था या पहनने के लिए कपड़े नहीं मिल रहे थे? अगर हम लोग नक्सली हैं तो राशन क्यों लेकर आए हो ? जब तक हमारे लोग यहां नहीं आएंगे हम लोगों राशन-पानी भी नहीं चाहिए आपका।

रिपोर्ट को लेकर कमला काका ने जनज्वार से फोन पर बात की। कमला ने कहा, 'देखिए मैं तो यही कहना चाहूंगी 2012 से लेकर अब तक हम लड़ते रहे, हमें सात साल हो गए हैं, आज हमें उम्मीद मिली है लेकिन न्याय नहीं मिला है। हमें न्याय तब मिलेगा जब उन लोगों पर कार्रवाई होगी जिन्होंने बेकसूर लोगों को मारा है।'

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मला काका को जब पूछा कि इस घटना को लेकर आप किसको दोषी मानती हैं, तो उन्होंने कहा कि मैं किसी एक का नाम तो नहीं ले सकती हूं। बस इतना बोल सकती हूं कि सीआरपीएफ और पुलिस ने हमारे लोगों को मारा है। इसके बाद जब हमने पूछा पुलिस और सीआरपीएफ ऐसा क्यों करती होगी, एक नागरिक होने के नाते आपको क्या लगता है?

आजतक ये बात तो मैं समझ नहीं पाई हूं कि ये क्यों कर रहे हैं किसलिए कर रहे हैं। बेकसूर लोगों को नक्सली बनाकर क्यों मारा जा रहा है और न जाने क्यों नक्सली बताकर जेलों में डाला जा रहा है।

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मला आगे कहती हैं, 'मैं तो केवल इतना कहना चाहती हूं कि जब हमारे गांव में 17 बेकसूर लोगों को मारा गया। उसके बाद उनका कहना था कि दो पहाड़ियों के बीच में घने जंगल में 17 नक्सलियों को मारा गया। उनमें से चार या पांच कट्टर नक्सली थे। जिन्हें हमने मारकर गिराया है। कहने का मतलब ये है कि पुलिस जब गांव वालों को नक्सली बताकर मारती है तो वह दुनिया को दिखाती है कि देखो हम नक्सलियों को खत्म कर रहे हैं। हो सकता है कि यह शाबाशी पाने के लिए, पद पाने के लिए किया जा रहा हो। बहुत सारे सवाल उठ सकते हैं। वह क्या सोचकर लोगों को मारते हैं, मैं कुछ नहीं कह सकती।

मला आगे कहती हैं, 'मैं एक आम लड़की थी। मुझे तो ये भी नहीं पता था कि कांग्रेस-भाजपा पार्टी क्या होती है। किसी के बारे में मुझे कुछ नहीं पता था। मैं बाहरवी तक पढ़ी हूं। इसके बाद जब हमने पूछा कि आपने कैसे मान लिया था उस समय कि ये 17 लोग आम आदिवासी थे नक्सली नहीं थे? तो उन्होंने कहा कि यहां में बचपन से रह रही हूं मुझे गांव के हर आदमी के बारे में पता है कौन नक्सली है और कौन नक्सली नहीं है और जिन लोगों को मारा गया है, उनमें मेरे घर के भी तीन सदस्य थे जिसमें मेरे भतीजा राहुल काका जो स्टुडेंट था और नौवी कक्षा में पढ़ता था उसको भी पुलिस वालों ने नक्सली कह कर मार दिया।

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मला आगे कहती हैं कि राहुल काका जिस स्कूल में पढ़ते थे वह पुलिस थाने के साथ में ही था। छुट्टी के समय सभी बच्चें पुलिस वालों के साथ क्रिकेट भी खेलते थे और पुलिस वालों को भी पता था कि राहुल एक स्टुडेंट है जिसके बावजूद भी उसे नक्सली कह कर मार दिया गया। मैं पूछना चाहती हूं कि उस बच्चे का क्या कसूर था जो उसे नक्सली कह कर मार दिया गया।

मला बताती हैं, 'इसके अलावा मेरे चचेरे भाई कन्हैया काका और चचेरे भाई की बेटी को भी नक्सली कह कर मार दिया गया था। हम लोगों को तो ये भी नहीं मालूम था कि उस भीड़ में कितने लोगों की मौत हुई थी साथ ही गांव में काफी संख्या में लोगों को नक्सली कहकर गोली मार दी गई थी।'

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