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अमेरिका के एक नर्स ने लिखा भावुक पत्र, कहा नहीं हूं मैं हीरो क्योंकि मैं मरना नहीं चाहता

Prema Negi
5 May 2020 11:05 AM GMT
अमेरिका के एक नर्स ने लिखा भावुक पत्र, कहा नहीं हूं मैं हीरो क्योंकि मैं मरना नहीं चाहता

अमेरिका के न्यूयॉर्क में नर्स KP Mendoza की फेसबुक पर लिखी यह पोस्ट कोरोना वारियर्स खासकर स्वास्थ्यकर्मियों की हालत को करती है बयां....

#KP_Mendoza की इस पोस्ट का हिंदी अनुवाद लेखिका रश्मि राजीवा ने इस टिप्पणी के साथ किया है : 'KP Mendoza न्यूयॉर्क में नर्स हैं। उन्होंने अपने फेसबुक वॉल पर एक खुला खत लिखा, जिसमें अपने अनुभव, अपनी भावनाएं व्यक्त की हैं। दूसरे देशों के नर्स, डॉक्टर्स का हाल भी बिल्कुल उन जैसा ही है। मेरे पड़ोस के एक लड़के ने दो वर्ष पहले MBBS किया है। उसकी ड्यूटी भी आइसोलेशन वार्ड में लग गई है। अब घर भी नहीं आता कि कहीं उसका परिवार संक्रमित ना हो जाये। सबसे ज्यादा खतरा कोविड के मरीजों का इलाज और देखभाल करते इन स्वास्थ्यकर्मियों को ही है। मेरी एक फ्रेंड की बेटी की स्कूल फ्रेंड लंदन में नर्स है। उसकी जूनियर की मौत कोविड से हो चुकी है। उसे शक है कि वो भी इन्फेक्टेड होगी पर उन लोगों का कोविड टेस्ट नहीं किया जा रहा, क्योंकि कहीं इंफेक्शन निकल आया तो कई स्टाफ को क्वारंटीन करना पड़ेगा, फिर मरीजों की देखभाल कौन करेगा। हमारे देश में भी डॉक्टर्स नर्सेज के संक्रमित होने की संख्या में तेजी से वृद्धि हो रही है, आशा और प्रार्थना है, उनके साथ ऐसा व्यवहार ना हो और उन्हें समुचित इलाज व आराम मिले। उनकी सेवा से समाज कभी उऋण नहीं हो सकता। के पी मेंडोजा के अंग्रेज़ी में लिखे ख़त का भावानुवाद जो पूरी दुनिया के स्वास्थ्यकर्मियों के मन की व्यथा व्यक्त करता है।'

मैं हीरो नहीं हूँ, मैं मरना नहीं चाहता...

ल मैंने सोचा, अपनी 'वसीयत' लिखूँ।

मेरी उम्र 24 वर्ष है। मैं न्यूयॉर्क में ICU नर्स हूँ। इस वक्त मेरा स्वास्थ्य बिल्कुल ठीक है और कोई कारण नहीं है कि मैं अपनी 'वसीयत' लिखने की बात सोचूँ भी, पर कल मुझे लगा मेरी मृत्यु की संभावना पहले की अपेक्षा बहुत ज्यादा है।

2018 में जब मैंने अपना नर्सिंग कोर्स कम्प्लीट किया तो कभी नहीं सोचा था कि दो वर्ष में मेरा भविष्य ऐसा होगा। मुझे लगा था मैं मृत्यु देखने के लिए तैयार हूँ। अपने प्रथम वर्ष में ICU में सेवाएं देने के दौरान मैंने बहुत मौतें देखीं थीं, पर पिछले दो हफ्ते में मैंने जितनी मृत्यु देखी है,उतनी कोई अपनी पूरी ज़िंदगी मे भी नहीं देख पाता। मुझे नहीं लगता अब मैं और मौत देखने के लिए तैयार हूँ।

'अब मृत्यु के मायने अलग हैं। मृत्यु मुझे चुन सकती है।'

ल एक बेटी ने अपनी माँ का हाल जानने के लिए फोन किया। उसे लगा था, उसकी माँ का स्वास्थ्य सुधर रहा है। परिवार को हॉस्पिटल में आने की इजाज़त नहीं है। कोई भी उन्हें, उनके परिजनों का हाल अपडेट नहीं कर रहा। मैंने बहुत मुश्किल से और धीमे से बताया कि अगर मैं वेंटिलेटर बन्द कर दूँ तो उसकी माँ जीवित नहीं रहेंगी। मुझे स्पष्ट बताना पड़ा, क्यों झूठ बोलूं या टालमटोल करूँ। जैसा कि अपेक्षित था वो जोर जोर से रोने लगी।

मैंने पहले भी स्टेथोस्कोप से किसी दम तोड़ते हृदय की ध्वनि सुनी है, पर कभी फोन से ऐसी हृदयविदारक ध्वनि नहीं सुनी थी। फोन पर उसका करुण रुदन सुनते हुए भी मैं वार्ड में जाने से पहले अपनी चीजें इकट्ठी कर रहा था, दवाएं-सुई-ट्यूब-सिरिंज-शीशियां। वह अपनी माँ के लिए रो रही थी और मैं सोच रहा था कोई सामान मैं भूल न जाऊँ।

ब भी आप किसी कोविड मरीज के कमरे में जाते हैं, अपने आप को पूरी तरह एक्सपोज़ कर देते हैं। इसलिए मैं बार बार खुद से कहता हूँ, 'कुछ भूल मत जाना कि इस कमरे में वापस आना पड़े।' मैं हॉल में बेबस सा खड़ा रह जाता हूँ। मैं मृत्यु को रोकने के लिए कुछ नहीं कर पा रहा। मास्क लगाए, PPE गाउन के कई तहों के अंदर पसीने से नहा जाता हूँ।

'कुछ नहीं कर पाने की स्थिति में कैसे माफी माँगू... किस तरह से माफी मांगूँ....'

मुझसे कहा गया है कि मैं फ्रंटलाइन पर हूँ, जबकि सच ये है कि मैं अंतिम संसाधन हूँ। मैं उन लोगों में से हूँ जिन्हें आप कभी नहीं देखना चाहेंगे, क्योंकि हमारे बाद 'मौत' है। इस महामारी से पहले बहुत हुआ तो ICU में दो मरीज पर एक नर्स होते थे। अब तीन मरीजों की देखभाल के लिए एक नर्स हैं। वो भी मैं भाग्यशाली हूँ कि मुझ पर तीन मरीजों की ही देखभाल की जिम्मेवारी है। कुछ हॉस्पिटल में कई मरीजों की जिम्मेवारी सिर्फ एक नर्स पर है।

'ये दिन मुझे अंदर से तोड़ दे रहे हैं।'

क ICU नर्स को मरीज की देखभाल के लिये हर तरह से प्रशिक्षित किया जाता है। हम मरीज के कपड़े बदलते हैं, उन्हें खिलाते हैं, दवा देते हैं, सूई लगाते हैं, टयूब लगाते हैं...उन्हें आरामदायक स्थिति में रखते हैं। मरीज के कमरे में किसी से भी ज्यादा हम ही जाते हैं। लोग हमें, हीरो...सुपर हीरो... देवदूत तक बुलाते हैं। हमें साहसी.. बहुत हिम्मत वाला कहते हैं कि मरीज भाग्यशाली हैं कि हम जैसे उनकी देखभाल कर रहे हैं।

र मुझे अब यह सच से बहुत दूर लगता है। मैं खुद को बहुत कमजोर और अयोग्य मानता हूँ।

मुझे वक्त नहीं मिलता कि आपके परिवार के साथ फेसटाइम से पहले मैं आपके रूखे होठों पर क्रीम लगा सकूं। आप बेहोश पड़े हुए हो आपके नाक में, मुँह में ट्यूब लगा है। आपका परिवार आपको हॉस्पिटल आने के बाद से पहली बार देख रहा है। मुझे आपके बीच नहीं होना चाहिए। ये आप लोगो का प्राइवेट क्षण है। मुझे शर्म आती है, मुझे ये पाप लगता है। फिर भी मैं शर्म से गड़ा, मजबूर खड़ा रहता हूँ क्योंकि मैं ही आप दोनों के बीच का लिंक हूँ।

भी कभी मैं इतना व्यस्त हो जाता हूँ कि घण्टों किसी मरीज का डायपर नहीं बदल पाता। वे गंदगी में पड़े रहते हैं। पर मैं एक मरीज के डायपर बदलने का समय कहाँ से लाऊं, जब दूसरे मरीज का हार्टबीट शून्य पहुंचने वाला हो?

ब मैं हॉस्पिटल से घर आ जाता हूँ तब भी इस महामारी से बच नहीं सकता। ये कोरोनावायरस घर तक मेरा पीछा करता है। ये मेरे जूते के सोल पर है, मेरे कपड़ों पर है। मैं कपड़े चेंज करता हूँ, हाथों को रगड़ रगड़ कर धो रहा होता हूँ उसी वक्त गुजरते हुए एम्बुलेंस का सायरन सुनाई देता है। कोरोना वायरस का एक और मरीज हॉस्पिटल गया। फोन का मैसेज टोन बजता है, अभी अभी हमारे सहकर्मी के पिता की कोविड -19 से मृत्यु हो गई। मेरा फ्लैट बिल्कुल शान्त है पर मुझे पूरे समय वेंटिलेटर के अलार्म की आवाज़ सुनाई देती रहती है।

"ससे पहले मुझे पता नहीं था,'एकांत भी इतना शोर से भरा हो सकता है।"

छुट्टी के दिन, इस बीमारी से सम्बंधित ढेरों आर्टिकल पढ़ता हूँ। फिर भी जब हॉस्पिटल जाता हूँ तो लगता है, इस बीमारी के विषय में कुछ नहीं जानता और जब हॉस्पिटल से निकलता हूँ तो महसूस होता है, मैं फेल हो गया...कुछ नहीं कर पाया।

इसीलिए लोगों से कहता हूँ मुझे हीरो ना बुलाओ..ये झूठ है...मैं नाकाबिल हूँ। मैं अपने शरीर पर कपड़े की तरह अपराधबोध पहने रहता हूँ।

मैं बारह घण्टे तक दौड़ता रहता हूँ। मैं खुद को लकी समझता हूँ अगर मुझे शांति से खाने का समय मिल जाये, अगर एक बार से ज्यादा वॉशरूम जाने का समय मिल जाए। पर फिर सोचता हूँ "मैं भाग्यशाली हूँ कि मुझे खाना खाने का वक्त मिल रहा है या इसलिए भाग्यशाली हूँ कि ICU के उस बेड पर इस वक्त मैं नहीं हूँ।"

मैं चाहता हूँ कि लोग जानें कि ये स्थिति कठिन से कठिनतर है। मैंने पढ़ाई की थी कि लोगों की जान बचाऊँ, बीमारों की सेवा करूँ, पर मैंने अपनी जान देने के लिए पढाई नहीं की थी। मैं चाहता हूँ कि दुनिया को पता चले कि अगर कल मैं ICU बेड पर हूँ तो इसलिए कि अमेरिका सरकार ने हमें पर्याप्त रक्षा के उपकरण नहीं दिए...hazmat suit...PPE मुहैया नहीं करवाये।

मैं चाहता हूँ कि दुनिया को पता चले कि अमेरिका ने अपने नागरिकों को फेल कर दिया है। हमें बहुत गर्व है कि हम अमेरिका जैसे सर्वश्रेष्ठ, धनी, स्वतंत्र देश के नागरिक हैं तो ऐसा क्यों है कि शिफ्ट खत्म होने के बाद मैं वही N-95 मास्क उतारता हूँ जिसे मैंने पूरे 12 घण्टे तक पहन कर रखा था। मैंने पूरे दिन उस वार्ड की हवा में सांस ली है जो मरते हुए लोगों से भरा हुआ है। शिफ्ट खत्म होने के बाद मैं अपनी खुली गर्दन को एक ब्लीच के सॉल्युशन से पोंछता हूँ और सोचता हूँ, वायरस मेरी त्वचा के अंदर नहीं पहुंचेगा। उस पीले पतले से PPE गाउन से जो आसानी से फट जाए, ये उम्मीद रखता हूँ कि वायरस से हमारी रक्षा करेगा।

ब तक इस रोग की दवा नहीं बन जाती, लोग ऐसे ही मरते रहेंगे। मृत्युदर कम हो जाएगी, लॉकडाउन हट जाएगा, फिर भी ICU वार्ड भरे रहेंगे। अमेरिका की स्वास्थ्य व्यवस्था असफल हो चुकी है। इस बीमारी से लड़ने की हमारी पर्याप्त तैयारी नहीं थी।

"इस महामारी की वजह से हमारी सिस्टम की सारी गलतियां बखूबी पता चल रही हैं।"

ब मैं कॉलेज में था अपने माता-पिता को हफ्ते में एक बार फोन करता था। परीक्षा के दिनों में वो भी नहीं। वे दोनों फिलीपींस में नर्स हैं। फोन नहीं करने का कारण अपनी व्यस्तता और उनके शिफ्ट के समय को बताता था, पर किस तरह चिंता अपने पंजे गड़ा देती है। रोज सुबह उनकी मेडिकल स्टोरीज पढ़ता हूँ।अपने मरते हुए मरीजों में उनके चेहरे देखता हूँ। मरीजों के बच्चे जब उनका हाल जानने के लिए फोन करते हैं, किसी अच्छी खबर के लिए प्रार्थना करते हैं तो मुझे लगता है ये फोन पर उनकी आवाज़ है या मैं अपना ही स्वर सुन रहा हूँ?

"क्या मेरे माता-पिता को आभास हो गया है कि मैं उन्हें रोज रात में फोन क्यों करता हूँ।"

मैं अभी युवा हूँ। मेरे सपने हैं, पूरी ज़िंदगी मेरे सामने है। मैं अपने माता-पिता के पास जाना चाहता हूँ, उनके हाथों का बनाया खाना खाना चाहता हूँ। मैं अपने चार साल के भतीजे को बड़ा होते देखना चाहता हूँ। मैं शादी करना चाहता हूँ,जिसे प्यार करूँ, उसके साथ ज़िन्दगी बिताऊं। मैं चाहता हूँ,मेरे बच्चे हों ,जिसे उनके दादा-दादी अपने लाड़-प्यार में बिगाड़ें।

"इसलिए मैं कहता हूँ, मुझ पर दया मत दिखाओ....मुझे हीरो मत बुलाओ...मैं शहीद नहीं बनना चाहता।"

मैं सिर्फ ये कहता हूँ कि जब यह सब गुजर जाए तो ये मत भूलना कि कैसे आपको घर में बन्द रहना पड़ा था। मत भूलना कैसे मोर्ग में ट्रक भरकर बर्फ जा रहे थे...मास्क की कमी हो गई थी...टॉयलेट पेपर नहीं मिल पा रहे थे।

मैं चाहता हूँ कि आप याद रखो, कैसे डर से आपका बदन सिहर जाता था...जब कोई आपके पास खांसता था या जब कोई करीबी फोन पर बताता था,उसे बुखार आया है।

मेरे और दूसरे स्वास्थ्यकर्मियों के लिए जरूर ताली बजाओ अगर आपको लगता है, इस से महामारी की भयावहता सहने लायक बन जाती है। मैं स्वीकार करता हूँ, आपके उत्साहवर्द्धन से हमें प्रेरणा मिलती है, लेकिन बस इतना याद रखिये इस उत्साहवर्द्धन से आने वाला परिणाम नहीं बदल जायेगा।

मेरी सिर्फ यही प्रार्थना है, इन सबके गुजर जाने के बाद हम वो सब कुछ जरूर बदल डालें, जिसे बदला जा सकता है।

सकी पुनरावृत्ति बिल्कुल नहीं होनी चाहिए।

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