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विमर्श

'केजरीवाल देश को बता रहे मैंने झूठ बोला, फरेब किया, मक्कारी की'

Janjwar Team
20 March 2018 11:00 AM GMT
केजरीवाल देश को बता रहे मैंने झूठ बोला, फरेब किया, मक्कारी की
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मैं कोई मोदी समर्थक नहीं हूँ, पर एक बात तो स्पष्ट है, दोनों मोदी और केजरीवाल एक ही मिट्टी से बने हैं, और दोनों RSS के तरीके को जानते हैं और उसमें रम गए हैं कि झूठ को वर्तमान की किसी परिस्थिति से जुड़ा एक जामा पहनाओ...

संदीप दीक्षित, पूर्व सांसद

एक समय था जब इस देश में जिस पर अरविन्द केजरीवाल उंगली उठा देता, वो भ्रष्टों की फेहरिस्त में आ जाता। चाहे दिल्ली का हर नागरिक, या यहां और देश का वह खोखला सभ्य समाज (civil सोसाइटी), या पत्रकार जो उसके सबसे बड़े समर्थक रहे और आज भी हैं, बुद्धिजीवी जिनमे professor, अध्यापक, लेखक आदि की भीड़ जमा है, NGO कार्यकर्ता जिन्हें विदेशी funding देने वाली और उस पैसे से चलने वाली अनेक संस्थाओं में मज़े की तनख्वाहें मिल रही हैं, दिल्ली के युवा, दिल्ली के गरीब आदि सब केवल उसकी आवाज़ को ही सत्य समझने लगे थे। और हमारी media ने इसको गांधी तक की पदवी दे डाली।

आज एक एक करके जब केजरीवाल को अपने आरोप साबित करने पड़ रहे हैं, तो यही सत्यवादी हरिश्चंद्र जनता में कबूल रहा है की उसने फरेब किया, झूठ बोला, मक्कारी की, और कोई फर्क नहीं पड़ रहा। फिर यही लोग, यही आम आदमी वाले, यही गरीब, यही civil society, यही TV channel क्यों परेशान होते हैं जब मोदी गलत बयान देता है या किसी पर उंगली उठाता है?

मैं कोई मोदी समर्थक नहीं हूँ, पर एक बात तो स्पष्ट है, दोनों मोदी और केजरीवाल एक ही मिट्टी से बने हैं, और दोनों RSS के तरीके को जानते हैं और उसमें रम गए हैं कि झूठ को वर्तमान की किसी परिस्थिति से जुड़ा एक जामा पहनाओ, लोगों के दर्द को उससे जोड़ो, media में बिकने वालों को चिन्हित कर आसानी से खरीद लो, और कई बार अपने झूठों को कहो, सब उसे सत्य मानने लगेंगे। जब तक पता चलेगा, तब तक राजनीतिक रोटी तो सिंक जाएगी।

वैसे कमाल है न? माफी मांगने से सब पाप धूल गए। अगर केजरीवाल के आरोप उस समय सत्य न माने जाते तो क्या सरकारें बदलती? क्या ये CM बन पाता? जिनको इसने सरेआम बदनाम किया, क्या वो लोग चुनाव हारते?

माफी मांगने से यह तो सिद्ध हो गया कि आम आदमी पार्टी का सारा का सारा ढांचा और तस्वीर झूठ और फरेब की बुनियाद पर बनी और खड़ी है, और उसकी नंगई में सब शामिल हैं, आम आदमी के लीडर, कार्यकर्ता, पत्रकार मित्र आदि।

खैर, क्या फर्क पड़ता है। चाहे विश्वनाथ प्रताप सिंह कि जेब में रखे Bofors के सबूत हों, जो जेब ही में रह गए, या Vinod Rai कि सत्यगाथाएँ, जिस कारण राजा और कनिमोझी की ज़िंदगी के कई साल तबाह हो गए, और मोदी प्रधानमंत्री बन गया। या केजरीवाल की जेब में रखे शीला दीक्षित के खिलाफ 400 पन्नों के सबूत, जो कहाँ उड़ गए पता नहीं, या सलमान खुर्शीद के खिलाफ केजरीवाल की Press कॉन्फ्रेंस, जिस पर TV channel तक को माफी मांगनी पड़ी।

ये सब ईमानदारी के सिपाही नई मंज़िलों पर पहुंच गए, और उनके निशाने, आज तक शिकार हो रहे हैं। हो सकता है कि राजनीति में सब जायज़ हो।

पर उनका क्या, जो एक औपचारिक माफी लेकर बेइज़्ज़ती माफ़ कर रहे हैं? वो इज़्ज़त भी क्या इज़्ज़त है, जो एक माफी से लौट जाए।

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