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बेटी सेना में अफसर बनना चाहती थी, तैयारी कराने के लिए पिता के पास नहीं थे पैसे तो कर ली आत्महत्या

Vikash Rana
6 Nov 2019 4:03 AM GMT
बेटी सेना में अफसर बनना चाहती थी, तैयारी कराने के लिए पिता के पास नहीं थे पैसे तो कर ली आत्महत्या
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घर में पैसा न होने की स्थिति में सारिका ने मान लिया था कि अब वो कभी भी अफसर नहीं बन पाएगी। इस हताशा में उसने 3 नवंबर की सुबह जहर पी लिया और उसकी मौत हो गयी...

जनज्वार। 12वीं कक्षा की सारिका शिंदे पढ़ लिखकर सेना में अफसर बनना चाहती थी। जब इस सपने के बारे में सारिका ने अपने घर वालों को बताया तो माता-पिता को बहुत खुशी हुई। सारिका ने अपनी तैयारी को जारी रखा।

सारिका के पिता कहते हैं, मेरी बेटी रोजाना सुबह उठती और खेतों में दौड़ लगाती, लेकिन अफसर बनने के लिए अच्छी शिक्षा की जरूरत होती है। सारिका अहमदनगर सेना प्रशिक्षण केंद्र में दाखिला लेना चाहती थी, मगर दाखिला दिलाने के लिए मेरे पास पैसे नहीं थे। मेरी 18 साल की बच्ची ने ये मान लिया कि उसके सपने अब पूरे नहीं हो सकते, जिस कारण उसने मौत को गले लगा लिया।

र्तमान सरकार का नारा है, 'बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ।' इस तरह की घटनाओं को देखकर लगता है कि इस नारे को केवल चुनाव के दौरान ही याद किया जाता है।

हले तो सिर्फ किसान ही आत्महत्या करते थे, लेकिन अब देश के आने वाले भविष्य यानी कि छात्र भी इसी सूची में शामिल हो गय़े हैं। इकोनॉमिक टाइम्स में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में हर एक घंटे एक छात्र आत्महत्या करता है, जिसका मुख्य कारण पैसों की किल्लत, पढ़ाई में अधिक दबाव और बेरोजगारी है।

गौरतलब है कि महाराष्ट्र के बीड क्षेत्र में गेवराई जिले के कालेगांव में रहने वाली सारिका दादासाहेब शिंदे बारहवीं कक्षा में विज्ञान की छात्र थी। उसकी पढ़ाई में बहुत रुचि थी। बड़ी होकर देश की सेवा करना चाहती थी और सेना में अफसर बनना चाहती थी। खास बात यह थी कि उसके सपने जितने ऊंचे थे, मेहनत भी उतना ही करती थी। कॉलेज जाना, घर आकर खेती में माता-पिता का हाथ बटाना, फिर अपने सपनों की तैयारी करना ये रोजाना की तरह चलता रहा।

अफसर बनने के लिए शारीरिक मेहनत के साथ–साथ दिमागी तैयारी भी जरूरी होती है। इस तैयारी के लिए सारिका अहमदनगर सेना प्रशिक्षण केंद्र में दाखिला लेना चाहती थी। इस बारे में सारिका ने अपने पिता दादा साहेब शिंदे को बताया। पिता ने कहा, 'बेटा इस बार खेतों में फसल की पैदावार अच्छी नहीं हुई है। हम सब खाने को मोहताज हैं। ऐसे में तुम्हारा दाखिला कैसे करवा दें।'

सी बात से सारिका काफी दिनों से परेशान चल रही थी। फसल की पैदावार न होने के कारण किसान अक्सर मौत को गले लगा लेते हैं। नेंशनल क्राइम ब्यूरो रिकॉर्ड के अनुसार 1995 से लेकर अबतक भारत में 296,438 किसान आत्महत्या कर चुके हैं। आत्महत्या करने वाले किसानों में 60,750 महाराष्ट्र से हैं।

र में पैसा न होने की स्थिति में सारिका ने मान लिया था कि अब वो कभी भी अफसर नहीं बन पाएगी। इस हताशा में उसने 3 नवंबर की सुबह जहर पी लिया और उसकी मौत हो गयी। सारिका के पिता दादासाहेब शिंदे के अनुसार, 'जहर पीने के कुछ घंटे के भीतर मेरी बेटी सारिका की इसलिए मौत हो गयी कि उसको सही समय पर इलाज नहीं मिला। पहले तो रास्ते में गाड़ी जांच के नाम पर कांस्टेबल ने रोक लिया और उसके बाद अस्पताल में डॉक्टर नहीं मिले।'

दादा साहेब शिंदे कहते हैं, 'हमने देखा कि सारिका बेहोश पड़ी हुई थी। हम लोग फौरन अस्पताल लेकर भागे, लेकिन जब गाड़ी बीड के हाईवे पर पहुंची तो अन्ना भाऊ नाम के हवलदार गाड़ी रोकर चेकिंग करना शुरू कर दिया। मैंने हवलदार के सामने बहुत हाथ-पैर जोड़े। कहा भी कि मेरी बेटी ने जहर पी लिया है, अगर समय पर इलाज नहीं हुआ तो मर जाएगी। पर हवलदार ने हमारी एक न सुनी और तकरीबन 10 मिनट तक हवलदार अन्ना भाऊ गाड़ी चेकिंग करता रहा।' पुलिस अधीक्षक हर्ष पोद्दार ने इस घटना की जांच के आदेश दे दिए हैं।

सारिका के पिता आगे कहते हैं, 'गेवराई में इलाज के लिए कोई अस्पताल नहीं होने के कारण हम अपनी बेटी को बीड जिले के निजी अस्पताल लेकर गए। जब मैं अपनी बेटी को अधमरी हालत में अस्पताल लेकर आया तो इलाज के लिए कोई भी डाक्टर समय पर नहीं आया। इलाज में देरी होने के कारण मेरी बेटी की मौत हो गई।'

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