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संस्कृति

बिल्ली की माया

Janjwar Team
20 Oct 2017 5:18 PM GMT
बिल्ली की माया
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भूपेन्द्र सिंह की कहानी

मुझे नहीं पता था वो जंगली बिल्ला तू ही है। नहीं तो तेरे शरीर पर चमड़ी न छोड़ती। तूने घर में आती हुई लक्ष्मी को रोका है। बिल्ली ने भी तेरा रास्ता इसीलिए काटा है कि तू उसका दूध पी गया...

अरी, बहू कटोरे में दूध डाल कर रख दो। आज दिवाली है, रात को बिल्ली के रूप में लक्ष्मी आएगी। वह भूखी नहीं जानी चाहिए और दरवाजा खुल्ला छोड़ देना, बड़े विश्वास के साथ मां ने मेरे बड़े भाई की पत्नी को कहा। मेरी भाभी और मां की घरेलू कामों करने को लेकर हमेशा ही ठनी रहती थी। मां ने काम बताया नहीं कि भाभी जी के सिर में दर्द शुरू हो जाता। लेकिन अब जबकि घर में लक्ष्मी जी के प्रवेश की बात थी, तो भाभी ने बिना विरोध के फुर्ती से मां के आदेश को पूरा कर डाला।

हां, यह बात मुझे कुछ पची नहीं। बिना टोके रहा न गया। 'क्या मतलब बिल्ली और लक्ष्मी? सुबह तो वो पापिन चूहे की पूछ पकड़ कर दौड़ती हुई जा रही थी। वो हत्यारी अब लक्ष्मी का भेष धर कर आएगी। उसे इस घर में घुसने नहीं दूंगा।' ये सुनते ही मां जोर से चिल्लाई, ‘तू अपनी काली जुबान को चुप रख।’

'अगर तेरा बस चले तो तू हमें दिवाली भी न मनाने दे।'

'मनाओ-मनाओ खूब मनाओ मैंने कौन सा हाथ पकड़ रखा है। अगर बिल्ली दूध पियेगी तो कल खेत का काम भी वही कर ही लेगी।'

इतना सुनते ही मां का गुस्सा और बढ़ गया, 'तेरी जुबान बहुत चलने लगी है छोरे, वह तो बेचारी बिल्ली है, जीव है, वह कैसे कर सकती है खेत का काम।'

'अब वह आपको बेचारी लगनी लगी। कल दोपहर तो उसके पिछवाड़े पर जोर से डंडा मारा था जब वह रसोई से रोटी चुरा कर भागी थी।'

मेरी बात सुन मां का गुस्सा कुछ ठंडा पड़ा। हलका सा दबाव महसूस करने के बाद बोली, 'अच्छा-अच्छा वह तो कल की बात थी, आज तो वह लक्ष्मी बन कर आएगी, तू पूजा के लिए खील-खिलौने लेकर आ जा। अभी थोड़ी देर में लक्ष्मी पूजन और गोबर्धन पूजा है। बहू तुम पूजा की थाली तैयार कर लो, और सुनता जा रे छोरे, भीमा के घर से पचगन्ना भी लेते आना। याद रखना, हां। घर में पूजा होगी तो देवता प्रसन्न होंगे।'

'देवता प्रसन्न होंगे या बिल्ली प्रसन्न होगी ये तो मैं जानता हूँ।'

मेरे इतना कहते ही बापू ने भागकर लाठी उठाई। 'ठहर जा तू, देख रहा हूं मैं, तू बहुत उद्दंड होता जा रहा है। लगता है तुझे लठ ठोकने पड़ेंगे।' बस फिर क्या था, मैं तो लाठी दिखते ही बिजली जैसी फुर्ती से गायब हो गया। लाला की दुकान पर पहुंचने के बाद पीछे मुड़कर देखा कि कहीं बापू पीछे लठ घुमाते हुए तो नहीं आ रहे हैं।

जब कोई नहीं दिखा तो कुछ राहत मिली। जल्दी से पूजा के लिए प्रसाद खरीदा और फटाफट भीमा के घर जा पहुंचा। पचगन्ना लेकर वापस घर की तरफ चल पड़ा। घर जाकर देखा तो बापू अभी दरवाजे पर ही खड़े थे। परन्तु गनीमत यह थी कि हाथ में लाठी नहीं थी।

उन्हें देखते ही मैं उस नई-नवेली बहू की तरह डर के मारे सिकुड़कर चलने लगा, जो घर में ससुर और जेठ से बच-बचकर चलती है कि कहीं मेरा कपड़ा भी उनसे न छू जाए। जून के महीने में नंगे पैर जलते फर्श पर चलवा चुके हैं मेरे बापू, जाड़े में एक बार गुस्सा आया तो नंगे बदन फर्श पर लेटने की सजा भी भोग चुका हूं।

एक बार तो मुझे सिर के ऊपर से हाथों में उठाकर कीचड़ में पटक दिया था। इसलिए मैं उनके सामने हमेशा ही भीगी बिल्ली बन जाता हूं। खैर, थोड़ी देर में पूजा के लिए घर के सभी सदस्य जमा हो गए। पूजा शुरू हुई। बारी-बारी से पूजा की थाली आरती के लिए सभरी के हाथों में जाने लगी। थाली पकड़ने की मेरी भी बारी आई। साथ में ओम जय लक्ष्मी मइया का भजन भी गाया जा रहा था।

शुभ घड़ी के इस मौके पर मेरा सारा ध्यान तो दूध पर केंद्रित था। मुझे डर था कि कहीं मेरे हिस्से का दूध उस पापिन बिल्ली के आगे न डाल दिया जाए। लक्ष्मी मइया के रूप में मुझे बिल्ली मइया मेरा दूध पीते नजर आ रही थीं। मेरे दूध में बंटवारे का मतलब जैसे कोई मेरी प्रेमिका मुझसे छीन रहा हो। एक दूध ही तो था, जिससे मैं अपने शरीर को पिता जी से मजबूत बना सकता था। यह भी मैं चोरी-छिपे ही पी पाता था।

थोड़ी देर में पूजा खत्म हुई और सभी लोग खाना-खाने के लिए बैठ गए। अब वही हुआ जिसका मुझे डर था। मेरे हिस्से का एक तिहाई दूध गायब था। अब तो मैं अन्दर ही अन्दर ऐसे जल-भुन रहा था, जैसे आग में मक्के का भट्टा भना जा रहा हो। लेकिन मैं भी कम नहीं था। मैंने भी एक साजिश रच डाली। सबसे पहले खाट में सोने का ड्रामा कर लेट गया और जब सभी सो गए तो आहिस्ता से उठ कर बिल्ली वाला दूध गटक गया और कटोरे को भी जीभ से चाट डाला।

इसके बाद जितनी संतुष्टि मिली, मैं उसका बयान नहीं कर सकता। आज दूध इतना ज्यादा पीने को मिला था कि पेट पर हाथ फेरा और चैन से सो गया। सुबह सूरज निकलने पर ही मैं उठा। उस समय तक घर के सारे लोग जाग चुके थे।

मैने देखा, मां बहुत खुश होकर पड़ोसन से बिल्ली के बारे में पूछ रही थी, 'अरी गुड्डी तुम्हारे घर रात बिल्ली आई क्या?'

मैं बिस्तर में पड़ा-पड़ा ही जोर से बोला- 'बिल्ली नहीं मां लक्ष्मी जी कहो- लक्ष्मी जी।'

मां और गुड्डी चाची जोर-जोर से हंसने लगीं। फिर मां बड़े विश्वास से कहने लगी- 'अरे लक्ष्मी कहूं या बिल्ली। हमारा तो दूध वो रात को ही पी गई।'

पड़ोसन गुड्डी कहने लगी- 'नहीं हमारे घर तो बिल्ली आई नहीं, वह तो अब भी वैसे ही पड़ा है।'

'नहीं री हमारा तो कटोरा भी बिल्ली ऐसे चाट गई जैसे राख लगाकर मांज-धो रखा हो।'

मां ने यह बात और जोर देकर कहा। इतना सुनते ही मुझे जोर से हंसी आ गई। मां मुझे डांटते हुए बोली, 'अरे इसमें हंसने की कौन सी बात है?'

मैं कहने लगा- 'नहीं मां रात बिल्ली नहीं आई थी।'

'तो क्या इतना दूध सांप-सपोले पी गए या फिर पंचायती सांड आकर पी गया?'

'नहीं-नहीं... मां मेरा मतलब है बिल्ली की जगह बिल्ला था वो और वह भी बहुत बड़ा। बिल्कुल जंगली मालूम पड़ता था।'

'क्या जंगली बिल्ला, यहां कैसे?'

'ये तो मुझे पता नहीं मां, पर था बहुत मोटा।'

'तो तूने उसे भगाया क्यों नहीं?'

'मैं क्यों भगाता, आपने ही तो कहा था कि लक्ष्मी बिल्ली के रूप में आएगी। मैंने सोचा ये बिल्ली का बॉस होगा जैसे कंपनियों में बॉस या बिग बॉस होते हैं। फिर मैं यह भी सोच रहा था कि यह तो मर्द है, इसलिए हमारे घर ज्यादा धन खींच कर लायेगा। बिल्ली ठहरी औरत जात, उससे तो बेहतर ही है यह।' फिर मैंने चिढ़ाने वाली हंसी हंस दी।

अब मां सोच में पड़ गई। थोड़ी देर बाद सोचकर बोली- 'वैसे मैं भी सोच रही थी कि इतना दूध वह छोटी सी बिल्ली कैसे पी सकती है? अब क्या होगा? वह बेचारी तो...।'

मैंने बीच में ही बात काटी, 'शायद गणश जी हों बिल्ले के रूप में आए हों।' अबकी बार मैं बहुत जोर से हंस दिया। अब मां को मुझसे चिढ़ होने लगी और हो भी क्यों नहीं, लक्ष्मी जी जो दूध नहीं पी पाईं।

फिर थोड़ी देर बाद डांटते हुए बोली, 'तू चुप रह रे छोरे, तुझे कुछ ज्यादा ही हंसी आ रही है। चुपचाप कस्सी (खुदाली) उठाकर खेत में चला जा। इधर-उधर यार-दोस्तों के पास बैठकर समय बिताया कर। कहीं गया तो तो तेरे बापू को भेजूंगी हाथ में लठ देकर।'

बापू का नाम लेते ही तो चेहरे की सारी लाली जाती रही। लठ के सामने तो अच्छे-अच्छे सीधे हो जाते हैं, मेरी तो औकात ही क्या? जैसे ही घर से निकला एक बहुत बड़ी अनहोनी हो गई। बिल्ली मेरा रास्ता काट गई और रास्ता काटते हुए मां ने भी देख लिया।

तुरंत मुझे रोकने लगी, 'रुक रे छोरे दिखाई नहीं देता, बिल्ली रास्ता काट गई, थोड़ी देर बाद जाना। तू उसके काटे हुए रास्ते से जाएगा, तो कोई नुकसान हो जायेगा।'

पड़ोसन गुड्डी चाची ने भी हां में हां भरी, 'हां रे ठीक कह रही है तेरी मां। देख वो रामकिशन का छोरा मोटरसाइकिल पर जा रहा था। उसे कार से टक्कर लगी, अब वह हॉस्पिटल में पड़ा है। उसका रास्ता बिल्ली ने ही काटा था।'

इतना सुन मैं आश्चर्य से पड़ोसन गुड्डी चाची और मां की तरफ देखने लगा। मैने अपने मन में सोचा, वाह कल तो वह लक्ष्मी थी! आज वह कसोणी कैसे हो गई। अब कौन इन्हें समझाए कि यह बिल्ली भूख के मारे इधर-उधर भग रही है। रात को उसे हमारे घर दूध तो मिला नहीं, ऐसे में बेचारी बाहर चूहे-वूहे की तलाश में भटक रही होगी। वाह री लक्ष्मी!

मैने टोंट मारते हुए गुड्डी चाची से कहा, 'अब वह तुम्हारे घर गई है दूध पीने।'

वह गुस्से से बोली, 'रात को तो आई न हरामजादी।'

इतना कह पड़ोसन गुड्डी बिल्ली को भगाने के लिए भगकर घर में जा घुसी। मैं हंसने लगा। मैने मां से खेत पर जाने की अनुमति मांगी।

मां फिर से मुझे डांटते हुए बोली- 'तू बकवास मत कर रे छोरे। तुझे जितना कहा जाता है उतना ही कर। मैं तुझे अभी खेत पर ना जाने नहीं दूंगी, थोड़ी देर में जाना हां।'

'वाह मईया मेरी, मेरे लिए इतना प्यार कहां से पैदा हो गया। कल तो मेरे हिस्से का दूध भी उस काली कलूटी बिल्ली को पिला रही थी।'

'तो क्या हुआ कल तो दिवाली थी, लक्ष्मी घर आती है उस दिन। दो घूट दूध अगर बिल्ली पी जाती, तो तेरा कहीं से कुछ घट न जाता।'

'लेकिन मेरा घटने वाला तो अब भी नहीं है और न ही मैंने कुछ घटने ही दिया।'

'क्या मतलब है तुम्हारा?'

'मतलब यह कि कल रात मेरे हिस्से का जो दूध तुमने बिल्ली के लिए रखा था, उसे मैं रात को ही पिया था।'

'क्या?' मां का मुंह खुला का खुला रहा गया। वह भगकर बापू का लठ उठाकर मेरे पीछे दौड़ी।

'ठहर जा मैं भी कहूं तू हमसे इतनी मसखरी क्यों मार रहा है? मुझे नहीं पता था वो जंगली बिल्ला तू ही है। नहीं तो तेरे शरीर पर चमड़ी न छोड़ती। तूने घर में आती हुई लक्ष्मी को रोका है। बिल्ली ने भी तेरा रास्ता इसीलिए काटा है कि तू उसका दूध पी गया। तू वापिस आजा छोरे।'

मां पीछे से चिल्लाती रही। पर लठ देखकर मैं कहां ठहरने वाला था। मैंने तो खेत में जाकर पीछे मुड़कर देखा। दोपहर को मां खाना लेकर खेत में आ गई। उसे यह भी चिंता थी कि मेरा बेटा सुबह से भूखे पेट खेत में काम कर रहा है। रोटियों में खूब सारा घी, सब्जी और एक जग दूध था।

मां आकर सहतूत की छाया में बैठ गई और मुझे आवाज लगाई, 'अरे छोरे आकर खाना खा ले सुबह का भूखा है।'

'नहीं मैं नहीं आऊंगा, तू मुझे मारेगी।'

नहीं मारूंगी, लेकिन तु शैतानी क्यों करता है? तुने बिल्ली का दूध क्यों पिया?'

'बिल्ली का नहीं मां, लक्ष्मी का।'

'देख तू फिर मजाक उड़ा रहा है।'

'यह मजाक कैसे हुआ मां? आप ही ने तो कहा था वह लक्ष्मी है! बिल्ली के रूप में आएगी और जब उसने मेरा रास्ता काटा तो वह कसोणी हो गई। पहले ये तो फैसला कर कि वह कसोणी है या लक्ष्मी?'

जब मां को कोई जवाब नहीं सूझा तो कहने लगी, 'अरे मुझे नहीं पता, बरसों की परंपरा चलती आ रही है, हमें भी करनी पड़ती है। बिल्ली की माया बिल्ली ही जाने।'

तब तक मैं पास आकर बैठ चुका था और मां ने थाली में खाना डालकर मेरी तरफ बढ़ा दिया।

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