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विमर्श

किसको कौन साध रहा है नए प्रदेश अध्यक्ष के बहाने मध्य प्रदेश भाजपा में

Janjwar Team
21 April 2018 8:49 AM GMT
किसको कौन साध रहा है नए प्रदेश अध्यक्ष के बहाने मध्य प्रदेश भाजपा में
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भाजपा मध्य प्रदेश के अध्यक्ष बने राकेश सिंह कल दूसरे दिन ही विवादों में आ गए। सवाल यह है कि कहीं यह उत्साही प्रदेश अध्यक्ष इसलिए तो नहीं लाया गया है कि अगले विधानसभा चुनाव में शिवराज सिंह चौहान हारते हैं तो वह हार का ठीकरा आसानी से नए प्रदेश अध्यक्ष पर फोड़ सकें...

जनज्वार, भोपाल। यह तो सभी जानते हैं कि भारतीय जनता पार्टी चुनाव को चुनाव नहीं युद्ध समझ कर लड़ती है। अब जबकि पार्टी लगातार उपचुनाव में हार रही है, देश के प्रधानमंत्री और पार्टी के खेवनहार का जादू उतर रहा है पार्टी के लिए राज्यों के चुनाव उतने ही महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं।

राजस्थान और मध्य प्रदेश वही राज्य हैं जो धीरे-धीरे कुरुक्षेत्र के समर में तब्दील हो रहे हैं। मध्य प्रदेश में लंबे समय से नए प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति का हल्ला था। लेकिन पिछले साल भर से शेर आया, शेर आया की गूंज थी लेकिन बदलाव नहीं हो रहा था। जब भी प्रदेश अध्यक्ष नंद कुमार चौहान को बदलने की बात चलती, मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान दिल्ली आकर स्थिति को संभाल लेते थे।

इन स्थितियों में चर्चा चल पड़ी कि मध्यप्रदेश के संगठन महामंत्री सुहास भगत शिवराज के आगे कमजोर पड़ गए हैं। क्योंकि संगठन में महामंत्री का बदले जाने के बाद बदलाव का इतिहास रहा है। 1998 में हार के बाद भाजपा में संगठन ने सर्जिकल स्ट्राइक कर कप्तान सिंह सोलंकी को कमान सौंपी थी।

सोलंकी ने दबंगई से पुराने चेहरों को हटा कर नए चेहरे स्थापित किए। आज के कई नेता उसी दौरे में आगे बढ़ाए हुए हैं। लेकिन क्षत्रपों ने अपने क्षेत्र में नए नेताओं को उभरने से रोक दिया। बाद में अरविंद मेनन के दौर में तो संगठन सरकार का पिछलग्गू ही दिखाई देने लगा था। तब संघ ने हस्तक्षेप कर कमान मध्य भारत के प्रांत प्रचारक सुहास भगत को सौंप दी।

लंबा वक्त बीत जाने के बाद भी संगठन में भगत की धमक सुनाई नहीं दे रही थी। माना जाने लगा कि भगत शिवराज के राजनैतिक कौशल के सामने स्थापित नहीं हो पाएंगे। शिवराज ने पिछड़े वर्ग के नेतृत्व को पूरी तरह खुद केंद्रित करते हुए संभावित चेहरों को किनारे लगा दिया था। कैलाश विजयवर्गीय, लक्ष्मीकांत शर्मा और नरोत्तम मिश्र इसके बढ़िया उदाहरण है।

लेकिन हाल ही में संगठन महामंत्री सुहास भगत ने जैसे बाजी ही पलट दी। प्रदेश में चुनाव को साल भी नहीं बचा है। ऐसे में लग रहा था कि अब प्रदेश अध्यक्ष की कमान नए व्यक्ति को सौंपना मुश्किल होगा। क्योंकि यदि पार्टी हारती है तो शिवराज उसका ठीकरा नए प्रदेश अध्यक्ष पर फोड़ सकते हैं। जबकि संभव है यदि भाजपा मध्य प्रदेश में वापसी न कर पाए तो इसका एक कारण सत्ता विरोधी लहर भी हो सकती है।

अध्यक्ष पद में नियुक्ति को शिवराज गत एक वर्ष से टाल रहे थे। कुछ दिनों से लग रहा था कि शिवराज नंद कुमार को बनाए रखने में कामयाब हो जाएंगे। अगर ऐसा होता तो सुहास भगत की राजनीतिक कुशलता पर प्रश्न चिन्ह लगता।

लेकिन भगत ने कुशलता से सभी पक्षों को साधते हुए राकेश सिंह को आगे बढ़ाया। इस पद पर शिवराज की पहली पसंद नरेन्द्र सिंह तोमर और दूसरी पसंद भूपेंद्र सिंह थे। लेकिन संगठन फिर से शिवराज की पसंद का अध्यक्ष नहीं चाहता था। अंतिम समय में भगत ने राकेश सिंह का नाम बढ़ा कर सबको साध लिया।

यह भी दिलचस्प तथ्य है कि राकेश सिंह को आगे बढ़ाने वाले शिवराज ही थे। जब शिवराज ने सत्ता संभाली थी तो महाकौशल में प्रहलाद पटेल को चुनौती देने के लिए एक और पिछड़े वर्ग के नेता के रूप में राकेश सिंह को आगे बढ़ाया। राकेश ने किसी नेता का टैग लेने के बजाय संगठन के प्रति निष्ठा रखी। संभवतः उन्हें इसी बात का पुरस्कार मिला है। फिलहाल वह दिल्ली में लोकसभा में मुख्य सचेतक हैं। दिल्ली में रहते हुए वह अमित शाह की गुड बुक्स में भी थे।

ये वही राकेश सिंह हैं जिन्होंने 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर इस तथ्य से अवगत कराया था कि शिवराज जबलपुर सीट से कांग्रेस प्रत्याशी विकेक तन्खा को मदद कर रहे हैं ताकि वे हार जाएं। तन्खा अब कांग्रेस से राज्यसभा सांसद हैं और डंपर घोटाले में शिवराज को बचाने में विवेक तन्खा ने महती भूमिका निभाई थी। बहरहाल राकेश सिंह के नाम पर अध्यक्ष की मुहर लगवा कर भगत ने अपनी राजनीतिक कुशलता सिद्ध कर दी।

इसके साथ ही अब भगत की चुनौती बढ़ गई है। यदि वे नए अध्यक्ष और संभागीय संगठन मंत्रियों के साथ मिल कर क्षेत्रीय हैवी-वेट नेताओं के व्यक्तिगत हितों को किनारे न कर पाए तो इस बदलाव का कोई फायदा नहीं होगा। उन्हें स्थानीय संगठन को मजबूत बना कर टिकट वितरण में सही लोगों को आगे लाना होगा। यदि ऐसा होता है तो संघ ने जिस कल्पना और विश्वास के साथ उन्हें भेजा है उसमें वह खरे उतरेंगे। हालांकि भगत के करीबिकयों का मानना है कि उनमें बहुत धैर्य है और वह शांत रहकर अपना काम कते हैं। नए अध्यक्ष की ताजपोशी से तो ऐसा ही लग रहा है।

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