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कोरोना के कहर के बीच राशन वितरण में भ्रष्टाचार का बोलबाला, प्रशासनिक लूट में उलझ कर रह गए हैं ग्रामीण

Manish Kumar
23 April 2020 12:23 PM GMT
कोरोना के कहर के बीच राशन वितरण में भ्रष्टाचार का बोलबाला, प्रशासनिक लूट में उलझ कर रह गए हैं ग्रामीण
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भष्टाचार का आलम यह है कि कार्ड होने के बाद भी ग्रामीणों राशन नहीं मिल रहा तो कही मृतक के नाम पर ही राशन वितरित हो रहा है....

बोकारो से विशद कुमार की ग्राउंड रिपोर्ट

झारखंड के 24 जिलों में कुल 260 प्रखंड हैं, जिनमें से 168 प्रखण्डों में खाद्य, सार्वजनिक वितरण एवं उपभोक्ता मामले, झारखण्ड सरकार के दिशा-निर्देश के अनुसार प्रखण्ड स्तर पर अधिकारियों की नियुक्ति की गई है. इन्हें राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत गठित स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से डाकिया योजना के तहत 35 किलो का खाद्यान्न पैकेट बनाकर इन प्रखंडों के गांवों में आदिम जनजातियों के घर तक वितरण सुनिश्चित करने की जिम्मेवारी दी गई है, जिसकी जवाबदेही सरकारी डीलर के तौर पर प्रखण्ड आपूर्ति पदाधिकारी को दी गई है।

मगर आलम यह है कि निजी डीलरों (जन—वितरण प्रणाली दुकानदार) की तरह ही ये सरकारी महकमे के डीलर प्रखण्ड आपूर्ति पदाधिकारी भी इस भ्रष्टाचार में शामिल हो गए हैं। ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि इस कोरोना के खौफनाक संकट में आम गरीब, भूख की समस्या से परेशान लोग अपनी फरियाद किसके पास लेकर जाये?

बता दें कि पलामू जिले के डालटनगंज सदर प्रखंड अंतर्गत सुआ पंचायत के बिन्हुआ टोला में करीब 35 आदिम जनजाति परहिया परिवार रहते है। जो पहले से ही अत्यन्त गरीबी की हालत में जिन्दगी गुजार रहे थे। अब इस कोरोना की महामारी के संकट और इसके मद्देनजर लॉकडाउन से इनकी हालत और खराब हो गई है।

राशन वितरण में भ्रष्टाचार का बोलबाला

इस टोला के परहिया परिवारों को एम0 ओ0 द्वारा अप्रैल एवं मई 2020 का खाद्यान्न मुहैया कराना था, लेकिन लाभुकों को सिर्फ एक माह का राशन दिया गया है, जबकि उनके कार्ड में जून 2020 तक राशन की मात्रा दर्ज कर दी गई है।

इसकी जानकारी वहां के लोगों कों तब हुई जब झारखंड नरेगा वाच के राज्य संयोजक जेम्स हेरेंज ने अपनी टीम के साथ वहां जाकर यह जानने की कोशिश की कि इन लोगों को सरकारी सुविधा का लाभ मिल रहा है या नहीं।

बता दें कि यहां इस समुदाय में साक्षर लोगों की संख्या नगण्य है। उन्हें जब उनके कार्ड में दर्ज मात्रा की जानकारी मिली तो वे लोग आक्रोशित तो हुए, परंतु इस संकट की घड़ी में ये लोग इस डर से शिकायत दर्ज कराने से पीछे हट गए कि कहीं जो कुछ कुछ खाने को मिल रहा है, वह भी न बंद हो जाये।

टीम द्वारा जब एक-एक कार्ड की जांच की गई तो राशन चोरी के अन्य मामले भी सामने आए। यहां दो ऐसे आदिम जनजाति परिवार मिले जिनके नाम से दो-दो राशन कार्ड बने हैं, जबकि इन्हें एक कार्ड से खाद्यान्न दिया जा रहा है। मनोहर बैगा, पिता गिरवर बैगा के नाम से 2 राशन कार्ड (202005051112 व 202005574268) बनाया गया है। जबकि लाभुक को एक कार्ड से खाद्यान्न दिया जा रहा है. ऑनलाइन रिकॉर्ड के अनुसार दूसरे कार्ड से प्रत्येक माह राशन उठाया जा जा रहा है।

मृत आदमी के नाम से भी लिया जा रहा है राशन

इसी प्रकार कार्ड सं0 — 202005574126 है, जो अन्छू परहिया के नाम से है, जबकि उसकी मृत्यु बहुत पहले ही हो चुकी है। इस मामले का सबसे भ्रष्टतम पहलू यह है कि उसके नाम से भी हर माह 35 किलो का राशन उठाव किया जा रहा है।

बसन्ती कुअंर जिनके पास कार्ड (सं0 — 20200557426863) हैृ लेकिन इसके बावजूद अप्रैल 2018 के बाद से खाद्यान्न वितरित नहीं किया गया है, जबकि इसके कार्ड में भी ऑनलाइन रिकॉर्ड बताता है कि उसे नियमित राशन वितरित किया गया है।

जब डालटनगंज सदर प्रखंड के प्रखंड आपूर्ति पदाधिकारी से इन आदिम जनजातियों के अनाज वितरण में गड़बडी के मामले पर जब पूछा गया तो उन्होंने बताया कि आदिम जनजाति को डाकिया योजना के तहत मिलने वाले अनाज के लिए कोई दुकानदार नियुक्त नहीं है। इसे प्रखण्ड आपूर्ति पदाधिकारी ही देखते हैं।

जब एक परिवार के दो—दो राशन कार्ड के बारे में पूछा गया तो एमओ ने कहा कि मैं मामले को देखता हूं और जांच करता हूं।

उन्होंने कहा कि राशन लाभुकों के घर तक पहुंचाने का काम स्वयंसेवक उपेन्द्र करते हैं। अगर कोई गड़गड़ी हो रही है तो वही कर रहे होंगे। उनका यह बयान काफी गैरजिम्मेदाराना था।

राशन कार्ड रद्द होने से पड़े खाने के लाले

अब आते हैं गुमला जिला के ग्राम नरेकेला। ग्राम नरेकेला से 35 - 40 किलोमीटर दूर है टोलोंग्सेरा गांव। नरेकेला के ललित साहू का राशन कार्ड (संख्या 202006623478) टोलोंग्सेरा गांव के राशन डीलर रामावतार साहू के पास था। मतलब कि ललित साहू को अपना पीडीएस का राशन लेने के लिए जाना पड़ता था 35 - 40 किलोमीटर दूर टोलोंग्सेरा गांव। जिसके कारण इनका पूरा दिन के राशन लाने में लग जाता था। 35 - 40 किलोमीटर के सफर में किराया खर्च के अलावा ललित का दैनिक मजदूरी भी मारी जाती थी। आज उसका वह राशन कार्ड भी रद्द हो गया है।

दरअसल जिला आपूर्ति पदाधिकारी कार्यालय में बैठे कम्प्यूटर ऑपरेटर ने नरेकेला में रहने वाले ललित के कार्ड संख्या 202006623478 को उनके घर से 35 - 40 किलोमीटर दूर टोलोंग्सेरा गांव के राशन डीलर रामावतार साहू के साथ टैग कर दिया था। लाभुक उक्त डीलर से बात कर हरेक दो महीने पर एक बार राशन लेने जाता था। दो महीने का 30 किलो राशन लेने के लिए उसे दिनभर की मजदूरी भी गंवानी पड़ती थी। साथ ही इसके लिए वह बसिया सिमडेगा रोड में पुटरी टोली तक बस से जाता, फिर वहां से तोलोंग्सेरा गांव 15 किलोमीटर अपनी साईकिल से जाकर फिर राशन लेकर वापस आता। फिर बस से बसिया तक आकर अपने घर आता था।

पिछले वर्ष मई जून का राशन लेने वह नहीं जा सका था। क्योंकि वह गंभीर रूप से बीमार हो गया था। जब वह जुलाई में राशन लेने गया तो मशीन में अंगूठा मिलान नहीं होने के कारण डीलर ने उसे राशन नहीं दिया। डीलर रामावतार ने संदेह व्यक्त किया था कि शायद उसका कार्ड स्थानीय डीलर को हस्तांतरित हो गया हो।

डीलर की सलाह पर उसने बसिया एम०ओ० को आवेदन दिया। आज जब लॉकडाउन में उसके परिवार में खाद्य संकट गहरा गया है, तब चेक करने से पता चल रहा है कि उसका कार्ड रद्द हो गया है। आज उनके पास न कोई रोजगार है और न ही कोई सरकारी राहत सामग्री उस तक पहुंची है। उनके परिवार में कुल 6 सदस्य हैं, जिसमें पति पत्नी और चार छोटे बच्चे शामिल हैं। आज उसे सरकारी मदद का इंतजार है, मगर अभी तक उसे सरकारी मदद नहीं मिल पाई है।

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