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दिल्ली सरकार से थी उम्मीद लेकिन वह भी कांवड़ियों के नाम पर फैला रही अंधविश्वास

Prema Negi
7 July 2019 5:13 AM GMT
दिल्ली सरकार से थी उम्मीद लेकिन वह भी कांवड़ियों के नाम पर फैला रही अंधविश्वास
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सड़कों पर नंगे पैर चलते नौजवानों के जत्थे के जत्थे, तरह तरह की हरकतें, नियमों को तोड़ते दृश्य। गलती से भी किसी की कार, मोटरसाईकिल या साइकिल उनसे छू गई तो कांवड़िये बना देंगे आपका हलवा...

कांवड़ यात्रा जैसे धार्मिक आयोजनों के नाम पर सड़कों में मचने वाले गदर और डरावने माहौल के बारे में अपने अनुभव साझा कर रहे हैं वरिष्ठ लेखक प्रेमपाल शर्मा

दिल्ली में मानसून तो अभी नहीं पहुंचा, लेकिन कावड़ यात्रा की तैयारियों की खबरें रोज पहुंच रही हैं। कभी मेरठ से सहारनपुर के रास्ते का प्रबंध तो कभी आगे हरिद्वार का।दिल्ली में भी टेंट लगाने, खाना खिलाने, पुण्य लुटाने के ठेके की चर्चा शुरू हो गई है।

भी जुलाई में स्कूल भी खुले हैं। क्या आपने स्कूल खोलने, उसकी तैयारी की कोई खबर सुनी? जमुना और गंदी हो गई है उसकी तैयारी, उसकी सफाई के लिए कोई जन जत्था, कोई ठेकेदार कोई मुख्यमंत्री कोई केंद्रीय मंत्री कोई आबा कोई बाबा सामने आया? नहीं! हम आने भी नहीं देना चाहते। हम नहीं चाहते कि भारत 15वीं, सोलहवीं सदी से आगे आए।

मैं कावड़ यात्रा से होने वाली जाम सड़कों पर घटना-दुर्घटना, मारपीट की स्मृतियों को सोचकर ही डरने लगा हूं। पूरे 15 दिन अखबार भरे रहेंगे कि कांवड़ियों ने कार बस फूंक दी, तोड़फोड़ की, सड़क पर 12 घंटे का जाम रहा और फिजा में ऐसी बनावटी धार्मिकता की जीना और सांस लेना भी दूभर हो जाए।

दिल्ली सरकार से हम सबको उम्मीद थी इस पर कुछ रोक लगाएगी, मगर यह मात्र उम्मीद बनकर ही रह गयी। पिछली सरकार चाहे कांग्रेस हो या भाजपा की, कांवड़ यात्रा के बहाने सड़कों पर खूब माल खाया जाता है। लाउडस्पीकरों की ऐसी आवाज की बहरे हो जाएं।

मुझे कांवड़ यात्रा के दिनों में शाहदरा या उसके आसपास जाने में भी डर लगता है। सीलमपुर और उसके आसपास पूरी सड़कें टैंटों से छाई रहती हैं। सड़कों पर नंगे पैर चलते नौजवानों के जत्थे के जत्थे। तरह तरह की हरकतें करते, नियमों को तोड़ते दृश्य। गलती से भी किसी की कार, मोटरसाईकिल या साइकिल उनसे छू गई तो यह बना देंगे हलवा।

ह 21वीं सदी का भारत है? क्या यह है उस देश की राजधानी है, जिसकी अर्थव्यवस्था दुनिया की छठी अर्थव्यवस्था है और वह वह पांचवीं के लिए कसमसा रही है? वह देश जो अपने चंद्रयान, सूर्ययान और जाने कितनी एसएलवी पीएसएलवी पर नाज करता है?वह देश जो पिछले 40—50 सालों से दुनिया की तीसरी सबसे तकनीकी आबादी पर फक्र करता है।

मैं कैसे समझौता करूं अपने दिमाग में कि हम आगे बढ़ रहे हैं या पीछे जा रहे हैं?अनंत दुख की गाथाएं हैं कि हरिद्वार के रास्ते में 12 घंटे लगे और मेरठ से दिल्ली आने में 24 घंटे का समय। मेरा अनुभव पश्चिम उत्तर प्रदेश के आसपास का है, लेकिन बताते हैं कि यही हालत पूरे उत्तर प्रदेश और आगे बिहार की भी है।

क्या धर्म और परंपराएं सिर्फ सड़कों पर दिखाने के लिए हैं? कभी गणपति विसर्जन तो कभी किसी और धर्म की यात्रा आयोजन। किसी वक्त यह धर्म परंपराएं अपने समय के अनुसार शुरू हुई होंगी। यदि कावड़ यात्रा के संदर्भ में याद करें तो चौमासे यानी बरसात के मौसम में किसानों के पास कोई काम नहीं रहता। ऐसे में उन्होंने कुछ तीर्थ आदि का मीजान बिठाया और और धर्म में शामिल कर लिया।

नुष्य की प्रकृति, प्रवृत्ति परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालने और ढलने की है, इसीलिए वह सारे प्राणी जगत में सबसे ताकतवर प्राणी है। परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तन करने के कारण भी वह लगातार विकास करता गया है। व्यक्ति के रूप में भी, समाज के रूप में भी और देश और राष्ट्र के रूप में भी।

मौजूदा समय में आने—जाने के सैकड़ों साधन हैं और भी सुविधाएं बढ़ी हैं तो जरूरी नहीं की नंगे पैर उन सड़कों को घेरा जाए, दूसरों के रास्ते रोके जाएं। अधिक नहीं तो इतना तो किया ही जा सकता है की कावड़ यात्रा 15 दिन के बजाय सिर्फ प्रतीक रूप में 1 दिन निश्चित की जाये। इतने सुधार से आसमान तो नहीं गिर जाएगा।

क्या सैकड़ों बार हमने धर्म और परंपराओं को नहीं बदला? क्या जाति का वही स्वरूप है जो हजारों सालों से कायम था? क्या हिंदू कोड बिल एक प्रगतिशील कदम नहीं है? क्या तीन तलाक से छुट्टी पाना ऐसा ही बराबरी लाने का कदम नहींं है? सैकड़ोंं परंपराएं हैं जो आधुनिक भारत ने बदली हैं। फिर कांव​ड़ यात्रा जैसी अव्यवस्था फैलाने वाली यात्रा को सरकारों का सहयोग क्यों? क्यों सार्वजनिक सड़कों पर यह हिंसा? कई बार कोई एंबुलेंस की गाड़ी फंस जाती है और कई बार आपसी लड़ाई दुर्घटनाएं हो रही हैं। सच्चा मनुष्य धर्म तो वह है जो दूसरों की किसी भी असुविधा पैदा न करे।

श्चर्यजनक पक्ष, बल्कि कहें दुखद पक्ष दिल्ली की आप सरकार का है, जिसके मुख्यमंत्री उस तकनीकी संस्थान में पढ़े हैं, जिन्हें आधुनिक भारत का मंदिर कहा जाता है। उनकी तुलना पूर्व मुख्यमंत्रियों से नहीं की जा सकती, जिनको खारिज करके उनकी पार्टी सत्ता में आई थी। दिल्ली का समाज ऐसा धर्मभक्त भी नहीं है। यह एक महानगर है। यहां विदेशी दूतावास हैं, विश्वविद्यालय हैं, लोगों को दफ्तर और काम पर जाना होता है और आप इन कांवड़ियों की खातिर इनके स्वागत में सड़कों पर टेंट लगाते हैं।

दि आम आदमी पार्टी की राजनीति अलग है तो आपको धर्म और परंपराओं को देखने का नजरिया भी अलग करना होगा। अच्छा होता कि आप सरकार ऐसे सभी रास्ता रोकने वाले, अव्यवस्था फैलाने वाले वाली परंपराओं वह चाहे छठ हो या किसी और धर्म रीति के बहाने उन पर नियंत्रण करें और शासन-प्रशासन की ऐसी बड़ी लकीर खींचे जो दूसरी राजनीतिक पार्टियों के लिए भी सबक बने।

स वर्ष तो वैसे भी आम आदमी पार्टी के पास दिल्ली में अंतिम मौका है, उन सिद्धांतों को जमीन पर उतारने का। सच मानिए दिल्ली की जनता आपकी तारीफ ही करेगी, क्योंकि सभी लोग सड़कों पर ऐसे उत्पातों से आजिज आ चुके हैं।

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