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राजनीति

मुसलमान होना 'गुनाह' क्यों है इस मुल्क़ में!

Prema Negi
2 March 2019 7:09 AM GMT
मुसलमान होना गुनाह क्यों है इस मुल्क़ में!
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11 बेगुनाह मुस्लिम जब वर्षों बाद अदालत से निर्दोष हो घर लौटते हैं तब तक उनकी दुनिया उजड़ चुकी होती है, समाज उन्हें शक की नजरों से देखता है, जबकि इन्हें मनमाने तरीके से फंसाने वाली पुलिस कभी पदोन्नति तो कभी बहादुरी का मैडल अपने सीने पर लगाए फूला नहीं समाती। क्या उन बेगुनाहों की जेल की सलाखों के पीछे गुजरी जिंदगी को कोई लौटा सकता है....

बता रहे हैं सुशील मानव

25 साल कोई छोटा समय नहीं होता जज साहेब। इतने वक़्त में एक नवजात पूरा जवान हो जाता है। इतने वक़्त में एक जवान औरत का यौवन उसके देह से विरक्त हो जाता है। एक अधेड़ मां-बाप दुनिया से कूच कर जाते हैं, सीने में बेटे के आतंकवादी होने के ज़हालत लिए लिए। और आपका कानून आरोपियों को बेगुनाह कहने में 25 बरस बरस लगा देता है जज साहेब। कुछ भी कह लीजिए पर इसे इंसाफ़ तो हर्गिज़ नहीं कहा जा सकता। आप आरोपियों को उनकी ज़िंदग़ी के बेशकीमती 25 वर्ष तो नहीं लौटा सकते। न सामाजिक, न मानसिक, न ही जैविक रूप से। पर आप उन्हें आर्थिक मुआवजा देने का आदेश तो भारत सरकार को दे ही सकते थे।

आखिर मुसलमानों को ही पुलिस राष्ट्रविरोधी मामलों में क्यों गिरफ्तार करती है, जब उसके पास अदालत में साबित करने का कोई आधार ही नहीं होता?

गौरतलब है कि नासिक की विशेष टाडा कोर्ट ने 25 साल बाद बुधवार, 27 फरवरी को जांच के दौरान साक्ष्यों के अभाव और टाडा दिशा निर्देशों के उल्लंघन का हवाला देते हुए 11 आरोपियों को बरी कर दिया। फैसला नासिक की विशेष टाडा अदालत के न्यायाधीश एससी खाती ने सुनाया।

अदालत से बरी होने वालों में जमील अहमद अब्दुल्ला खान, मोहम्मद यूनुस मोहम्मद इशाक, फारूक नजीर खान, यूसुफ गुलाब खान, अय्यूब इस्माइल खान, वसीमुद्दीन शमशीन, शिखा शफी शेख अज़ीज़, अशफ़ाक सैयद मुर्तुज़ा मीर, मुमताज़, मुमताज़, मुमताज़ सईद शामिल हैं।

इन सबको 28 मई 1994 को महाराष्ट्र और देश के अन्य हिस्सों से गिरफ्तार किया गया था और उन पर भारतीय दंड संहिता की धारा 120 (बी) और 153 के तहत आरोप लगाए गए थे और धारा 3 (3) (4) (5) और धारा 4 (1) (4) ) के तहत बाबरी मस्जिद विध्वंस का बदला लेने और इस संबंध में कश्मीर में आतंकवादी प्रशिक्षण शिविरों में भाग लेने की योजना बनाने के लिए टाडा अधिनियम के तहत गिरफ्तार किया था।

इससे पहले जस्टिस टी.एस. ठाकुर और जस्टिस सी. नागप्पन की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने 18 जुलाई, 2014 को सभी 11 आरोपियों को 1993 में सूरत बम विस्फोट मामले में बरी कर दिया था। उस बम विस्फोट में एक स्कूली लड़की की मौत हो गई थी और कई लोग घायल हो गए थे। सर्वोच्च अदालत ने 2008 में गुजरात टाडा अदालत के फैसले को उलटते हुए ये फैसला दिया था। उस फैसले में आरोपियों को 10 से 20 साल कैद की सजा सुनाई गई थी।

ये विस्फोट बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के बाद मुंबई और सूरत में भड़के उन दंगों के जवाब में थे, जिनमें शहर के वारछा रोड और वेद रोड इलाकों में दंगाइयों ने करीब 200 मुसलमानों की हत्या कर दी थी।

वारछा रोड विस्फोट मामले में पुलिस ने घटना के कुछ ही दिन के भीतर 27 लोगों को गिरफ्तार किया था, लेकिन साक्ष्य के अभाव में उन सभी को टाडा अदालत ने दो साल बाद बरी कर दिया। पुलिस ने उसी साल रेलवे स्टेशन विस्फोट मामले के संबंध में 11 अन्य लोगों को गिरफ्तार किया और उन्ह़़ें वारछा रोड मामले में आरोपी भी बनाया।

इससे पहले 27 अक्तूबर 2013 को बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी बिहार की राजधानी पटना में हुंकार रैली के दौरान गांधी मैदान में एक के बाद एक कई बम धमाके हुए। बीजेपी शासित राज्य छत्तीसगढ़ की पुलिस ने सिमी के कुल 16 संदिग्धों को देशद्रोह जैसे गंभीर आरोप में गिरफ्तार किया था। लेकिन उसे साबित करने का आधार उसे 90 दिन में भी नहीं मिल पाया। उसे साबित करना तो दूर, अदालत में चार्जशीट तक पेश नहीं कर पाई। अतः 24 मार्च को स्थानीय अदालत ने उनमें से 14 संदिग्धों को जमानत दे दी।

दिल्ली-गाजियाबाद बम ब्लास्ट के मामले में 1996 में गिरफ्तार मोहम्मद आमिर खान को 14 साल बाद कोर्ट ने बरी कर दिया। लेकिन इन 14 साल में उसकी दुनिया उजड़ चुकी है, पिता हाशिम खान बेटे की गिरफ्तारी के तीन साल बाद समाज के बहिष्कार और न्याय की आस छोड़कर दुनिया से चल बसे, तो दशक भर की लड़ाई के बाद 2008-09 में आखिर आमिर की मां की हिम्मत भी जवाब दे गई और वे सदमे से लकवाग्रस्त हो गईं।

मालेगांव मस्जिद धमाके में 2006 में एटीएस ने 9 लोगों को साजिश रचने के मामले में गिरफ्तार किया गया। पांच साल बाद मकोका अदालत ने छोड़ दिया। लेकिन जब 16 नवंबर, 2011 को वे रिहा हुए तो उन्हें मालूम पड़ा कि मतदाता सूची से उनके नाम काट दिए गए थे, परिवार को मानसिक यातनाओं से गुजरना पड़ा। परिवार में कोई रोजगार नहीं था। यूपी के रामपुर के रहने वाले 35 वर्षीय जावेद अहमद 11 साल तो कानपुर के वासिफ हैदर को बेगुनाह होने के बावजूद 9 साल जेल में बिताने पड़े।

बिजनौर के 32 वर्षीय नासिर हुसैन को 22 धमाकों का मास्टरमाइंड बताया गया, लेकिन 14 साल के बाद वह निर्दोष साबित हुआ। युवा मकबूल शाह को अपनी जिंदगी के 14 साल तिहाड़ जेल में बिताने पड़े। उस पर दिल्ली के लाजपत नगर धमाके का आरोप था, लेकिन दिल्ली हाइकोर्ट ने उसे बरी कर दिया। इसी तरह अब्दुल मजीद भट जो पहले श्रीनगर में आतंकियों के आत्मसमर्पण कराने में आर्मी की मदद करते थे, लेकिन किसी बात पर आर्मी इंटेलीजेंस में तैनात मेजर शर्मा से अनबन हो गई, उसके बाद मजीद पर मानो आफत आ पड़ी।

श्रीनगर में उसे पकड़वाने में नाकाम शर्मा ने दिल्ली पुलिस की मदद ली। दिल्ली पुलिस की टीम ने मजीद को श्रीनगर से उठाया, लेकिन उसे दिल्ली से गिरफ्तार बताया। लेकिन मजीद ने आरटीआइ के जरिए गाडिय़ों की लॉग बुक आदि मंगाई, जिससे पुलिस की थ्योरी गलत साबित हुई।

करीब दो दर्जन से ज्यादा ऐसे मामले सामने आ चुके हैं जिनमें मुस्लिम युवाओं को पुलिस ने फंसाया, लेकिन अदालत से बाइज्जत बरी कर दिया।

यूपी में रामपुरके 35 वर्षीय जावेद अहमद को 11 साल देशद्रोह का आरोप में जेल में बिताए। पाक की मोबीना से प्यार हुआ। दोनों लेटर लिखते थे, नाम के पहले अक्षर को कोड बना रखा था। यूपी एसटीएफ ने जे और एम बनाकर जावेद को आतंकी बताया।

कानपुर निवासी वासिफ हैदर को देशद्रोह, दंगों के आरोप में दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने काम से घर लौटते समय उठाया और तीन दिन की यातना के बाद पुलिस उसे खूंखार आतंकी बना चुकी थी, लेकिन करीब 9 साल जेल में बिताए के बाद वो अदालत से निर्दोष साबित होकर छूट गया।

बिजनौर के 32 वर्षीय नासिर हुसैन को 7 साल जेल में गुजारने के बाद अदालत से छोड़ दिया गया। उन पर हूजी का आतंकी और ट्रेन में विस्फोट का आरोप था। यूपी एसटीएफ ने तब उठाया जब वह देहरादून में कन्स्ट्रक्शन सुपरवाइजर का काम कर रहा था।

श्रीनगर के मकबूल शाह को दिल्ली के 1996 के लाजपत नगर धमाके में पुलिस ने पकड़ा। मगर आरोप साबित न होने के बाद दिल्ली हाइकोर्ट ने मकबूल को 14 साल जेल में बिताने के बाद बाइज्जत बरी कर दिया।

अधिकांश मामलों में पुलिस की मनगढ़ंत बाइलाइन को मीडिया सनसनीखेज बनाकर परोसते रही है। कई बार आरोपियों को मीडिया ट्रायल का भी शिकार होना पड़ा। मीडिया और पुलिस संदिग्धों को आतंकी बताकर मानो अदालत का काम भी खुद ही कर देती है। मीडिया भी पुलिस की बात को अंतिम सत्य की तरह प्रचारित करता है, लेकिन अदालत से बरी हुए पीड़ित के बारे में कुछ नहीं बताता।

ऐसे बेगुनाह युवक जब वर्षों बाद अदालत से निर्दोष होकर घर लौटते हैं तब तक उनकी दुनिया उजड़ चुकी होती है और समाज उन्हें शक की निगाह से देखता है, जबकि इन्हें मनमाने तरीके से फंसाने वाली पुलिस वालों को कभी पदोन्नति तो कभी बहादुरी का मैडल अपने सीने पर लगाए फूला नहीं समाता। लेकिन उन बेगुनाहों की जेल की सलाखों के पीछे गुजरी जिंदगी को कोई लौटा नहीं सकता।

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