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झारखंड

ग्राउंड रिपोर्ट : सरकारी नीतियों के कारण गांव पहले से ही बदहाल, अब शहरों से लौटे मजदूरों को कैसे दे पाएंगे रोटी

Manish Kumar
11 May 2020 7:48 AM GMT
ग्राउंड रिपोर्ट : सरकारी नीतियों के कारण गांव पहले से ही बदहाल, अब शहरों से लौटे मजदूरों को कैसे दे पाएंगे रोटी
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गांवों में रोजगार के सीमित संसधानों के बीच लॉकडाउन के चलते अब प्रवासी मजदूर भी वापस लौट आए हैं यानी अब गांवों में रोजगार को लेकर संकट और गहराने वाला है...

राहुल सिंह की रिपोर्ट

जनज्वार: कृषि जोत लगातार छोटे होते जाने से छोटे किसानों का सीमांत किसान व भूमिहीन किसान बनने का दौर पहले से ही जारी है. बड़े उद्योगों से प्रतिस्पर्धा की वजह से उसी व्यवसाय में संलग्न रहे सैकड़ों छोटे उद्योग बंद हो चुके हैं. उस पर कोरोना महामारी के कारण महानगरों व विकसित राज्यों में कामबंदी की वजह से लाखों श्रमिक पूर्वी राज्यों में लौट रहे हैं. ऐसे में प्रवासी श्रमिकों के बोझ को झेलने के लिए कितने तैयार हैं हमारे गांव. पढिए झारखंड के डहुआ मेदनीडीह गांव के जमीनी हालात बताती यह रिपोर्ट.

60 साल की उम्र पार कर चुके नारायण सिंह संक्षिप्त बातचीत में ही छोटे उद्योगों के मर जाने से अपने गांव में पसरी बेरोजगारी का खांका खींच देते हैं. उनके पास रोलिंग मिल में काम करने का 40 साल का अनुभव है. देवघर के मोहनपुर प्रखंड के डहुआ मेदनीडीह गांव के नारायण सिंह ने गांव के पास की ही रोलिंग मिल से नौकरी की शुरुआत की और झारखंड, बिहार व बंगाल के कई शहरों में काम करने का अनुभव हासिल किया. वे रोलिंग मिल के फोरमैन पोस्ट पर पहुंच कर नौकरी से मुक्त हुए. लोहे के कारखाने में काम करने के दौरान उनकी हथेली बार-बार कटते छिलते रहे, जिससे वे आंशिक रूप से खराब भी हो गए है. बावजूद इसके वे अपने जीवन से मिलाजुला कर संतुष्ट हैं कि खुद कमाया और खाया.

लेकिन, उन्हें यह बात दुःख पहुंचाती है कि उनसे उम्र में काफी छोटे उनके गांव के लोग जो कभी रोलिंग मिल में काम करते थे, अब वे बेरोजगार हो गए हैं. उनसे दस से 20-25 साल तक छोटे इन लोगों ने भी रोलिंग मिलों से नौकरी की शुरुआत की लेकिन अब कोई दो साल से तो कोई 10 साल से बेरोजगार है. कुछ दिहाड़ी श्रमिक बन गए है. जब ये रोलिंग मिल में काम करते थे तो कई का पीएफ कटना शुरू हो गया था, यानी वे संगठित क्षेत्र के मजदूर हो गए थे. लेकिन 45 से 35 साल की उम्र के ऐसे कई लोग अब बेरोजगार हैं.

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नारायण सिंह बताते हैं कि कच्चा माल की आसान उपलब्धता खत्म हो जाने की वजह से भी कई छोटे रोलिंग मिल बंद हो गयीं तो कई बड़े उद्योगों का मुकाबला नहीं कर कर पायीं, वहीं कुछ पारिवारिक विवाद में भी बंद हुईं हैं. वो कहते हैं रोलिंग मिल ही नहीं किसी भी उद्योग की बड़ी इकाई में रोजगार के कम अवसर होते हैं, क्योंकि वहां की मशीनें ऑटोमेटिक होती हैं और उससे मजदूरों की जरूरत कम होती है. इसलिए जहां बड़े रोलिंग मिल शुरू भी हुए वहां रोजगार तुलनात्मक रूप से कम मिला.

नारायण सिंह कहते हैं कि अब आसपास के इलाके में कई फ्लावर मिल खुल गयी हैं, लेकिन वहां नौकरियां पर्याप्त संख्या में नहीं मिलती हैं, क्योंकि सारा काम ऑटोमेटिक मशीनों से होता है. वे कहते हैं कि पहले आरा, छपरा, बलिया तक से लोग यहां रोलिंग मिलों में काम करने आते थे, तब 17-18 मिलें थीं, अब एक हैं, जिसमें स्थानीय लोगों को भी रोजगार नहीं मिलता है.

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हरिहर सिंह, रंजीत सिंह, किशोर सिंह, जगदीश राय, विजय सिंह आदि आदि इस गांव के ऐसे ही नाम हैं, जो अब रोलिंग मिल बंद हो जाने के बाद या तो बेरोजगार हैं या दैनिक मजदूरी पर काम करते हैं. यानी संगठित क्षेत्र में अपेक्षाकृत अच्छी तनख्वाह की जगह अब असंगठित क्षेत्र के श्रमिक हो गए हैं. गांव के विजय सिंह प्रकाश आयरन में काम करते थे. प्रबंधन की ओर से उन्हें एक दिन कहा गया कि कुछ दिन काम बंद रहेगा फिर बुलाएंगा, लेकिन वह दिन कभी लौट कर आया नहीं. उसी तरह जगदीश राय वैष्णवी स्टील में काम करते थे, जो 10-12 साल पहले बंद हुआ तो इनका रोजगार भी बंद हो गया. उनके पास एक एकड़ से भी कम जमीन है, जिस पर परिवार का गुजारा करना मुश्किल है.

किशोर सिंह दुर्गा आयरन में काम करते थे. 55 साल की उम्र किशोर सिंह ने 7-8 साल काम किया, फिर काम बंद हुआ सो बंद ही है. दो एकड़ से भी कम जमीन उनके परिवार के पास है. ऐसे में आजीविका को लेकर जद्दोजहद बनी रहती है, जिसे लॉकडाउन ने अब और गहरा कर दिया है.

पहले से गांव पर पर बेरोजगारी का बोझ और उस पर प्रवासियों का वापस आना

डहुआ मेदनीडीह गांव पहले से ही बेरोजगारी का बोझ ढो रहा है. इसकी वजह खेती से जुड़ी सुविधाएं न होना, छोटी जोत और आसपास के छोटी औद्योगिक इकाइयों बंद होना है. उस पर कोरोना महामारी फैलने से प्रवासी श्रमिकों का गांवों में आना शुरू हो गया है. हमने गांव लौटे कुछ प्रवासी श्रमिकों से भी बात की.

मेदनीडीह गांव के ही प्रवासी श्रमिक अशोक राणा पश्चिम बंगाल के दुर्गापुर में बढई का काम करते थे. लॉकडाउन लग गया तो वे परेशानी में पड़ गए. काम धंधा भी बंद और उस पर घर की चिंता. खेतीबाड़ी है नहीं. अशोक राणा अन्य तीन लोगों के साथ साइकिल से ही दुर्गापुर से गांव के लिए चल दिए. अशोक बताते हैं कि उन्हें 500 रुपये की हाजिरी दुर्गापुर में मिलती थी, अगर डेढ हाजिरी करते थे तो 750 रुपये एक दिन में बन जाता था. लेकिन, लॉकडाउन में काम बंद हो गया. इस सवाल पर कि यदि लॉकडाउन खुल जाए तो वे तुरंत कमाने दुर्गापुर चले जाएंगे, अशोक राणा निराश होकर कहते हैं कि लॉकडाउन खुल भी जाएगा तो हमें तुरंत काम नहीं मिलेगा, क्योंकि मैटेरियल खत्म हो गया है. यानी लॉकडाउन से बेपटरी हुई जिंदगी तुरंत पटरी पर नहीं आएगी.

ऐसे में उनका गांव उनके बोझ को कैसे उठाएगा इस सवाल पर दो बच्चों के पिता अशोक राणा कहते हैं मनरेगा में रजिस्ट्रेशन होगा तो गांव में ही काम कर लेंगे. यानी 500 से 750 रुपये प्रतिदिन कमाने वाला शख्स 194 रुपये के रोजगार के लिए तैयार है. यह स्थिति असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों की कमाई और घटने की ओर इशारा करती है. मंटू राणा नाम के एक युवा श्रमिक कहते हैं कि अब हम दो-तीन साल गांव नहीं छोड़ेंगे और आसपास ही काम करेंगे.

डहुआ मेदनीडीह गांव के ही 27 साल के रोहित सिंह पटना में रोड कंस्ट्रक्शन में ठेकेदार के साथ काम करते थे. वे लाॅकडाउन लगने से पहले ही घर लौट आये थे. रोहित कहते हैं कि गांव में नहीं रुकेंगे. हां, अगर यहां काम मिल गया तो बाहर नहीं जाएंगे. सरकार की घोषणाओं पर वे कहते हैं कि वह सिर्फ उम्मीद पर काम करती है. यानी रोहित को बहुत भरोसा नहीं है कि राज्य सरकार अपनी घोषणाओं के अनुरूप लोगों को रोजगार दिला पाएगी.

बाहर से लौटने वाले श्रमिक क्या मनरेगा व कृषि में पा सकेंगे रोजगार?

मेदिनीडीह पंचायत की मुखिया सोनी कुमारी प्रवासी श्रमिकों को लेकर सक्रिय हैं. एक ओर जहां पंचायत भवन को जरूरत के मुताबिक क्वरंटाइन सेंटर बनाने का निर्णय लिया गया है, वहीं रोजगार सृजन के उपायों पर वे पहल कर रही हैं. मुख्यमंत्री द्वारा घोषित नयी योजनाओं से भी लोगों को जुड़ने के लिए वे प्रेरित कर रही हैं. सोनी कुमारी कहती हैं मजदूरों के परिजन रजिस्ट्रेशन के लिए संपर्क कर रहे हैं ताकि यहां रोजगार मिलने में उन्हें सहूलियत हो सके. वे बताती हैं कि करीब 100 प्रवासी श्रमिक उनके गांव के बाहर फंसे हुए हैं और 20 से 25 लोगों ने गांव में रोजगार उपलब्ध कराने के लिए रजिस्ट्रेशन के लिए भी संपर्क किया है. मुखिया कहती हैं कि उन्होंने 10 एकड़ पर बागवानी करवाने की योजना बनायी है. इसको लेकर मनरेगा से स्टीमेट आया है. 30 लाख की इस योजना में 18 लाख की मजदूरी मजदूरों को मिलेगी तो उनके हाथ में पैसे आएंगे.

मुखिया सोनी कुमारी के पति व सामाजिक कार्यकर्ता उमेश यादव कहते हैं: मेदनीडीह पंचायत में 16 गांव हैं, शहर के निकट होने के कारण यहां के लोग बाहर कम गए हैं, लेकिन अभी भी कम से कम 100 लोग फंसे हुए हुए हैं और वे गांव आएगे ही. इससे मनरेगा में रोजगार की मांग बढेगी.

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शहर से गांव के नजदीक होने की वजह से अबतक लोगों का मनरेगा की ओर झुकाव कम रहा है, क्योंकि उससे दोगुनी मजदूरी उन्हें शहर में मिला करती है. लेकिन, अब मनरेगा में मजदूरी 171 रुपये से बढाकर 194 रुपये की गयी है और कोरोना महामारी में काम धंधे बंद होने से बेरोजगारी भी बढेगी तो उस ओर लोगों का झुकाव होगा. इसका एक अच्छा असर यह होगा कि मनरेगा से गांव में कुछ एसेट तैयार हो सकेंगे. जैसे, सिंचाई कूप, तलाब, बगीचे आदि.

श्रम मंत्री सत्यानंद भोक्ता के क्या हैं दावे?

झारखंड सरकार के श्रम मंत्री सत्यानंद भोक्ता ने जनज्वार से बातचीत में कहा कि बड़ी संख्या में आ रहे मजदूरों को रोजगार उपलब्ध कराना हमारे लिए चुनौती है और सीएम हेमंत सोरेन के निर्देश पर विभिन्न विभाग इस दिशा में आपसी समन्वय से काम कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि ग्रामीण विकास विभाग, पेजयल स्वच्छता विभाग व दूसरे विभागों के साथ श्रम विभाग समन्वय के साथ काम कर रहा है. उनका कहना है कि लाॅकडाउन के बाद अबतक 50 हजार मजदूर प्रदेश आ चुके हैं. उन्होंने कहा कि हमारा अनुमान है कि तीन लाख मजदूर लॉकडाउन खुलने के बाद प्रदेश लौटेंगे.

ने कहा कि कोरोना कॉल सेंटर में हमें साढे आठ लाख - नौ लाख शिकायतें प्राप्त हुईं, लेकिन हमने वास्तविक संख्या पता करने के लिए बीडीओ को कहा और पंचायत के मुखिया व वार्ड मेंबर की मदद ली और सरकार को इस आधार पर यह जानकारी मिली है कि चार लाख 51 हजार 44 श्रमिक बाहर फंसे हुए हैं. इसमें सरकार का अनुमान है कि तीन लाख लोग लौटेंगे. डेढ लाख के करीब लोग ऐसे हैं जो बाहर परिवार के साथ शिफ्ट हैं और उनमें कई छोटे रोजगार धंधे में भी है. उनके लौटने की संभावना कम है. लेकिन, नौ से 15 हजार रुपये कमाने वाले मजदूरों को रोजगार देना हमारा लक्ष्य है. कृषि, मनरेगा व छोटे कारखानों में रोजगार सृजन की अधिक संभावना पर भोक्ता भी जोर देते हैं, लेकिन इसे कैसे लागू किया जाएगा यह देखना होगा.

बड़ी पिक्चर का एक छोटा-सा हिस्सा

दरअसल, डहुआ मेदनीडीह गांव की कहानी जमीनी हालात के एक बड़े पिक्चर का छोटा-सा हिस्सा है, जिससे आने वाले दिनों में झारखंड की हेमंत सोरेन सरकार को जूझना होगा. राज्य के कई ऐसे शहर हैं जहां सैकड़ों छोटे उद्योग प्रतिस्पर्धा में पिछड़ जाने या अन्य वजहों से बंद हैं और अनेकों बंद होने के कगार पर हैं. अब लॉकडाउन ने उनकी परेशानी बढा दी है. हाल ही में एक स्थानीय अखबार ने यह रिपोर्ट छापी है कि जमशेदपुर से सटे राज्य के सबसे बड़े औद्योगिक क्षेत्र आदित्यपुर में लॉकडाउन में सैकड़ों उद्योगों के बंद होने का खतरा उत्पन्न हो गया है और उन्होंने सरकार से मदद की गुहार लगायी है.

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पहले से मौजूद इस संकट के बीच कोरोना महामारी के कारण लागू लाॅकडाउन व कामबंदी की वजह से विभिन्न राज्यों व महानगरों से राज्य में प्रवासी श्रमिकों की वापसी का दौर जारी है. सरकार के दावे के अनुसार, 50 हजार श्रमिक अबतक लौटे हैं. इसके अलावा लाॅकडाउन के ठीक पहले या उसके बाद करीब दो लाख श्रमिक राज्य में पहुंचे हैं. जबकि कम से कम तीन लाख के और पहुंचने का अनुमान है. इनमें अधिकतर यातायात की सुविधा मिलते ही राज्य लौटेंगे. इतनी बड़ी संख्या में आने वाले श्रमिकों के लिए रोजगार सृजन करना एक बहुत बड़ा टास्क होगा.

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन प्रवासी श्रमिकों को रोजगार उपलब्ध कराने के लिए संकल्प व्यक्त कर रहे हैं और इसके लिए कोशिश करते भी दिख रहे हैं, लेकिन सरकार के प्रयासों व जमीनी हकीकत के अंतर अधिक गहरा है. लोकतांत्रिक सरकारें काम होता हुआ दिखाने के लिए कई बातें कहती हैं जो जमीन पर उस रूप में सामान्यतः नजर नहीं आ पातीं.

हेमंत सरकार की क्या है तैयारी?

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने पिछले सप्ताह ग्राम विकास की तीन महत्वाकांक्षी योजनाओं की शुरुआत की. इसके केंद्र में ग्रामीणों के साथ प्रवासी श्रमिकों को रोजगार उपलब्ध कराने की सोच है. मुख्यमंत्री सोरेन ने कहा कि इसके जरिए पांच सालों में श्रमिकों के हाथ में 20 हजार करोड़ रुपये जाएंगे और 25 करोड़ मानव दिवस रोजगार का सृजन होगा. इन योजनाओं का नाम है: बिरसा हरित ग्राम योजना, नीलांबर.पितांबर जल समृद्धि योजना और वीर शहीर पोटो हो खेल विकास योजना.

बिरसा हरित ग्राम योजना के तहत पेड़ लगाने हैं और सरकार का दावा है कि ऐसा किए जाने के तीन साल बाद 50 हजार रुपये की वार्षिक आय संबंधित व्यक्ति को होने लगेगी. वहीं, नीलांबर-पितांबर जल समृद्धि योजना से पांच लाख करोड़ लीटर भूमिगत जल की वृद्धि की योजना है और इसके लिए जरिए रोजगार सृजन का लक्ष्य है. वीर शहीर पोटो हो खेल विकास योजना के तहत पंचायत स्तर पर मैदान तैयार किए जाएंगे और खिलाड़ियों को नौकरियों में आरक्षण दिया जाएगा.

पेड़ लगाने व जल संचयन जैसी योजना झारखंड के लिए नयी नहीं हैं, बस इसके स्वरूप सरकारों के साथ बदलती रही है. पेड़ लगाने के तीन साल बाद ही 50 हजार की कमाई कैसे होगी, यह बड़ा सवाल है. पर, एक बात बहुत स्पष्ट है कि लॉकडाउन के बाद के हालात में खेती, मनरेगा और छोटे उद्योग ही रोजगार सृजन के बड़े आधार बन सकते हैं.

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