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संस्कृति

चमत्कार है इस माटी में

Janjwar Team
20 Oct 2017 1:22 PM GMT
चमत्कार है इस माटी में
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सप्ताह की कविता' में आज जनकवि नागार्जुन की कविताएं

नागार्जुन जन कवि इन अर्थों में हैं कि उनके यहाँ जन की अभिव्यक्ति देखने के ही स्तर पर नहीं होती, वह दृष्टि के स्तर पर भी होती है। नागार्जुन जन की पीड़ा से सीधे संवेदित होकर निराला की तरह अपना कलेजा दो टूक नहीं करते, बल्कि वे उसे चिंतन के स्तर पर ले जाते हैं। वे चिंतित नहीं होते, बल्कि उसे धैर्य के साथ वहन करते हैं और जन के दुखों की व्यापकता को देखते हैं।

जबकि शमशेर की प्रवृत्ति उर्ध्वमुखी है, उनके यहाँ एक ऊँचाई है, तो नागार्जुन के यहाँ विकास क्षैतिज है, वहाँ विस्तार है। शमशेर की चिंता में शामिल होकर जन एक ऊँचाई को प्राप्त करता है, वह एक आदर्श स्थिति में आ जाता है। पर नागार्जुन का विस्तार जन को लेकर आगे बढ़ता है और जन-जन की ताक़त से जुड़ता है।

नागार्जुन की कविता 80 फ़ीसदी ग्रामीण भारत को ख़ुद में समेट कर चलने वाली भारतीय कविता है, वह रघुवीर सहाय की तरह महानगरीय बोध में सीमित रहनेवाली कविता नहीं है।

नागार्जुन के यहाँ चूल्हा रोता है, चक्की उदास होती है। रघुवीर सहाय के यहाँ रामदास उदास होता है, क्योंकि वह अकेला असहाय होता है। पर चक्की समूह की उदासी को लेकर चलती है, इसीलिए वहाँ ख़ुशी लौटती है। नागार्जुन के यहाँ दुख अकेला नहीं करता है, वह एकता का भाव पैदा करता है, जिसमें कानी कुतिया को भी आदमी के पास सोने की जगह मिलती है।

पहली बार निराला ने ‘कुकुरमुत्ता’ लिखकर गुलाबी संस्कृति के विरुद्ध विद्रोह किया था,नागार्जुन ने सुअरी पर कविता लिखी, उसे भी मादरे हिंद की बेटी कहा।

मुक्तिबोध ने लिखा था-‘इस दुनिया को साफ़ करने के लिए एक मेहतर चाहिए’। नागार्जुन ने बेहिचक वह काम किया। एक ओर उन्होंने ‘गीत-गोविंद’ का अनुवाद कर हमें अतीत की रागात्मकता से परिचित कराया, तो दूसरी ओर लेनिन पर संस्कृत में श्लोक भी लिखे। प्रेमचंद के होरी और गोबर के बाद की अगली समर्थ कड़ी बाबा का उपन्यास नायक ‘बलचनमा’ ही साबित होता है। घुमक्कड़ राहुल सांकृत्यायन केबाद नागार्जुन शायद हिंदी जगत के अंतिम यात्री साबित हों। आइए पढ़ते हैं नागार्जुन की कुछ कविताएं — कुमार मुकुल

पुलिस अफ़सर
जिनके बूटों से कीलित है, भारत माँ की छाती
जिनके दीपों में जलती है, तरुण आँत की बाती

ताज़ा मुंडों से करते हैं, जो पिशाच का पूजन
है अस जिनके कानों को, बच्चों का कल-कूजन

जिन्हें अँगूठा दिखा-दिखाकर, मौज मारते डाकू
हावी है जिनके पिस्तौलों पर, गुंडों के चाकू

चाँदी के जूते सहलाया करती, जिनकी नानी
पचा न पाए जो अब तक, नए हिंद का पानी

जिनको है मालूम ख़ूब, शासक जमात की पोल
मंत्री भी पीटा करते जिनकी ख़ूबी के ढोल

युग को समझ न पाते जिनके भूसा भरे दिमाग़
लगा रही जिनकी नादानी पानी में भी आग

पुलिस महकमे के वे हाक़िम, सुन लें मेरी बात
जनता ने हिटलर, मुसोलिनी तक को मारी लात

अजी, आपकी क्या बिसात है, क्या बूता है कहिए
सभ्य राष्ट्र की शिष्ट पुलिस है, तो विनम्र रहिए

वर्ना होश दुरुस्त करेगा, आया नया ज़माना
फटे न वर्दी, टोप न उतरे, प्राण न पड़े गँवाना

मोर न होगा ...उल्लू होंगे
ख़ूब तनी हो, ख़ूब अड़ी हो, ख़ूब लड़ी हो
प्रजातंत्र को कौन पूछता, तुम्हीं बड़ी हो

डर के मारे न्यायपालिका काँप गई है
वो बेचारी अगली गति-विधि भाँप गई है
देश बड़ा है, लोकतंत्र है सिक्का खोटा
तुम्हीं बड़ी हो, संविधान है तुम से छोटा

तुम से छोटा राष्ट्र हिन्द का, तुम्हीं बड़ी हो
खूब तनी हो,खूब अड़ी हो,खूब लड़ी हो

गांधी-नेहरू तुम से दोनों हुए उजागर
तुम्हें चाहते सारी दुनिया के नटनागर
रूस तुम्हें ताक़त देगा, अमरीका पैसा
तुम्हें पता है, किससे सौदा होगा कैसा

ब्रेझनेव के सिवा तुम्हारा नहीं सहारा
कौन सहेगा धौंस तुम्हारी, मान तुम्हारा
हल्दी. धनिया, मिर्च, प्याज सब तो लेती हो
याद करो औरों को तुम क्या-क्या देती हो

मौज, मज़ा, तिकड़म, खुदगर्जी, डाह, शरारत
बेईमानी, दगा, झूठ की चली तिजारत
मलका हो तुम ठगों-उचक्कों के गिरोह में
जिद्दी हो, बस, डूबी हो आकण्ठ मोह में

यह कमज़ोरी ही तुमको अब ले डूबेगी
आज नहीं तो कल सारी जनता ऊबेगी
लाभ-लोभ की पुतली हो, छलिया माई हो
मस्तानों की माँ हो, गुण्डों की धाई हो

सुदृढ़ प्रशासन का मतलब है प्रबल पिटाई
सुदृढ़ प्रशासन का मतलब है 'इन्द्रा' माई
बन्दूकें ही हुईं आज माध्यम शासन का
गोली ही पर्याय बन गई है राशन का

शिक्षा केन्द्र बनेंगे अब तो फौजी अड्डे
हुकुम चलाएँगे ताशों के तीन तिगड्डे
बेगम होगी, इर्द-गिर्द बस गूल्लू होंगे
मोर न होगा, हंस न होगा, उल्लू होंगे

भोजपुर

1.
यहीं धुआँ मैं ढूँढ़ रहा था
यही आग मैं खोज रहा था
यही गंध थी मुझे चाहिए
बारूदी छर्रें की खुशबू!
ठहरो–ठहरो इन नथनों में इसको भर लूँ...
बारूदी छर्रें की खुशबू!
भोजपुरी माटी सोंधी हैं,
इसका यह अद्भुत सोंधापन!
लहरा उठ्ठी
कदम–कदम पर, इस माटी पर
महामुक्ति की अग्नि–गंध
ठहरो–ठहरो इन नथनों में इसको भर लूँ
अपना जनम सकारथ कर लूँ!

2.
मुन्ना, मुझको
पटना–दिल्ली मत जाने दो
भूमिपुत्र के संग्रामी तेवर लिखने दो
पुलिस दमन का स्वाद मुझे भी तो चखने दो
मुन्ना, मुझे पास आने दो
पटना–दिल्ली मत जाने दो

3.
यहाँ अहिंसा की समाधि है
यहाँ कब्र है पार्लमेंट की
भगतसिंह ने नया–नया अवतार लिया है
अरे यहीं पर
अरे यहीं पर
जन्म ले रहे
आजाद चन्द्रशेखर भैया भी
यहीं कहीं वैकुंठ शुक्ल हैं
यहीं कहीं बाधा जतीन हैं
यहां अहिंसा की समाधि है...

4.
एक–एक सिर सूँघ चुका हूँ
एक–एक दिल छूकर देखा
इन सबमें तो वही आग है, ऊर्जा वो ही...
चमत्कार है इस माटी में
इस माटी का तिलक लगाओ
बुद्धू इसकी करो वंदना
यही अमृत है¸ यही चंदना
बुद्धू इसकी करो वंदना

यही तुम्हारी वाणी का कल्याण करेगी
यही मृत्तिका जन–कवि में अब प्राण भरेगी
चमत्कार है इस माटी में...
आओ, आओ, आओ, आओ!
तुम भी आओ, तुम भी आओ
देखो, जनकवि, भाग न जाओ
तुम्हें कसम है इस माटी की
इस माटी की/ इस माटी की/ इस माटी की

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