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बेबस भूखे पेट सड़क किनारे झुग्गियों में रहने वाली इन महिलाओं के लिए अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के क्या मायने हैं?

Janjwar Team
8 March 2020 2:31 PM GMT
बेबस भूखे पेट सड़क किनारे झुग्गियों में रहने वाली इन महिलाओं के लिए अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के क्या मायने हैं?
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सुशीला को ठीक से याद नहीं कि वो यूपी की हैं या एमपी की, लेकिन हैं भारत की नागरिक। उनके पुरखों का पता करने पर यहीं के रहने बताए गए। रोजाना 200 से 250 रुपये की आमदनी हो जाती है। लोहे को पीटने के उनके काम मे उनकी बहू रश्मि भी हाथ बटा देती है..

कानपुर से मनीष दुबे की रिपोर्ट

जनज्वार। आज अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस है। देश के तमाम भरोसेमंद अखबारों टीवी चैनलों ने देश का नाम कर रही या कर चुकीं महिलाओं को खूब छापा दिखाया। आज महिलाओं का खूब सम्मान किया गया, अच्छी बात है। कोई डॉक्टर थी, कोई नामचीन वकील, कोई उद्यमी, कोई तगड़ी राजनेता। देश के प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्रियों ने भी महिलाओं के लिए विभिन्न-विभिन्न योजनाएं चला बताकर मीडिया में तस्वीरें छपवाई-चलवाई।

ज अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के दिन जब सब फील गुड लग दिख रहा है तो 'जनज्वार' ने अपने ही देश में रहने वाली कुछ महिलाओं से उनके हालातों पर बात की। हमने पाया की इसी देश के राजनेता महिलाओं के सम्मान में बात कर रहे हैं तो ये लोग आखिर किस देश की निवासी हैं जिन्हें कभी-कभी कई-कई दिनों तक बेबस भूखे पेट तक सोना पड़ता हो।

कानपुर के शास्त्री चौक से लेकर विजय नगर तक गंदे बदबूदार नाले के बगल में ऐसे कई परिवार रहते हैं। महिला सशक्तिकरण, नारी सम्मान, उज्जवला योजना, कन्या धन, जन-धन जैसे अनगिनत धन हैं जो सरकार ने चलाये। इतने सारे धनों के बीच किसी एक भी योजना का नाम लेते ही यहां रहने वाले शून्य में खोकर बस मुस्कुरा देते हैं और उल्टा हमीं पर सवाल लाद देते हैं 'साब दिबवा देव।'

गुच्छे वाली गुलाबो

हां की 42 वर्षीय गुलाबो चाभी के छल्ले, प्लास्टिक की नींबू मिर्चे जिसमें काले रंग में लिखा था 'बुरी नजर वाले तेरा मुंह काला।' गुलाबो मूलनिवासी बाराबंकी की हैं। बाराबंकी उत्तर प्रदेश में ही पैदा हुई। काम के जुगाड़, बसर में पिछले 15 वर्षों से परिवार सहित कानपुर में रह रही हैं।

गुलाबो के 43 वर्षीय पति भी छल्ले और नजर उतारने भगाने वाले प्लास्टिक को बेचकर बसर कर रहे हैं। उनके तीन बच्चे हैं जिसमें दो लड़के एक लड़की हैं। गुजारे के नाम पर गुलाबो बताती हैं कि सब बस भगवान भरोसे चल रहा है। हमारा न बैंक बैलेंस, न जमापूंजी, रोज कमाना रोज खाना। ये बात शायद गुलाबो ने यस बैंक वाले खाता धारकों पर चोट करने के लिए कही हो जिसके बाद आखिर में उन्होंने कहा कि अपनी तो नमक रोटी ही ठीक है।

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लोहा पीटती शुशीला

थोड़ा आगे बढ़ने पर दादा नगर से आगे हमे शुशीला मिली। शुशीला की उम्र 42 वर्ष है। चिमटे से एक लोहे का टुकड़ा पकड़कर बेतहाशा हथौड़ा चलाये जा रही थीं। मैंने फोटो लेनी चाही तो बोलीं 'का भईया का फायदा फोटू खेंचके, कुछ होत मिलत तो हई नहीं।' मैं भी सरकार के बाद अपनी भी लाचारी पर मुस्कुरा दिया। शुशीला गड़िया लोहार समुदाय से हैं और 18 सालों से कानपुर में टट्टर और पन्नी लगे मकान में सड़क किनारे रह रही हैं।

को ठीक से याद नहीं कि वो यूपी की हैं या एमपी की, लेकिन हैं भारत की नागरिक। उनके पुरखों का पता करने पर यहीं के रहने बताए गए। इनका कुल 14 आदमियों का परिवार है जिनमे ज्यादातर अभी नाबालिग हैं। रोजाना 200 से 250 रुपये की आमदनी हो जाती है। लोहे को पीटने के उनके काम मे उनकी बहू रश्मि भी हाथ बटा देती है। पति भी मजदूरी कर कुछ कमा लाता है। गुजारा कैसे चलता है? इसके जवाब में शुशीला दार्शनिक बन जाती हैं। कहती हैं, 'साहब भगवान भूखा उठाता जरूर है पर भूखा सुलाता नहीं है।' अंत मे वो कहती हैं कि बिना किसी भरोसे के जी रहे हैं।

यहीं की आरती

कुछ आगे चलकर नाले के किनारे 34 वर्ष की आरती रहती हैं। वह 20 सालों से कानपुर में रह रही हैं। आरती का एक बेटा भी है जो 7 माह का है। गमों से दो चार हो रही आरती 100-50 रुपये रोजाना अपनी आमदनी बताती हैं। काम न होने की वजह से पति बालाजी मेंहदीपुर में कुछ काम करता है। आरती को कभी कुछ भेजता है तो कभी नहीं।

सिर पर हाथ रखकर आरती कहती हैं कि कभी-कभी क्या पता दो दिन दोनों टाइम खाना मिल जाये फिर अगले दो-दो, तीन-तीन दिनों तक एक टाइम का भी नसीब नहीं हो पाता। लेकिन आरती एक महिला होने के साथ-साथ मां भी है। यह सोचकर अपना पेट काटकर किसी से मांगकर भी अपने नौनिहाल बच्चे रामजी का पेट जरूर भरती हैं। आरती अपनी कहानी बताते-बताते रुआँसी हो जाती हैं।

मजदूर काजल

म थोड़ा और आगे चले हमें एक टट्टर पन्नी की अधगिरी झोपड़ी के बाहर खटिया पर अपने बच्चे को एकटक देख रही काजल मिली। काजल 26 वर्ष की है और चार बच्चों की मां हैं। काजल सड़क बनाने की मजदूरी का काम करती हैं। उनके पति राकेश रिक्शा चलाते हैं। काजल बताती हैं कि कभी कभी दो- दो महीने लगातार काम चलता रहता है और कभी तो क्या पता 6-7 महीने काम ही न मिले। उन्हें खाली बैठना पड़ता है।

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न्होंने बताया अभी उनका काम बंद चल रहा है। पति और उनके रिक्शे के सहारे जिंदगी गुजर चल रही है। इनका भी रोज का कमाना रोज का खाना चलता है। पति भी किराए का रिक्शा चलाते हैं। किराया चुकाने के बाद जो बचता है वो पेट मे जा पाता है।

काजल गोरखपुर की मूल निवासी हैं। काम- रोटी पानी की जुगाड़ में 9 साल पहले कानपुर आई थीं। तब से यहीं है। काजल चलते हुए हमसे आधार कार्ड बनवा देने की जिरह करती है। उनका अब तक आधार कार्ड नहीं बन पाया है। जो बनाने आते भी हैं तो फोटो लेकर नाम पता लिखते हैं फिर दिखाई नहीं पड़ते। वे बताती हैं चार बार नाम पता फोटो ले गए लेकिन अब तक देने नहीं आये।

ये आखिर कौन लोग हैं। क्या विदेशी हैं। विदेशी हैं तो सरकार इन्हें उनके मुल्कों को भेज दिया जाए। जहां के निवासी होंगे सरकार को अपनी पहचान बताकर विभिन्न सरकारी योजनाओं का लाभ ले सकें और अगर यहीं के हैं तो इनको उनका लाभ दीजिये। लम्बी लम्बी फ्लीटें और एक्स, वाई, जेड सिक्युरिटी से बाहर भी कई ऐसे वर्ग और तबके के लोग हैं जो सरकार या सरकारी लाभ से वंचित हैं, बदहाल हैं। ये लोग किसी भी राज्य प्रदेश के हों पर होंगे तो भारतीय ही।

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