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भारत और पाकिस्तान के लिए अपने देशद्रोही कानूनों को निरस्त करने का समय आ गया है

Janjwar Team
24 Feb 2020 10:08 AM GMT
भारत और पाकिस्तान के लिए अपने देशद्रोही कानूनों को निरस्त करने का समय आ गया है
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भारत और पाकिस्तान दोनों के कार्यकर्ता ब्रिटिश काल के राजद्रोह कानूनों को निरस्त करने की अपनी मांग के प्रति हाल के दिनों में अधिक मुखर हुए हैं। दोनों देशों में प्रमुख विपक्षी दलों के बजाय युवा नागरिक आंदोलनों का नेतृत्व कर रहे हैं...

ह भारतीय उपमहाद्वीप पर राजद्रोह का मौसम प्रतीत होता है। औपनिवेशिक युग का अवशेष राजद्रोह कानून पाकिस्तान और भारत की सरकारों के हाथों में असंतुष्ट आवाजों को कुचलने के लिए एक शक्तिशाली हथियार बन गया है। दिसंबर 2019 में पाकिस्तान की सरकार ने देशव्यापी स्टुडेंट्स सॉलिडेरिटी मार्च में हिस्सा लेने पर सैकड़ों लोगों पर राजद्रोह का आरोप लगाया, जो छात्रसंघों की फिर से बहाली समेत अन्य मांगों को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे। मार्च में शामिल प्रतिभागियों में से एक आलमगीर वज़ीर को 2 दिसंबर को गिरफ्तार किया गया था और तब से वह 'सरकार को उखाड़ फेंकने की साजिश' के आरोप में जेल में बंद है।

27 जनवरी को पश्तून तहाफुज़ मूवमेंट (PTM) के नेता मंज़ूर पश्तीन को भी पेशावर में उनके निवास पर देर रात छापेमारी कर राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। एक दिन बाद पुलिस ने पश्तून की गिरफ्तारी के खिलाफ इस्लामाबाद में एक प्रदर्शन में हिस्सा लेने के लिए वामपंथी आवामी वर्कर्स पार्टी (AWP) के कई युवा कार्यकर्ताओं समेत 23 अन्य लोगों को गिरफ्तार किया।

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श्तून तहाफुज मूवमेंट एक जातीय पश्तून अधिकार आंदोलन है जो पाकिस्तान तालिबान के खिलाफ अपने युद्ध में पाकिस्तान की सेना द्वारा किए गए कथित अधिकारों के हनन के लिए जवाबदेही की मांग कर रहा है। गठन के बाद से ही यह शांतिपूर्ण अधिकार आंदोलन लगातार धमकियों और गिरफ्तारियों से निशाने पर रहा है।

वामी वर्कर्स पार्टी के कार्यकर्ताओं और पश्तून तहाफुज मूवमेंट के कई समर्थकों को रिहा कर दिया गया है, लेकिन मंजूर पश्तीन समेत अधिकांश कार्यकर्ता अभी भी जेल में बंद हैं। इन लोगों को अपनी सरकार के कार्यों की केवल आलोचना करने पर वर्षो तक सलाखों के पीछे जीवन बिताने के जोखिम का सामना करना पड़ता है। पाकिस्तान किसी भी उस व्यक्ति को चुप कराने के लिए राजद्रोह कानून का उपयोग करता है जिसे वह अपनी अथॉरिटी के लिए खतरा मानता है।

रहद के पार भारत में जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय में साल 2016 में छात्र नेता कन्हैया कुमार और उमर खालिद के खिलाफ राजद्रोह का आरोप लगाया गया था। जेएनयू लेफ्ट डिसेंट होने की वजह से प्रतिष्ठा का केंद्र रहा है। नतीजन भारत की हिंदू राष्ट्रवादी भाजपा सरकार का इस संस्था को अपने अधिनायकवादी एजेंडे के लिए एक बाधा मानती है और लगातार अपने शिक्षकों पर छात्रो पर तुच्छ मुकदमे लगाती है।

स महीने की शुरुआत में जेएनयू के एक शोधकर्ता शरजील इमाम पर राजद्रोह का आरोप लगाया गया क्योंकि वह नागरिकता संशोधन अधिनियम के खिलाफ चल रहे विरोध प्रदर्शन में हिस्सा ले रहा था। हाल के वर्षों में देशभर के व्यापार संगठनों, पर्यावरणविदों और प्रोफेसरों समेत अन्य लोगों के खिलाफ राजद्रोह कानून का इस्तेमाल किया गया है।

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न सबके बारे में विशेष रूप से उल्लेखनीय यह है कि इन निराधार आरोपों को एक कानून के माध्यम से लगाया जा रहा है जो ब्रिटिश राज द्वारा भारत में विद्रोही विरोधी उपनिवेशवादी आंदोलन के खिलाफ व्यापक रूप से इस्तेमाल किया गया था। गांधी के राष्ट्रीय मंच पर आने से पहले औपनिवेशिक भारत के सबसे प्रमुख राष्ट्रवादी नेताओं में से एक बाल गंगाधर तिलक को उनके लेखन के माध्यम से 'जनता को उकसाने' के लिए राजद्रोह कानून के तहत कई बार कोशिश की गई थी।अपने 1916 के ट्रायल में उनका बचाव युवा बैरिस्टर मोहम्मद अली जिन्ना ने किया था, जो बाद में भारत के विभाजन और पाकिस्तान राज्य के संस्थापक के प्रमुख प्रस्तावक बन गए।

1920 से 1940 के दशक तक आलोचना करने पर कई भारतीयों को राजद्रोह कानून के तहत लाने की कोशिश की गई थी जिनमें महात्मा गांधी, मौलाना मोहम्मद ए जौहर, भगत सिंह और एम एन रॉय भी शामिल थे। स्वतंत्रता से पहले राजद्रोह कानून औपनिवेशिक शासन की बेरुखी का पर्याय था क्योंकि ब्रिटिश अधिकारियों ने इस कानून का उपयोग स्थानीय लोगों को अपनी जमीन में 'विदेशी एजेंट' होने का आरोप लगाने के लिए किया था।

पमहाद्वीप में जिन स्वतंत्रता सेनानियों को राजद्रोह के आरोप में कैद किया गया था उन्होंने इसे सम्मान के रुप में लिया। जनता ने उन्हें नायकों के रुप में देखा क्योंकि तब देशभक्त होने का मतलब सत्ता में बैठे लोगों से असंतोष था। फिर भी भारत और पाकिस्तान के जन्म के समय दोनों ही राष्ट्र राज्यों ने एक जैसे कानूनों को अपने यहां अपनाया। ये वहीं औपनिवेशिक कानून थे जिनके खिलाफ स्वतंत्रता सेनानियों ने लड़ाई लड़ी थी।

ही औपनिवेशिक नीतियां आज भी दोनों देशों ने अपने यहां अपनाया हुआ है। राजद्रोह का यह कानून गुलामी के दिनों की याद दिलाता है। इन दोनों देशों की सरकारों ने जो कानून बनाए हैं उससे यह नहीं लगता कि ये देश की जनता के बनाए कानून हैं बल्कि सिर्फ उन्हें मशीन का एक पुर्जा समझा जाता है, जो चलता रहे और काम करता रहे।

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मन के इस नये दौर की सबसे उल्लेखनीय विशेषताओं में से एक 'भड़काऊ भाषण' पर जोर देना। आज न तो पाकिस्तान और न ही भारत को राजद्रोह के तहत कार्रवाही करने के लिए कुछ भी बताने की जरुरत नहीं। दूसरा प्रश्न उठाया जाता है कि इस तरह के भाषणों से राष्ट्रीय संप्रभुत्ता कमजोर होती है, लेकिन इसके लिए भी राजसत्ता को कुछ साबित नहीं करना पड़ता और तो और इन्ही भाषणों और नारों को ही राज्य के खिलाफ कुछ गहरी साजिश का 'सबूत' मान लिया जाता है।

नता के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को पूरा न करने पर असुरक्षा की यह भावना इन देशों की बढ़ती अक्षमता से उपजी है।पाकिस्तान में इमरान खान के नेतृत्व वाली सरकार ने आईएमएफ के साथ सबसे दंडनीय सौदों में से एक पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसके परिणामस्वरूप अभूतपूर्व समस्या हुई है। शिक्षा के बजट में 40 प्रतिशत की कटौती की गई है और स्वास्थ्य क्षेत्र का निजीकरण किया जा रहा है। इस बीच गेहूं की कमी ने खाद्य बाजार की स्थिति बिगाड़ दी है और मुद्रास्फीति 14 प्रतिशत तक पहुंच गई है।

भारत की अर्थव्यवस्था में भी भारी गिरावट आई है। आर्थिक विकास दर 2018 की पहली तिमाही में 8.1 प्रतिशत वार्षिक वृद्धि दर से घटकर पिछले वर्ष की तीसरी तिमाही में सिर्फ 4.5 प्रतिशत रह गई है। कृषि संकट के साथ बढ़ती बेरोजगारी ने कई गरीब परिवारों को बिना किसी विकल्प के साथ छोड़ दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'अच्छे दिन' का वादा करके बहुमत हासिल किया था। इसके अलावा जनता को उनके जीवन जीने के सभ्य मानकों से निरंतर ध्यान हटाने के लिए जनता को दुश्मन बनाकर इन शासक वर्गों की आवश्यकता को तेज कर दिया है।

ही कारण है कि पाकिस्तान के राजनीतिक स्पेक्ट्रम में अभूतपूर्व संख्या में लोगों को 'भारतीय एजेंट' होने के आरोप का सामना करना पड़ रहा है, जबकि भारत में सरकार के विरोधियों को पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी 'आईएसआई एजेंट' कहा जा रहा है। यही कारण है कि आज दोनों देशों में इतने सारे लोग दुश्मन की सेवा करने के आरोपों का सामना कर रहे हैं।

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फिर भी भारत और पाकिस्तान दोनों में इस क्षेत्र में व्याप्त अधिनायकवाद के खिलाफ प्रतिरोध बढ़ रहा है। इन तेजी से बढ़ने वाले आंदोलनों में दो विशेषताएं मुख्य रूप से हैं। पहला उनका नेतृत्व युवा नागरिकों द्वारा किया जा रहा है जो भय और घृणा फैलाने वाले उन तरीकों से लड़ रहे हैं जो सत्ताधारी कुलीनों के द्वारा सुरक्षा, रोजगार और मुक्त भाषण (फ्री स्पीच) के अपने सबसे बुनियादी अधिकारों से ध्यान हटाने के लिए इस्तेमाल किया जा रहे हैं। उदाहरण के लिए भारत में हजारों छात्र भेदभावपूर्ण सीएए के खिलाफ अभियान में शामिल हो गए हैं, जो शायद भारत में मोदी सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।

सी प्रकार पाकिस्तान में युवा नेतृत्व वाले आंदोलनों के रूप में उभरे स्टूडेंट्स सॉलिडेरिटी मार्च और पीटीएम आम कारणों से जनता को एकजुट करने में कामयाब रहे। वो भी एक ऐसे समय में जब मुख्यधारा की विपक्षी राजनीतिक पार्टियां सत्ता के खिलाफ राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था के विरोध में खड़े होने में सफल नहीं हो पायी हैं।

न आंदोलनों की दूसरी खासियत यह है कि ये संविधान को अपनी वैधता को आधार बनाते हैं। भारत में सीएए विरोधी प्रदर्शनकारी दावा कर रहे हैं कि इस तरह का भेदभावपूर्ण कानून संविधान की बुनियादी संरचना को कमजोर करता है और सांप्रदायिक बहुसंख्यकवाद के प्रति भारत के रास्ते को सुगम बनाता है। इसी प्रकार पाकिस्तान में कार्यकर्ता बोलने की आजादी को संविधान का मूल तत्व बता रहे हैं जिसके बिना लोकतंत्र निरर्थक हो जाता है।

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दोनों मामलों में राज्य ने प्रदर्शनकारियों पर राजद्रोह के आरोप लगाकर जवाब दिया है। इससे विचित्र स्थिति उत्पन्न हुई जहां राज्य का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी दस्तावेज विध्वंसक साहित्य में बदल गया है, वहीं वैधता के संकट के संकेत ने दक्षिण एशिया में सत्तावादी सरकारों को परेशान कर दिया है।

भारत और पाकिस्तान दोनों के कार्यकर्ता राजद्रोह कानूनों को निरस्त करने की अपनी मांग के प्रति हाल के दिनों में अधिक मुखर हुए हैं। वास्तव में वे उचित सवाल पूछ रहे हैं: यदि वे स्वयं शासक हैं तो कौन लोग उनके खिलाफ राजद्रोही हो रहे हैं? इस सवाल का एक ईमानदार संकल्प न केवल उप-महाद्वीप को औपनिवेशिक शासन की सबसे गहरी विरासतों से एक को दूसरे दूर करने की अनुमति देगा, बल्कि यह हमें यह पता लगाने में भी मदद करेगा कि इस क्षेत्र में देशभक्त होने का क्या मतलब है, जहां राष्ट्रवाद लगातार बड़ा होता जा रहा रहा है।

(अम्मार अली जान कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से इतिहास में पीएचडी कर रहे हैं। यह आलेख पूर्व में अलजजीरा में प्रकाशित किया जा चुका है।)

अनुवाद : निर्मलकांत

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