जनज्वार विशेष

शादी से पहले बेटियों को 'सीलबंद पैकेट' समझने वालो, समय आ गया है अपनी बेटियों को इंसान मानो

Prema Negi
25 Jan 2020 5:51 AM GMT
शादी से पहले बेटियों को सीलबंद पैकेट समझने वालो, समय आ गया है अपनी बेटियों को इंसान मानो
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मेरा ड्राइवर बोलता रहा, बदन से चिपकी जींस, होंठों पर चमकती लिपस्टिक, लड़कियों का छुट्टा घूमते रहना। पहले चिढ़ाती हैं, ललचाती हैं और फिर शिकायत करती हैं। लाजमी है कि जवानी से भरपूर लड़के हिंसक तरीक़े से पेश ही आएंगे...

सबा करीम ख़ान

पना 12 घंटे काम का दिन ख़त्म कर जैसे ही मैं घर अपनी नवजात बच्चियों के पास जाने के लिए कार में बैठी, कसूर में 8 साल की बच्ची की बलात्कार के बाद हत्या की खबर ने मेरे पुराने घाव हरे कर दिए। जैसे ही रेडियो जॉकी ने राष्ट्रीय मीडिया पर उदासीन लहज़े में ये ख़बर प्रसारित की, बरसों से मुझे घर ले जाने वाले ड्राइवर ने छूटते ही अपना फैसला सुना दिया।

"बाजी! सच सामने आना ही चाहिए। लड़की खुद इसके लिए ज़िम्मेदार थी।"

हली नज़र में तो मुझे उसके शब्द कानों को भेदने वाले लगे। मैं इस ख़्याल को स्वीकार ही नहीं कर पाई कि जिस शख़्स को मैं इतने समय से जानती हूँ और जो मेरे परिवार का हिस्सा बन चुका है वो ना केवल इस तरह का फ़ैसला सुना रहा था, बल्कि इस बात से भी हैरान था कि मैं उससे फौरन राज़ी क्यों नहीं हुयी। मैं उससे ये पूछने के लिए खुद को तैय्यार भी नहीं कर पाई कि आख़िर क्यों और कैसे वो लड़की इस घटना के लिए ज़िम्मेदार थी लेकिन वो खुद ही बोल पड़ा।

"हम "काफ़िर" संस्कृति का निर्यात करते हैं, जिसका परिणाम इन झाड़ियों और घाटियों में देखा जा सकता है।"

मैं उसकी बात सुनकर चौंक पड़ी और उसकी बात को काट भी नहीं पायी।

वो बोलता रहा-"बदन से चिपकी जींस, होंठों पर चमकती लिपस्टिक, लड़कियों का छुट्टा घूमते रहना। पहले चिढ़ाती हैं, ललचाती हैं और फिर शिकायत करती हैं। लाजमी है कि जवानी से भरपूर लड़के हिंसक तरीक़े से पेश ही आएंगे।"

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स रात अपनी बच्चियों को सुलाते हुए इस आशंका को लेकर ये भयानक डर मेरे मन में समाता चला गया कि एक दिन ये लड़के खुद उस व्यक्ति के साथ कार में सफर कर सकते हैं जो यह सोचता है कि बलात्कार की शिकार महिलाएं या लड़कियां अपने कष्टप्रद भाग्य को खुद ही न्योता देती हैं और ऐसी "तेज़-तर्रार" लड़कियों को सबक अवश्य सिखाया जाना चाहिए। एक मानवीय त्रासदी को इतनी जल्दी आत्ममुग्धता के आगोश में डाल देने पर मुझे अपराधबोध तो हुआ, लेकिन मेरी फौरी चिंता व्यक्तिगत स्तर पर थी।

"दिलनवाज़ अगर उस लड़के की जगह तुम होती तो क्या करती?"

"मैंने बिल्कुल ऐसा ही किया होता।"

"अगर उसने तुम्हारी बेटी के साथ ऐसा किया होता तो? तब तुम कैसा महसूस करती?"

" मैं उसे और अधिक कड़ी सज़ा मिलने की प्रार्थना करूंगी, इतनी कड़ी सज़ा जो ऐसे हराम (अनैतिक) के व्यवहार से मेल खाती हो। "

स शाम मेरे ड्राइवर की बकवास ने मैनेजर और एक पुराने मुलाजिम के बीच भय और विश्वास की पूरी ना की जा सकने वाली खाई पैदा कर दी। लेकिन ये कहना पड़ेगा कि अनजाने उसने मुझे जीवन का अजर-अमर सबक सिखा दिया कि पवित्रता एक झूठ है, पवित्रता के पायदान उससे भी बड़ा झूठ है और पवित्रता की दुहाई देना औरत को परदे के पीछे रखना है। पवित्रता के प्रति अंधभक्ति आधुनिक दिमाग़ की उपज नहीं है। पवित्रता के वैश्विक तर्क के प्रति हमारा जुनून दशकों से लिंग, नस्ल, जातीयता, जाति, वर्ग जैसे उपलब्ध औजारों से खुद को पोषित करता रहा है।

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लेकिन ये तो एक बड़े परिदृश्य की झलक मात्र है। इससे भी बड़ी बातें है 19वीं सदी में संदिग्ध व्यक्तियों को तलाश कर मौत के घाट उतारना, अमेरिकी नागरिक अधिकार आंदोलन की जननी रोज़ा पार्क का 1955 में एक श्वेत अमेरिकी के लिए बस की अपनी सीट खाली नहीं करना, इस्लामिक स्टेट द्वारा दुनिया भर के शैतानों का सफाया करने का वादा, महाशक्तियों द्वारा सीमाओं को बंद करने और ऊंची दीवार खड़ी करने सम्बन्धी रोज़ाना दी जाने वाली धमकियां और पड़ोसी देश में हिंदुत्व क्रांति की अग्नि दोबारा प्रज्वलित करना।

पने देश की बात करूँ तो उप-महाद्वीप के बंटवारे के समय से ही पवित्रता के स्वयंभू ठेकेदारों ने लोगों के ऊपर ऐसा पैमाना थोप दिया है, जिसके बारे में वो हमें ये विश्वास दिलाते हैं कि ये पैमाना गणितीय सटीकता के साथ बता सकता है कि पवित्रता को लेकर हमने कब और कहाँ झूठ बोला। महिलाएं, माताएं "मातृ भूमि" की प्रतीक हैं, इसलिए परंपरागत मार्ग से उनका ज़रा सा भी विचलित होना राष्ट्र को अपमानित कर सकता है। वैश्विक दक्षिणपंथ इस तरह के नारीवादी शुद्धतावाद को गढ़ता है। आदर्श महिला का चित्रण सर्वगुण संपन्न के मिथक को खड़ा कर किया जाता है: अगर आप एक महान माँ हैं, तभी आप फॉर्चून 500 श्रेणी की सीईओ हो सकती हैं।

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ब 'मी टू' आंदोलन पूरी दुनिया में उभार पर था, लेकिन पकिस्तान में किसी तरह की हलचल नहीं दिखाई दी तब मुझे अपने ड्राइवर के शब्द याद आये। क्या उस रात मुझे उसकी छुट्टी कर देनी चाहिए थी? क्या मुझे अपने पति को बताना चाहिए था? क्या मैं अपनी बेटियों को उसके साथ अकेले सफर करने की इजाज़त दूंगी? क्या अपराध घटित होने की संभावना की उपेक्षा कर मैं एक ऐसे शख़्स को प्रश्रय दे रही थी जो बलात्कारी बनने की ओर अग्रसर था? लेकिन अपने परिवार से इतर क्या हमें नारीवाद और पकिस्तान में लैंगिक पैमाने के असंतुलन के प्रति अपने नज़रिये पर पुनर्विचार करना होगा?

सा करना संभव है, हालांकि हर चीज़ के एक जैसे समाधान नहीं होते हैं। दरअसल, हम ये उम्मीद कर रहे हैं कि हमें ज़मीनी काम ना करना पड़े और मकान भी बिना गिरे खड़ा रहे। इसका मतलब क्या है? बदलाव की शुरुवात हमेशा नीचे से ऊपर की तरफ होती है; वकालत अथवा परामर्श तभी फलीभूत होता है जब इससे फायदा पाने वाले की ज़बान में ही उससे संवाद किया जाए।

विकसित देशों द्वारा तय किये गए लैंगिक मानदंडों के पीछे भाग कर हम घटना सापेक्ष व्यवहार नहीं कर पाते और इसके उलट हादसे का शिकार हुई बहुसंख्य महिलाओं को खुद से दूर कर लेते हैं। सेक्स एजुकेशन, रात के खाने के वक्त टेबल पर चलने वाली बातचीत में महिलाओं को भी शामिल करना, स्कूल के पाठ्यक्रम में बदलाव लाना, धार्मिक फ़तवे आदि ऐसे कदम है जिन्हें कन्या शिशु की मांग ख़त्म होने से पहले ही उठा लिया जाना चाहिए, ना कि बाद में।

दूसरा, पुरुषों को शैतान बता पुरुषों के विरोध में बढ़-चढ़ कर कही गयी बातें नारीवादी प्रयासों को बिगाड़ देती हैं। अक्सर धारदार रचनात्मक ताकतें नाराज़गी की बलि चढ़ जाती हैं। हमारे लगाव को लगी ठेस और अफरा-तफरी पैदा कर हमें कुछ करने को मजबूर करने वाला गुस्सा अक्सर लाभदायक या ये कहें कि ज़रूरी होता है, क्योंकि संकट की घड़ी में ही आंदोलन मजबूत होते हैं लेकिन जब नारीवादी शत्रुता अहम स्थान ले लेती है तो ये बहुत कम ही जीत में तब्दील होती है।

रिणामस्वरूप,खासकर पाकिस्तान में, यह माना जाने लगा है कि महिलाएं ही नारीवादी हो सकती हैं और वे भी ऐसी महिलाएं जिनका पुरुषों की घेराबंदी करना एकमात्र विध्वंसक एजेंडा है। इस तरह हमने मानवजाति के एक पूरे हिस्से को अलग-थलग कर गठजोड़ बनाने की क्षमता को नकार दिया है।

लत लैंगिक नज़रिये का एक दूसरा परिणाम यह हुआ है कि नारीवाद चूक गया है, ढीला पड़ गया है। जब सोशल मीडिया की स्टार कंदील बलोच की हत्या जैसी दुर्घटनाएं होती हैं तो धुँधलके के बीच जो गुस्सा पनपता है वो घटना के शिकार व्यक्ति और उसके पक्ष में खड़े लोगों को अल्पकालिक शोहरत तो देता है, लेकिन उसे मजबूती प्रदान करने वाला कोई होता नहीं है।

ब 'मी टू' आंदोलन के तहत विकासशील देशों में भी आवाज़ें उठने लगती हैं तो उन्हें फ़ालतू बता कर ख़ारिज कर दिया जाता है, कहा जाता है कि थोड़े समय के लिए शोहरत हासिल करने की ख़ातिर पुरुषों को गरियाने का पब्लिक स्टंट है। जब समलैंगिक महिलाएं मानव अधिकारों और कार्यस्थल पर समान अवसर प्रदान किये जाने की बात करती हैं तो उन्हें राह से भटक गए दरिंदे की उपाधि तक दे दी जाती है, यहाँ तक कि उन्हें सदियों से चले आ रहे हमारे खूबसूरत मूल्यों के लिए ख़तरा भी घोषित कर दिया जाता है।

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कुछ साल गुजरने के बाद अब मैं महसूस करती हूँ कि 'फ़ैमिली हॉनर' की ख़ातिर एक भाई का अपनी सगी बहन की ह्त्या करना और इस कुकृत्य को जीत के जश्न के रूप में मनाना कहीं ज़्यादा बड़े छल का लक्षण है। इसका मतलब है कि गूँजती हुई आवाज़ों वाली जिस कोठरी में हम रहते हैं उसे मनुष्यों और ख़ासकर लैंगिक पहचान रखने वाले लोगों के परस्पर मिलने-जुलने का भय रहता है।

स आश्चर्य के घटित होने की कल्पना कीजिये, जहां शिशु-जन्म और मानवता मिल कर एक नए तरह के जीवन का निर्माण कर रहे हों। कल्पना कीजिये उस जीवन की जिसमें नवजात शिशु की देख-रेख के लिए माँ-बाप दोनों को समान छुट्टियां मिले ताकि वे दोनों ही दूसरी पाली यानी घरेलू कामों को करते हुए साथ-साथ अपने पेशे को भी आगे बढ़ाते चलें। कल्पना कीजिये ऐसी सामाजिक मंडलियों की जो पत्नी के ऑफ़िस जाने और पति के घर संभालने को प्रशंसा की दृष्टि से देखते हों। कल्पना कीजिये कार्यकारी अधिकारियों के ऐसे 'बोर्ड रूम्स' की जहां लैंगिक भेद-भाव के बिना बेहतरीन सोच रखने वाले एक साथ काम करते हों और जहाँ महिलाओं को 'लैंगिक विविधता' कोटा के तहत रखने की मजबूरी ना हो।

क ऐसे समाज की कल्पना जिसमें घूमने-फिरने वाली महिलाओं और संवेदनशील पुरुषों को शक की निगाह से ना देखा जाता हो। कल्पना कीजिये आने वाले उस भुचाल की,अगर सब मिलकर हिंसा,बलात्कार और दुष्कर्म पर रोक लगा दें, अगर हम दुनिया को ऐसी रंग-बिरंगी दुनिया के रूप में देखना शुरू कर दें जहाँ लड़कों को रोने की और लड़कियों को अपने सपने पूरे करने की इजाज़त दी जा सके, सिर्फ़ इसलिए नहीं कि पुरुषों को पछाड़ कर, उनकी जगह लेकर एक दूसरी तरह की सत्ता का मकड़जाल बुना जाए।

लैंगिक गठजोड़ बनाना कितने काम का होता है, इस बात का अहसास मुझे माँ बनने के बाद हुआ। इस महत्वपूर्ण अहसास को स्वीकार करते हुए मेरे पति और मैंने तय किया कि हम अपनी बेटियों का लालन-पालन दूसरे तरीके से करेंगे। हम उन्हैं वैकल्पिक रास्ता दिखाएंगे, ऐसा रास्ता जहाँ गहरी अपवित्रता का भी स्तुति-गान होता हो।

जैसे-जैसे हमारी बेटियां एक ऐसी दुनिया का सफर तय कर रही हैं जो गुणवानों, ग़ैर-लांछित वस्तुओं को पूजता है और गन्दगी एवं शर्म की ओर इशारा करने वाले नैतिक खतरों को ख़ारिज कर देता है, हम उम्मीद करते हैं कि वे ऐसी ज़िंदगी जी पाएंगी जिसमें गहरी अपवित्रता का भी जशन मनाया जाता हो। यह जानने के लिए कि मनुष्य के रूप में उनका मोल उनके पास मौजूद सेक्स सम्बन्धी पूंजी से कहीं बढ़ कर है।

सेक्स सम्बन्धी अपनी गतिविधियों की सूची और इतिहास को छोटा रख कर साझेदारी की संभावना बढ़ेगी नहीं। उन्हैं दोस्ती का हाथ किसी ऐसे व्यक्ति की तरफ नहीं बढ़ाना चाहिए जो उन्हैं शादी से पहले "सीलबंद पैकेट" के रूप में देखना पसंद करता हो। ग़ौरतलब है कि स्थानीय कुंआरियों को आम तौर पर "सीलबंद पैकेट" के नाम से पुकारा जाता है।

रूरी है कि यौन-हिंसा के चलते वे 'व्हिसिल ब्लोवर ' बनें, ताकि ऐसी क्रांति को जन्म दे जिसे रोका ना जा सके। उन्हें सेनेटरी नैपकिंस छुपाने को मजबूर न होना पड़े और पुरुष मित्रों के बीच बातचीत में अपने मासिक धर्म की बात छुपानी ना पड़े। सेक्स के बारे में बातचीत की मनाही से पवित्रता हासिल नहीं होगी, यह जॉन ऑफ़ आर्क की तरह ज़्यादा गतिशील, ज़्यादा ज्वलंत होने की ओर इशारा करती है। जब तक वे अपना विमर्श खुद नहीं गढ़ेंगी, कोई उनकी मदद के लिए नहीं आएगा। और यह कि गहरी अपवित्रता में समायी क्षमता ही संभावित उद्धार कर सकती है।

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मारे बच्चे पहले से कहीं ज़्यादा पेंचीदा दुनिया में रह रहे हैं। जैसे-जैसे दुनिया के हर हिस्से में पवित्रता को लेकर जड़ता बढ़ रही है, बहुत सी महिलाओं को बलात्कार और घरेलू हिंसा के ज़्यादा बड़े जोखिम का सामना करना पड़ रहा है, ये जोखिम मलेरिया, कैंसर, युद्ध और ट्रैफिक दुर्घटनाओं के मिलेजुले जोख़िम से कहीं ज़्यादा बड़ा है।

न अचंभित करने वाले तथ्यों के खुलासे के बाद एक्स और वाई क्रोमोज़ोम, गुलाबी और नीले रंगों, वंडर वीमेन और सुपर मैन जैसी शब्दावलियों के इस्तेमाल को बंद करने का समय आ गया है। जो सत्ता के पदों पर बैठ कर सुविधाएँ उठा रहे हैं वे मानवीयता और लैंगिक एकजुटता से खौफ खाते हैं।

जितनी जल्दी हम इस लैंगिक युद्ध को मिल कर काम करने के आमंत्रण में बदल दें, एक ऐसे सम्मिलन में जो अतिवादी दयालुता, सहानुभूति और गठजोड़ आधारित हो, तो इस बात की ज़्यादा संभावना है कि पुरुष और महिलाएं मिल कर आगे बढेंगी, मनुष्यता एक साथ मिलकर फुटपाथ पर नृत्य करेगी और घंटियों की झंकार आ रहे बदलाव की सूचना देंगी। इस तरह ये सब क्रियाएं खुद अकेले या मिलजुल कर इशारा करेंगी कि निर्णय लेने का समय आ गया है। निस्संदेह पवित्रता और इसके प्रति हमारी जड़ता एक झूठ है।

(यह लेख महिला लेखन के लिए दिए जाने वाले ज़ीनत हारुन राशिद पुरस्कार के लिए लम्बे समय से सूचीबद्ध था। सबा करीम ख़ान पाकिस्तानी मूल की हैं और यूएई स्थित न्यू यॉर्क यूनिवर्सिटी के ग्लोबल कैंपस में कार्यरत हैं।)

(पाकिस्तानी अखबार डॉन में प्रकाशित सबा करीम ख़ान की इस खबर का अनुवाद जनज्वार के लिए पीयूष पंत ने किया है।)

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