समाज

झारखंड में हिंदूवादियों ने मार डाला मृत बैल का मांस निकाल रहे आदिवासी को

Prema Negi
23 April 2019 5:56 AM GMT
झारखंड में हिंदूवादियों ने मार डाला मृत बैल का मांस निकाल रहे आदिवासी को
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पहाड़ से फिसलकर गिरे मृत बैल का मांस निकाल रहे आदिवासियों पर हिंदूवादियों ने किया हमला, एक आदिवासी को मार डाला जान से, जबकि तीन बुरी तरह जख्मी हैं। साथ में खड़े 15-20 बच्चे हिंदूवादियों के हाथों इसलिए बच गए क्योंकि वे भागने में रहे सफल...

रांची से विशद कुमार की रिपोर्ट

जनज्वार। रांची से सौ किलोमीटर दूर, गुमला जिले के डुमरी ब्लॉक के जुरमु गांव और जैरागी गांव के बीच बह रही सेन नदी के ऊपर का मैदान। 10 अप्रैल, शाम के 8 बजे। जुरमु गांव के आदिवासी प्रकाश लकड़ा 50 वर्ष, पीटर केरकेट्टा 50 वर्ष, बेलारियुस मिंज 60 वर्ष और जेनारियुस मिंज 60 वर्ष सहित 15—20 बच्चे और सामने पड़ा है गांव के ही पंच जखारियुस कुजुर का मरा हुआ बूढ़ा बैल, जो दोपहर को चट्टान से फिसलकर गिर गया था।

बैल के चारों ओर बच्चों की भीड़ के बीच चारों वयस्क आदिवासी मरे बैल का मांस और चमड़ा निकालने में व्यस्त थे। तभी 'मारो, मारो' की समवेत आवाज के साथ अपने काम में व्यस्त आदिवासियों पर हमला, 'मारो, मारो' की आवाज सुनते ही जहां चारों लोग भौचक थे, वहीं बच्चे भागने में सफल रहे। सबको लगा नक्सलियों ने हमला बोला है। बच्चों ने गांव को यही संदेश दिया और गांव के लोग अपने अपने घरों में दुबक गए। मगर वे चार जिन पर हमला हुआ, उन्हें 'जै श्रीराम, जै हनुमान' के नारों ने बता दिया कि हमलावर हिंदुवादी संगठन के लोग हैं। अचानक हुए इस हमले में प्रकाश लकड़ा मारा गया, जबकि पीटर केरकेट्टा, बेलारियुस मिंज और जेनारियुस मिंज बुरी तरह घायल हो गए।

इस घटना को स्थानीय मीडिया ने बहुत हल्के ढंग से लिया, शायद प्रशासनिक दबाव कारण रहा हो। मगर झारखंड जनाधिकार महासभा की फैक्ट फाइंडिंग टीम जब मामलों की असलियत जानने गुमला के जुरमु गांव गई, तब घटना की जो तस्वीर सामने आई, वह राजनीतिक संरक्षण में पल रहे हिंदुवाद के नाम पर अपराधियों और प्रशासनिक गंठजोड़ के नापाक मंसूबे को स्पष्ट करती है। कहीं न कहीं यह घटना आदिवासियों में भय पैदा करके उन्हें अपनी जमीन से बेदखल करने की एक साजिश है, हिन्दुवादी मनसिकता को उभारकर आदिवासियों के खिलाफ गैर—आदिवासियों की गोलबंदी का एक हिस्सा है।

मामले पर हिंदुवादी आतंक का उभार और प्रशासनिक संवेदनहीनता को हम घायल पीटर केरकेट्टा और जनारियुस मिंज, जो रांची के एक प्राइवेट अस्पताल देबुका नर्सिंग होम लालपुर में भर्ती हैं, द्वारा घटना पर आपबीती से समझ सकते हैं। उनके अनुसार, घटना के दिन समय करीब 7.30 बजे शाम का था। दोपहर में गांव के पंच जखारियुस कुजुर का बूढ़ा बैल पानी पीने के क्रम में चट्टान से फिसल कर गिर गया था और वहीं उसकी मृत्यु हो गयी थी, जिसका मांस हमलोग काट रहे थे और साथ में करीब 15—20 बच्चे भी वहां मौजूद थे।

उस दिन जैरागी बाजार का दिन भी था। संभव है बाजार से लौटने वालों में से जैरागी साहू टोली के किसी ने हमें मांस काटते हुए देखा होगा। फिर 8 बजे रात के लगभग बड़ी संख्या में धारदार हथियारों से लैश लोग अचानक आ धमके और 'मारो-मारो' कहते हुए हमें मारने लगे। वे हम चारों को लात घूसों से ताबड़-तोड़ मारने लगे। अंधेरे के कारण पहले तो हम लोग समझ ही नहीं पा रहे थे कि हमला करने वाले कौन लोग हैं। हमें लगा कि नक्सली होंगे, लेकिन हमला करने वाले जोर-जोर से 'जय श्री राम! जय हनुमान' का नारा लगा रहे थे। तब जाकर हम लोग समझ गए कि हमलावर नक्सली नहीं हिंदूवादी संगठन के लोग हैं।

इस बीच जो बच्चे थे, छुपकर भाग निकले थे। हमलावर हमें मारते-पीटते जैरागी चौक पर लाए। भाग गए बच्चों ने भी यही समझा कि हमलावर नक्सली हैं, अत: उनके माध्यम से जुरमु गांव के लोगों को घटना की जानकारी रात में ही पता चल गया था, लेकिन हमलावर नक्सली संगठन के लोग हैं, यह जानकर डर से कोई भी अपने घर से नहीं निकला।

पीड़ित कहते हैं, हमलावर हम लोगों को भी 'जय श्री राम! जय हनुमान' का नारा लगाने को बोल रहे थे। हम लोगों ने जब नहीं बोला तो वे और जोर-जोर से मारने लगे थे। वे हमें जैरागी चौक पर भी मारते पीटते रहे। 50 वर्षीय प्रकाश लकड़ा तो शायद शुरू से ही उनके टारगेट में थे कि उसे मार डालना है। पता नहीं उसके प्रति मारने वालों में क्या गुस्सा था, यही वजह थी कि उसको हमलावरों ने काफी मारा था। हम सभी लोगों को मार की वजह से बीच-बीच में बेहोशी आ जा रही थी। मारपीट करने वालों में ज्यादातर 25 से 35 वर्ष आयुवर्ग के लोग थे।

सभी हमलावर तलवार, फरसा, लाठी, डंडे एवं अन्य घातक हथियार से लैश थे। हम ईश्वर का शुक्र अदा करते हैं कि हमलावर घातक हथियार से किसी के ऊपर वार नहीं किया था। हां जनारियुस मिंज के ऊपर एक बार उन्होंने हथियार से हमला किया था, जिसे उन्होंने हाथ से रोक लिया था। इसी क्रम में उनके हाथ में भी गंभीर चोट लगी हैं।

मॉब लिंचिंग मामले की छानबीन करने पहुंची फैक्ट फाइंडिंग टीम

घायलों के मुताबिक, फिर भीड़ ने हमें जैरागी चौक पर रात में खड़ी रहने वाली लक्ष्मी रथ नामक बस में चढ़ाया। रात के करीब 12 बजे डुमरी थाना से सटे बाजार शेड में हमें पुलिस प्रशासन की मौजूदगी में उतार दिया गया। हम सभी चारों घायल लगभग 4 घंटों तक वहीं यात्री शेड में असहाय पड़े रहे। हम लोगों के साथ एक चौकीदार को ड्यूटी में लगा दिया गया था। उसको हमने आग्रह किया कि आप तो आदिवासी ही हैं, हमारा मदद कीजिये। उसी ने कहीं से एक दो कम्बल लाकर दिया और आग जलायी।

हमलोग ठण्ड में आग के किनारे ही सोये थे। रात के करीब 2 बजे तक प्रकाश की सांसे चल रही थीं और वे दर्द के कारण कराह रहे थे। करीब 4.00 बजे हम लोगों ने उसे छूकर देखा तो उसका शारीर ठण्डा पड़ गया था। सुबह 6.00 बजे के करीब पुलिस की गाड़ी से हमें अस्पताल पहुँचाया गया, जहां हालत की गंभीरता को देखते हुए बेहतर इलाज के लिए सदर अस्पताल गुमला रेफर कर दिया गया।

गौरतलब है कि जब घायलों को जैरागी चौक पर रखा गया था, उसी बीच हमलावरों में से दो लोग मोटर साईकिल से थाने में यह सूचना देने गए थे कि गौकशी के मामले में 4 लोगों को पकड़ कर रखा गया है आप लोग उन्हें ले आइए। इस पर थाना में तैनात पुलिसकर्मियों ने कहा था, आप ही लोग ले आइए। डुमरी थाने में जब पुलिस की मौजूदगी में घायलों को उतारा गया, वहाँ भी पुलिस वालों ने घायलों से कहा था कि आप लोगों को सुबह अस्पताल ले जाया जायेगा, अभी अस्पताल बंद है। सुबह भी जब घायलों को अस्पताल ले जाया गया तो उस समय भी प्रकाश लकड़ा को नहीं ले जाया गया था उसे बाजार शेड में ही छोड़ दिया गया था। इसके बाद घायलों को नहीं पता कि गांव में क्या कुछ हुआ।

मजे की बात तो यह है कि पुलिस ने पीड़ितों और गांव के 20-25 अज्ञात व्यक्तियों के विरुद्ध गौहत्या के आरोप में प्राथमिकी दर्ज कर दी है। दूसरी तरफ पीड़ितों द्वारा नामित सात अपराधियों में से केवल दो को ही 15 अप्रैल तक गिरफ्तार किया गया है। पुलिस मामले में थाना चौकीदार पर दबाव बनाकर उसकी गवाही के आधार पर प्राथमिकी दर्ज की है, जिसे 11 अप्रैल की सुबह घटनास्थल पर भेजा गया था।

गौरतलब है कि आदिवासियों पर हमला करने वाली 40 लोगों की भीड़ का नेतृत्व संदीप साहू, संतोष साहू, संजय साहू और उनके बेटे कर रहे थे। माना जा रहा है कि ये चारों स्थानीय स्तर पर बजरंग दल में सक्रिय हैं।

फैक्ट फाइंडिंग टीम के हिस्सा रहे सामाजिक कार्यकर्ता अफजल बताते हैं, 'लिंचिंग के लिए जिम्मेदार हमलावर किसी हिंदूवादी संगठन के पदाधिकारी हैं यह पता नहीं चल पाया। हमलोग हमलावरों के गांव गए थे पर पूरे गांव के लोग भागे हुए थे, क्योंकि पुलिस दबीश दे रही है। पर इतना साफ है कि बगैर कट्टरपंथी बहकावे के कोई ऐसा कैसे कर सकता है, खासकर तब जबकि मामला एकदम से जाने-पहचाने लोगों के बीच का हो।'

मामले पर आदिवासी नेता रतन तिर्की कहते हैं, 'आदिवासी समुदाय के लोग सूअर व गाय के मांस में कोई फर्क नहीं समझते। वे इस बात को भी स्वीकार नहीं करते कि मांस में फर्क होता है। वे चूहा, नेवला और सांप में भी कोई फर्क नहीं करते हैं, वे उनका भी मांस को खाने में कोई गुरेज नहीं करते। जंगल में पाए जाने वाले और कई जीव हैं जो उनका निवाला है। ऐसे में यह हमला झारखंड में आदिवासी व गैर आदिवासी के बीच टकराव की जमीन तैयार करने की साजिश है।'

झारखंड जनाधिकार महासभा के कार्यकर्ता कहते हैं कि झारखंड में मॉब लिंचिंग की घटनाओं में पिछले पांच वर्षों में कम-से-कम 11 व्यक्तियों (नौ मुसलमान और दो आदिवासी) की गाय के संरक्षण या अन्य सांप्रदायिक मुद्दों के नाम पर हत्या कर दी गयी है और आठ को पीटा गया। अधिकांश मामलों में स्थानीय प्रशासन और पुलिस की भूमिका पर कई सवाल रहे है। यह हिंसा लोगों के अपनी पसंद का भोजन खाने के अधिकार पर हमला है, जो जीने के अधिकार का हनन है। झारखंड जहां व्यापक स्तर पर भूख और कुपोषण का शिकार है, में गौमांस लोगों के लिए प्रोटीन का सबसे सस्ता स्रोत हैं।

मॉब लिंचिंग के शिकार हुए पीटर केरकट्टा की पत्नी

झारखंड जनाधिकार महासभा ने मांग की है कि सरकार तुरंत जुरमु के आदिवासियों के खिलाफ दर्ज गौहत्या की फर्ज़ी प्राथमिकी को निरस्त करे, भीड़ द्वारा की गयी हिंसा में शामिल सभी अपराधियों को गिरफ्तार करें एवं उन पर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम अतर्गत प्राथमिकी दर्ज की जाए। स्थानीय पुलिस के खिलाफ पीड़ितों के लिए चिकित्सा उपचार में देरी और गोहत्या का झूठा मुकदमा दायर करने के लिए कार्रवाई करें।

मृतक के परिवार को 15 लाख रुपये और घायल पीड़ितों को 10 लाख रुपये का अंतरिम मुआवज़ा दे, मॉब लिंचिंग पर सुप्रीम कोर्ट के हाल के फैसले का पूर्ण अनुपालन करें, गोवंशीय पशु हत्या प्रतिषेध अधिनियम, 2005 को निरस्त करें क्योंकि यह लोगों की आजीविका पर और उनकी पसंद का भोजन खाने के अधिकार पर सीधा हमला है और सरकार लोगों की पसंद के भोजन करने के अधिकार का संरक्षण करें। दूसरी तरफ महासभा विपक्षी महागठबंधन, जो इस घटना पर मौन है, उनसे भी मांग करता है कि वे इस घटना पर अपनी चुप्पी तोड़ें और आदिवासियों के साथ खड़े हो।

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