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राजनीति

मुख्य न्यायाधीश यौन उत्पीड़न के आरोपों से बरी, पीड़ित महिला को थी इसी 'न्याय' की उम्मीद

Prema Negi
6 May 2019 2:59 PM GMT
मुख्य न्यायाधीश यौन उत्पीड़न के आरोपों से बरी, पीड़ित महिला को थी इसी न्याय की उम्मीद
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चीफ जस्टिस के खिलाफ यौन उत्पीड़न मामले में प्रशांत भूषण,दुष्यंत दवे, जयसिंह, वृंदा ग्रोवर, कामिनी जायसवाल, शांति भूषण के विरुद्ध षड्यंत्र के आरोप में जनहित याचिका दाखिल

जनज्वार। जैसी की उम्मीद जताई जा रही थी, उच्चतम न्यायालय के तीन जजों के इन हाउस पैनल (आंतरिक जांच समिति) ने चीफ जस्टिस के खिलाफ लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोपों में उन्हें क्लीनचिट दे दी है। पैनल का कहना है कि उसे आरोपों में कोई ठोस आधार नहीं मिला। हालांकि इन हाउस पैनल रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं करेगा।

दूसरी तरफ चीफ जस्टिस पर लगे यौन उत्पीड़न के मामले में इंडियन एक्सप्रेस ने आज एक बार फिर लिखा है कि जस्टिस चंद्रचूड़ ने मामले की जांच को लेकर उठाए जा रहे सवालों पर बहस के लिए ‘फुल कोर्ट’ बुलाने की मांग की थी। अखबार के मुताबिक जस्टिस चंद्रचूड़ ने ये मांग जांच पैनल को बीते दो मई को लिखे गए पत्र में उठाई थी।

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक ये पत्र जरूर जस्टिस चंद्रचूड़ के नाम से लिखा गया है, लेकिन ये केवल उनके निजी विचार नहीं थे। इसमें सुप्रीम कोर्ट के 17 जजों की अनाधिकारिक सहमति थी। सुप्रीम कोर्ट में इस समय चीफ जस्टिस को मिलाकर कुल 22 जज हैं। इसका अर्थ है कि पत्र को लिखने से पहले अधिकतम जजों से सलाह-मशविरा किया गया था।

इस बीच एम.एल. शर्मा द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के लिए उच्चतम न्यायालय सहमत हो गया है, जिसमें प्रशांत भूषण, कामिनी जायसवाल, इंदिरा जयसिंह, वृंदा ग्रोवर, शांति भूषण, नीना गुप्ता भसीन और दुष्यंत दवे और अन्य के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के लिए सीबीआई से एसआईटी जांच और निर्देश की मांग की गई है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि इन लोगों ने चीफ जस्टिस को बदनाम करने की साजिश रची।

उच्चतम न्यायालय के तीन जजों की आंतरिक जांच समिति ने चीफ जस्टिस के खिलाफ यौन उत्पीड़न की शिकायत को खारिज कर दिया है। जस्टिस एसए बोबडे इस पैनल के अध्यक्ष हैं, जबकि जस्टिस इंदु मल्होत्रा और जस्टिस इंदिरा बनर्जी अन्य दो अन्य सदस्य हैं। समिति को चीफ जस्टिस रंजन गोगोई के खिलाफ यौन उत्पीड़न के आरोपों में कोई ठोस आधार नहीं मिला।

उच्चतम न्यायालय के सेक्रटरी जनरल की ओर से सोमवार 6 मई को जारी बयान के अनुसार आंतरिक समिति ने अपनी रिपोर्ट 5 मई 2019 को सौंपी। आंतरिक प्रक्रिया के अनुसार अगले वरिष्ठ जज को रिपोर्ट दी गई और इसकी एक कॉपी संबंधित जज चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया को भी भेजी गई।

इन हाउस पैनल की जांच के तथ्यों को उच्चतम न्यायालय के 2003 के नियमों के तहत सार्वजनिक नहीं किया जाएगा। उन्होंने इंदिरा जयसिंह बनाम सुप्रीम कोर्ट मामले का हवाला देते हुए कहा कि नियमों के मुताबिक इन-हाउस पैनल की रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया जाएगा। रिपोर्ट में कहा गया है कि आंतरिक जांच समिति को उच्चतम न्यायालय के एक पूर्व कर्मचारी द्वारा 19 अप्रैल 2019 को की गई शिकायत में लगाए गए आरोपों में कोई भी आधार नहीं मिला।

इससे पहले उच्चतम न्यायालय ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर जस्टिस चंद्रचूड़ के जांच पैनल से मिलने या किसी पत्र के बारे में चल रही मीडिया खबरों को खारिज कर दिया था।लेकिन इंडियन एक्सप्रेस और टाइम्स ऑफ इंडिया ने आज एक बार फिर जस्टिस चंद्रचूड़ द्वारा जांच पैनल को पत्र लिखने की बात की पुष्टि की है।

इन खबरों के मुताबिक, जस्टिस चंद्रचूड़ ने जस्टिस बोबड़े से मिलकर अपनी चिंताएं जाहिर की थीं। जस्टिस चंद्रचूड़ ने अपने पत्र में जांच समिति में एक बाहरी सदस्य को शामिल करने की सलाह भी दी थी। इसके लिए उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की तीन रिटायर्ड महिला जजों के नाम भी सुझाए थे। जस्टिस चंद्रचूड़ ने जिन महिला जजों के नाम सुझाए थे, उनमें जस्टिस रूमा पॉल, सुजाता मनोहर और जस्टिस रंजना देसाई के नाम शामिल हैं।

इनको लेकर जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा था कि ये अराजनीतिक और बोर्ड से अलग हैं। उच्चतम न्यायालय ने अपनी प्रेस विज्ञप्ति में कहा था कि ये बहुत अफसोसजनक है कि एक प्रमुख अखबार ने पूरी तरह से गलत खबर छापी, जिसमें जस्टिस चंद्रचूड़ और जस्टिस नरीमन के बारे में लिखा गया कि इन्होंने तीन मई 2019 की शाम को जस्टिस एसए बोबड़े से मुलाकात की. इस मुद्दे पर काम करने के लिए गठित आंतरिक जांच कमिटी किसी तरह के बाहरी प्रभाव से मुक्त होकर काम कर रही है।

एक मई को चीफ जस्टिस रंजन गोगोई उच्चतम न्यायालय की एक पूर्व महिला कर्मी द्वारा उन पर लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोपों की जांच कर रही तीन सदस्यीय आतंरिक जांच समिति के सामने पेश हुए थे। आतंरिक जांच समिति ने चीफ जस्टिस को एक अनुरोध पत्र जारी कर उन्हें समिति के सामने आने को कहा था। उस अनुरोध पर वह इस मामले में समिति के सामने पेश हुए।

गौरतलब है कि चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया रंजन गोगोई पर यौन उत्पीड़न की आरोप लगाने वाली सुप्रीम कोर्ट की पूर्व महिला कर्मचारी ने तीन न्यायाधीशों के इन-हाउस पैनल द्वारा की जा रही जांच में शामिल होने से इनकार कर दिया था। महिला का कहना था कि वहां से उसे न्याय मिलने की कोई संभावना नहीं थी। महिला ने यह इनकार जस्टिस एसए बोबडे के नेतृत्व में सोमवार को पैनल की तीसरी इन-चैंबर बैठक के बाद कियाथा।

महिला ने कहा कि अब तक हुई तीन सुनवाई में उसे डर लगा क्योंकि वहां उसे अकेले उपस्थित होना था। उसके वकील को भी कार्यवाही का हिस्सा नहीं बनने दिया गया। शिकायतकर्ता की वापसी के बाद, अदालत की समिति ने अपनी जांच समाप्त करने का निर्णय लिया था। सोमवार को इन हाउस पैनल ने अपनी रिपोर्ट सौंपे दी है।

उच्चतम न्यायालय की एक महिला कर्मचारी ने सीजेआई पर यौन उत्पीडन के आरोप लगाए थे। आरोप था कि महिला कर्मचारी ने 19 अप्रैल को लगाए आरोप में कहा था कि चीफ जस्टिस ने पहले उसका यौन उत्पीड़न किया, फिर उसे नौकरी से बर्खास्त करवा दिया। 22 जजों को भेजे गए शपथपत्र में महिला ने कहा है कि रंजन गोगोई ने पिछले साल 10 और 11 अक्टूबर को अपने घर पर उसके साथ यौन दुर्व्यवहार किया। हालांकि मामला जब तुल पकड़ने लगा तो महिला ने कहा कि मैं जानती हूं चीफ जस्टिस खुद को इस मामले में बाइज्जत साबित करा पाएंगे।

प्राथमिकी दर्ज करने के निर्देश की याचिका

इस बीच उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को कहा कि चीफ जस्टिस रंजन गोगोई को यौन उत्पीड़न के मनगढ़ंत और फर्जी मामले में फंसाने का प्रयास करने वाले कथित षड्यंत्र के मामले में सीबीआई को प्राथमिकी दर्ज करने के निर्देश देने की मांग वाली याचिका पर उचित समय पर सुनवाई होगी। मामला तुरंत सूचीबद्ध करने के लिए जस्टिस एस.ए.बोबड़े और जस्टिस एस. अब्दुल नजीर की पीठ के समक्ष रखा गया था।

इस पर पीठ ने याचिकाकर्ता वकील एमएल शर्मा से सवाल किया, ‘इतनी जल्दीबाजी क्या है? आपने मामला दायर कर दिया है, वह सुनवाई के लिए आएगा। उसे उचित समय पर सूचीबद्ध किया जाएगा। शर्मा ने शुरुआत में उच्चतम न्यायालय से कहा कि उनकी अर्जी पर आठ मई को सुनवाई की जाए। याचिका में आरोप लगाया गया है कि कि यौन उत्पीड़न की शिकायत चीफ जस्टिस को फ्रेम करने के लिए भूषण और अन्य लोगों द्वारा तैयार की गई है।

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