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जज साहब क्या आप नहीं जानते हिन्दू राष्ट्र का आदेश भारत के संविधान का है सरासर उल्लंघन

Prema Negi
19 Dec 2018 10:36 AM GMT
जज साहब क्या आप नहीं जानते हिन्दू राष्ट्र का आदेश भारत के संविधान का है सरासर उल्लंघन
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जस्टिस सेन के सामने हमेशा ही ये रास्ता खुला है कि वो अपने पद से इस्तीफ़ा दें और उसके बाद भारत के हिंदू राष्ट्र होने का समर्थन करें...

वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट

देश संविधान से चलता है और कानून के शासन की अवधारणा है, पर आये दिन साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण से चुनाव की राजनीति करने वाले धर्मनिरपेक्ष संविधान की धज्जियां उडा देते हैं और उन पर कोई कार्रवाई राजनीतिक कारणों से नहीं होती।

इसी तरह देश की न्यायपालिका राजनीतिक विवादों और लामबंदियों से बिल्कुल अलग रही है, लेकिन कई मौक़ों पर कुछ ऐसे जज भी सामने आ जाते हैं जो निर्णय की आड़ में अपने मन के भीतर बैठे साम्प्रदायिक जहर को बाहर उड़ेल देते हैं या ऐसे फैसले या बयान दे देते हैं, जो भारी विवाद का कारण बन जाते हैं।

ऐसा ही मामला मेघालय हाईकोर्ट के जज जस्टिस सुदीप रंजन सेन का है,जिन्होंने 10 दिसंबर 18 को नागरिकता सर्टिफिकेट जारी करने से जुड़े एक मामले की सुनवाई के बाद पारित आदेश में उन्होंने लिखा था कि भारत को हिंदू राष्ट्र होना चाहिए था।

फैसले में जस्टिस सेन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अनुरोध किया था कि वह भारत में कहीं से भी आकर बसे हिंदू, सिख, जैन, बौद्ध, पारसी, इसाई, खासी, जयंतिया और गारो समुदाय के लोगों को भारतीय नागरिक घोषित करें। उन्होंने कहा, 'मैं स्पष्ट करना चाहता हूं कि कोई भारत को इस्लामिक देश बनाने की कोशिश न करे। अगर यह इस्लामिक देश हो गया तो भारत और दुनिया में कयामत आ जाएगी।

जस्टिस सेन ने अपने आदेश में लिखा था कि आज़ादी के बाद भारत और पाकिस्तान का बंटवारा धर्म के आधार पर हुआ था। पाकिस्तान ने स्वयं को इस्लामिक देश घोषित किया और इसी तरह भारत को भी हिंदू राष्ट्र घोषित किया जाना चाहिए था, लेकिन ये एक धर्मनिरपेक्ष देश बना रहा।

इस पर जब बवाल मचा तो जस्टिस सेन ने सफाई दी कि भारत का संविधान धर्म निरपेक्षता की बात करता है और देश का बंटवारा धर्म, जाति, नस्ल, समुदाय या भाषा के आधार पर नहीं होना चाहिए। जस्टिस सेन ने 14 दिसम्बर को अपने आदेश से जुड़ी सफाई जारी की, जिसमें उन्होंने लिखा कि धर्मनिरपेक्षता भारतीय संविधान के मूल स्तंभों में है और मेरे आदेश को किसी राजनीतिक पार्टी से जुड़ा या उसके संदर्भ में नहीं समझा जाना चाहिए।

संविधान का खुला उल्लंघन

जस्टिस सेन की अपनी सफाई के बावजूद उनका आदेश भारतीय संविधान का खुला उल्लंघन है। संविधान की प्रस्तावना में ही ये घोषणा की गई है कि भारत एक धर्म निरपेक्ष राष्ट्र है। जस्टिस सेन के सामने हमेशा ही ये रास्ता खुला है कि वो अपने पद से इस्तीफ़ा दें और उसके बाद भारत के हिंदू राष्ट्र होने का समर्थन करें।

जब उन्होंने न्यायाधीश के रूप में पद और गोपनीयता की शपथ ली थी तो यह स्वीकार किया था कि वे संविधान का पालन करेंगे। ऐसी स्थिति में न्यायाधीश के रूप में वे इस तरह की बात नहीं कर सकते। जज की परिभाषा के आधार पर देखा जय तो अगर एक जज हिंदू राष्ट्र का हिमायती हैं तो वो पक्षपात कर रहा है।

यह मानना अव्यवाहारिक होगा कि जजों के निजी पूर्वाग्रह और झुकाव उनके फैसलों को प्रभावित नहीं करते होंगे। इसके अलावा सभी जज दबाव और प्रभाव से मुक्त नहीं होते। उसी समाज में रहते हुए और उसी सामाजिक माहौल का हिस्सा होते हुए उनसे ये उम्मीद नहीं की जा सकती है कि उन पर इसका कोई असर नहीं होगा।

वास्तव में यदि कोई न्यायाधीश किसी महत्वपूर्ण विषय पर अपनी अंतरात्मा की आवाज़ को अनसुना नहीं कर पा रहा है और उसे लगता है कि उसे इस विषय में बोनला चाहिए तो उसे न्यायाधीश के तौर पर उस बात को नहीं कहना चाहिए, क्योंकि संविधान के अनुरूप देश का शासन चलता है आपकी मर्जी के अनुरूप नहीं।

इस तरह की बातों से न केवल न्यायपालिका की छवि धूमिल होती है, बल्कि न्यायाधीशों की नियुक्ति की कालेजियम प्रणाली पर भी सवाल उठते हैं। ऐसे में जस्टिस सेन को शालीनता से पद छोड़ देना चाहिए क्योंकि जो कुछ उन्होंने अपने फैसले में कहा है वह संविधान की अवमानना है। जस्टिस सेन ने 14 दिसंबर को अपने बचाव में जो बातें कहीं, उनका भी कोई मतलब नहीं है। हिंदू राष्ट्र की वकालत करने का मतलब यह कहना है कि संविधान ग़लत है।

गाय राष्ट्रीय पशु, मोर ब्रह्मचारी

इसी तरह राजस्थान हाईकोर्ट के जस्टिस महेश चंद्र शर्मा ने अपनी रिटायरमेंट के दिन अपने एक फैसले में गाय को राष्ट्रीय पशु बनाने की सिफारिश कर दी। उन्होंने राज्य सरकार से इसके लिए क़दम उठाने को कहा। जस्टिस महेश चंद्र शर्मा ने 'गोहत्या के लिए आजीवन कारावास का प्रावधान' किए जाने की भी सिफ़ारिश की। इस फ़ैसले के ही दिन वो रिटायर भी हो गए। इसके अलावा उन्होंने मोर के ब्रह्मचारी होने का विवादित बयान भी दिया है।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात नहीं आती

इसी तरह जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार के मामले में जमानत देते हुए दिल्ली हाई कोर्ट की जज प्रतिभा रानी ने कहा था कि कुछ जेएनयू छात्रों के द्वारा आयोजित किए गए कार्यक्रम में कथित तौर पर की गई नारेबाज़ी जिस तरह की विचारधारा दिखती है, उसके बाद उनकी सुरक्षा के मामले में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार की बात नहीं आती है।

जस्टिस प्रतिभा रानी ने कहा कि मुझे लगता है कि यह एक तरह का संक्रमण है जिससे ये छात्र संक्रमित हो गए हैं, और इससे पहले कि यह महामारी का रूप ले, इसे क़ाबू करने या ठीक करने की ज़रूरत है। जब भी किसी तरह का संक्रमण अंग में फैलता है, उसे ठीक करने के लिए खाने के लिए एंटीबायोटिक दिए जाते हैं। लेकिन जब यह काम नहीं करता तो दूसरे चरण का इलाज किया जाता है। कभी-कभी सर्जरी की भी ज़रूरत होती है और जब संक्रमण से अंग में सड़न होने का ख़तरा पैदा हो जाए तो उस अंग को काटकर अलग कर देना ही इलाज होता है।

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