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आंदोलन

महाराष्ट्र के आदिवासियों का ऐलान, न देंगे जान न जमीन

Janjwar Team
11 Dec 2017 11:50 PM GMT
महाराष्ट्र के आदिवासियों का ऐलान, न देंगे जान न जमीन
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गढ़चिरौली के आदिवासी क्षेत्र की जनता ने किया खनन के खिलाफ भूमकाल का ऐलान, कहा किसी भी एमओयू में नहीं ली गयी आदिवासियों और स्थानीय नागरिकों की कोई सहमति, सरकार से कहा संवैधानिक नियमों का मत उड़ाओ मखौल, हजारों की संख्या में पहुंचे प्रदर्शनकारी

जनज्वार। आज 11 दिसंबर से नागपुर में शुरू हुए महाराष्ट्र विधानसभा के शीतकालीन सत्र के पहले दिन गढ़चिरौली जिले के विभिन्न क्षेत्रों में लोगों ने संगठित होकर प्रस्तावित खनन परियोजनाओं का जोरदार विरोध किया। आदिवासियों और अन्य संघर्षशील लोगों ने विपक्षी पार्टियों से आह्वान किया कि वे गढ़चिरौली के आदिवासी क्षेत्रों में किए जा रहे जनविरोधी खनन और विस्थापन के सवाल को विधानसभा में प्रमुखता से उठायें और सरकार को घेरें।

उत्तरी गढ़चिरौली के कोरची तहसील में वन अधिकार कानून के प्रभावी अमल की मुख्य मांग के साथ स्थानीय जनता ने रास्ता रोको आन्दोलन किया, वहीं दक्षिणी गढ़चिरौली के एटापल्ली में सुरजागढ़ के खनन के मुख्य मुद्दे पर एटापल्ली एवं भामरागड़ तहसील के ग्रामीणों ने अपने पारंपरिक वाद्य-नृत्य के साथ अपने सवालों को लेकर उप-विभागीय अधिकारी के कार्यालय का घेराव किया।

आंदोलकारियों का कहना है कि रोजगार और विकास के नाम पर उनके पहाड़ और जंगल न उजाड़े जाएं और आदिम संस्कृति को ख़त्म करने के प्रयासों पर तत्काल रोक लगे। एटापल्ली पहुंचे आंदोलनकारियों ने मांग रखी कि सुरजागढ़ इलाके के देव, पवित्र डोंगर-पहाड़ और वनों को नष्ट कर स्थानीय लोगों को विस्थापित करने वाली खदानों को गैरकानूनी घोषित कर तुरंत बंद किया जाए और एमओयू रद्द हो। खनन का विरोध कर रहे ग्रामीणों पर पुलिसिया दमन तत्काल रुके और वन अधिकार कानूनों का प्रभावी तौर पर लागू किया जाए।

ग्रामीण आज सुबह से अपने पारंपरिक ढोल-नृत्य के साथ एटापल्ली उप-विभागीय अधिकारी के कार्यालय की ओर बढ़ने लगे थे। अपने सांस्कृतिक गीतों के बीच 'हम अपना पहाड़ नहीं देंगे...', 'सुरजागढ़ हमारा है... के नारों के बीच जनता ने एक बड़ी रैली निकाली और उप-विभागीय अधिकारी के कार्यालय को घेरते हुए अपनी सभा शुरू की।

आंदोलनकारी ग्रामीणों से सुरक्षा के मद्देनजर प्रशासन ने भारी संख्या में पुलिस बल तैनात किया था। देर शाम तक प्रशासन के साथ वार्ता चली, जिसमें स्थानीय जनता ने कहाकि अगर सरकार जल्द ही सुरजागढ़ में चल रही खदान बंद नहीं करती है और अन्य अन्य खदानों को मंजूरी देने की प्रक्रिया को ऐसे ही आगे चलती रही तेा पूरे क्षेत्र में जोरदार आंदोलन शुरू होगा। साथ ही प्रशासन को चेताया कि अभी सिर्फ दो दिनों से ग्रामीण एटापल्ली में जमा हुए थे, आगे यह आन्दोलन निरन्तर चलाया जायेगा।

जनसभा में सुरजागढ़ पारंपरिक इलाखा गोटुल समिति के प्रतिनिधि एवं जिला परिषद् सदस्य सैनु गोटा ने कहा, एटापल्ली के सुरजागड इलाके में सुरजागड, बांडे, दमकोंडवाही, मोहंदी, गुडजुर क्षेत्र के साथ-साथ अन्य 11 जगह खदानें प्रस्तावित की गयी हैं। वर्तमान में सुरजागड में लॉयड्स मेटल्स एंड इंजीनियर्स कंपनी को लौह खदान आवंटित की गई है और अभी सरकार ग्रामसभा के विरोध के बावजूद सुरजागढ़ में गोपनीय कंपनी को नए खनन पट्टे आवंटित करने की तैयारी में लगी है।

इन सभी खनन क्षेत्रों को मंजूरी देते हुए वन संवर्धन कानून 1980, पर्यावरण अधिनियम 1986, पेसा कानून 1996, महाराष्ट्र ग्रामपंचायत अधिनियम 1959 के प्रकरण 3अ के कलम 54, अनुसूचित जाति एवं अन्य पारंपरिक वन निवासी (वन हक मान्यता) अधिनियम 2006, खान एवं खनन अधिनियम और अन्य कानूनन प्रावधानों का उल्लंघन खुद शासन—प्रशासन द्वारा किया जा रहा है, जो इन खदानों को गैरकानूनी बना देती है।

जनसमुदाय को संबोधित करते हुए भामरागड पट्टी पारंपरिक समिति के प्रतिनिधि एवं जिला परिषद् सदस्य लालसू नागोटी ने कहा की सुरजगड़ और अन्य जगहों जहां ये खदानें प्रस्तावित हैं या जहां मंजूरी दी गयी है उन जगहों पर हमारे ठाकुरदेव, तल्लोरमुत्ते, माराई सेडो, बंडापेन इन्ह देवताओं के पवित्र पहाड़ और जंगल हैं, जो कि यहां के स्थानीय आदिवासी एवं अन्य समुदायों की मुख्य सांस्कृतिक एवं धार्मिक विरासतें हैं।

इन्ह सभी प्रस्तावित खदानों से लगभग 15946 एकड़ और लगभग 40 हजार एकड़ जंगल-जमीन खदान पूरक कामों के लिए नष्ट किया जायेगा। इससे सिर्फ सुरजागढ़ क्षेत्र ही नहीं बल्कि एटापल्ली, भामरागड और अन्य तहसील के ग्रामसभाओं के लोगो का वनों पर आधारित शाश्वत रोजगार प्रभावित और ख़तम हो जायेगा। इन्हीं कारणों से प्रस्तावित एवं आवंटित खदानों का हम एटापल्ली एवं भामरागड तहसील की ग्रामसभाए पुरजोर विरोध करते हैं।

सुरजागढ़ क्षेत्र के साथ अन्य क्षेत्र से आये उपस्थित जनसमुदाय प्रतिनिधियों ने आरोप लगाया कि विकास और रोजगार के जुमलों द्वारा लोगों की सहानभूति पाकर राजनेता एवं प्रशासनिक अधिकारी सिर्फ दलाली खाने के लिए पूंजीपतियों को गढ़चिरौली के बहुमूल्य संसाधन बेच रहे हैं। जनता ने मांग रखी की अगर सरकार को सही मायनों में स्थानीय सुवाओं को रोजगार मुहैया कराना है तो गढ़चिरौली जिले में रिक्त सभी पदों को भरकर रोजगार के अवसर खोले जायें और लघु वन उपजों पर आधारित रोजगार के साधन निर्मित किये जाएं।

आंदोलनकारियों ने कहा कि आदिवासी जनता के पूजा स्थलों, पवित्र पहाड़ों और शाश्वत रोजगार को बचाने हेतु खनन विरोधी ग्रामसभा प्रस्तावों की तरफ ध्यान देकर तुरंत सभी खदानों के आवंटन रद्द किये जायें, अगर सरकार ऐसा नहीं कराती है तो अपने जंगल, वनों से मिलने वाले रोजगार, संस्कृति-देव और पूजास्थल बचाने के लिए ऐतिहासिक आन्दोलन खड़ा किया जायेगा। उपस्थित समुदाय ने सुरजागढ़ क्षेत्र में बढ़ते सैनिकीकरण की जोरदार निंदा की।

उप-विभागीय अधिकारी के सम्मुख उपस्थित समुदाय ने अपने मुद्दे रखे। विभिन्न मुद्दों पर महाराष्ट्र के राज्यपाल एवं जिला अधिकारी के नाम ज्ञापन दिया गया।

जनसमुदाय ने कहा कि गढ़चिरौली में संविधान की 5वीं अनुसूची और पेसा कानून को सख्ती से लागू किया जाय और ग्रामसभाओं के अधिकारों को मान्य किया जाये। सामूहिक वन अधिकार प्रक्रिया पर ठीक से अमल किया जाये, प्रलंबित सामूहिक एवं व्यक्तिगत दावों को तुरंत मंजूरी मिले और आदिवासियों के मौलिक अधिकार तथा प्राकृतिक परिवेश को सुरक्षा दी जाय। ‘माडिया गोंड’ आदिम जाति समूहों को वन अधिकार कानून के तहत ‘Habitate Rights’ (आवासीय एवं क्षेत्रित वन अधिकार) की प्रक्रिया को पूरा कर अधिकारों को मान्यता दी जाये।

इस आन्दोलन में विभिन्न संगठन से जुड़े लोगों के अलावा एटापल्ली एवं भामरागड के विभिन्न इलाकों से ग्रामीणों ने हजारों की तादात में हिस्सा लिया।

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