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इसे देश का बजट नहीं, पूंजीपतियों के लिए बनाया गया निजीकरण का वार्षिक प्लान कहते हैं

Prema Negi
4 Feb 2020 11:41 AM GMT
इसे देश का बजट नहीं, पूंजीपतियों के लिए बनाया गया निजीकरण का वार्षिक प्लान कहते हैं
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इस बार के बजट से मोदी सरकार ने मिड-डे-मील वर्कर और आंगनवाड़ी कार्यकत्रियों को भी बता दिया है कि उन्हें न्यूनतम वेतन के मुकाबले बेहद कम मानदेय का भुगतान कर शोषणकारी नीति पहले की भांति रहेगी जारी...

मुनीष कुमार, स्वतंत्र पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता

जनज्वार। हाथी के दांत खाने के और होते हैं तथा दिखाने के और। निर्मला सीतारमण द्वारा प्रस्तुत बजट कुछ ऐसा ही है। 1 फरवरी को अपने बजट भाषण में उन्होंने कहा कि 'मेरे परिचायक वक्तव्य का सारांश यह है कि यह बजट प्रत्येक नागरिक के जीवन को सहज बनाने के लिए समर्पित है।' परन्तु बजट उन्होंने देश के प्रत्येक नागरिक को नहीं, बल्कि देश के मात्र 1 प्रतिशत अमीर व कोरपोरेट घरानों को ही समर्पित किया है।

रकार ने पिछले वर्ष के बजट खर्च 27.86 लाख करोड़ के मुकाबले वर्ष 2020-21 के बजट में 30.42 लाख करोड़ रुपए खर्च करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। यानी कि बजट खर्च में कुल 9 प्रतिशत से भी अधिक की वृद्धि की गयी है।

भारत में मुद्रा स्फीति की दर लगभग 4 प्रतिशत बतायी जा रही है, जिसका मतलब है कि जितना सामान खरीदने के लिए किसी व्यक्ति को पिछले वर्ष 100 रुपए खर्च करने पड़ते थे उसे इस वर्ष अब उतने सामान को खरीदने के लिए 104 रुपये खर्च करने पड़ेंगे।

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रकार जो एक रुपया खर्च करती है उसमें विभिन्न प्रकार की सब्सिडी पर सरकार ने पिछले 2019-20 के बजट में 8 पैसे खर्च करने के लिए रखे थे। परन्तु इस वर्ष 2020-21 के बजट में इस सब्सिडी खर्च में कटौती करते हुए सरकार ने सब्सिडी के लिए 1 रुपए में से मात्र 6 पैसे खर्च करने का लक्ष्य निर्धारित किया है।

स बजट में जो पैसा बजट जन कल्याणकारी योजनाओं में खर्च किया जाना है। वित्त मंत्री ने उसे पिछले वर्षों के मुकाबले या तो घटा दिया है या फिर उसमें मामूली 3-4 प्रतिशत की वृद्धि ही की है।

शिक्षा-स्वास्थ्य के बजट में वृद्धि का छलावा

स्वास्थ्य की मद में सरकार कुल 67484 करोड़ रुपये खर्च करेगी। पिछले बजट आवंटन में केन्द्र सरकार ने 64399 करोड़ रुपये खर्च किए थे। इस तरह स्वास्थ्य पर खर्च पिछले वर्ष के मुकाबले मात्र 3.8 प्रतिशत ही बढ़ाया गया है। मुद्रा स्फीति की दर 4 प्रतिशत को यदि इसमें शामिल किया जाए तो यह बजट बढ़ाने की जगह कम कर दिया गया है।

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सी तरह सरकार ने शिक्षा के लिए मात्र 99312 करोड़ रुपए का आबंटन किया है, जो कि पिछले वर्ष के मुकाबले मात्र 4.69 प्रतिशत अधिक है। मुद्रा स्फीति की दर को शामिल कर लिया जाए तो यह बढ़ोत्तरी भी लगभग नगण्य ही है।

जट में सरकार ने वंचित वर्ग के बच्चों के लिए उच्च शिक्षा संस्थानों के दरवाजे बंद कर दिये हैं। उन्हें संस्थागत शिक्षा देने की जगह सरकार ने उनके लिए आनलाइन शिक्षा का विकल्प प्रस्तुत किया है। देश में शिक्षा को भी साम्राज्यवादियों की लूट के लिए खोल दिया गया है। इस दिशा में एक कदम और आगे बढ़ाते हुए वित्तमंत्री ने शिक्षा के क्षेत्र में भी विदेशी पूंजी निवेश को अनुमति प्रदान कर दी है।

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ये चिकित्सकों को तैयार करने के लिए पीपीपी मोड पर चल रहे जिला अस्पताल को मेडिकल कॉलेज से जोड़े जाने की बात कही गयी है, जिसका अर्थ है जिसकी जेब में भरने के लिए मोटी फीस होगी, उसी का बेटा देश में डॉक्टर बन पाएगा।

रकार के इस शिक्षा व स्वास्थ्य के बजट से देश में ‘सबको शिक्षित करने’ व ‘फिट इंडिया अभियान’ के तहत सभी को स्वस्थ करने का लक्ष्य भी एक जुमला ही बनकर रह गया है।

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भूखों मरेगा इंडिया

देश में आधी से भी अधिक आबादी को पेट भर भोजन नसीब नहीं है। सरकार ने बजट में उनके पेट पर भी लात मारने का काम किया है। पिछले वर्ष खाद्य व सार्वजनिक वितरण विभाग के लिए सरकार ने 192240 करोड़ रुपए के बजट का आवंटन किया था, जिसे इस बजट में 36 प्रतिशत घटाकर 122235 करोड़ रुपयों तक पर सीमित कर दिया गया है।

च्चों के कुपोषण को दूर करने के लिए चलाए जा रहे अम्ब्रैला आई.सी.डी.एस. के साथ भी सरकार ने सौतेला व्यवहार किया है। इसके बजट में मात्र 3.52 प्रतिशत की वुद्धि कर 28557 करोड़ रुपये ही इस मद के लिए रखे गये हैं। सरकार के बजट में की गयी 9 वृद्धि से इस मद को भी अछूता रख गया है। मुद्रा स्फीति की दर को इसमें शामिल कर लिया जाए तो कुपोषण से मरने वाले बच्चों के लिए सरकार ने बजट बढ़ाने की जगह कम कर दिया है।

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ग्रामीण भारत के साथ विश्वासघात

नरेगा के तहत इस वर्ष 2019-20 में 71 हजार करोड़ रुपए खर्च करने का संशोधित अनुमान व्यक्त किया गया है। सरकार ने इसे बढ़ाने के जगह घटाकर 61500 करोड़ रुपए कर दिया है। मिड-डे-मील योजना का बजट पिछले वर्ष के बजट के बराबर ही मात्र 11 हजार करोड़ रुपये ही रखा गया है।

ग्रामीण विकास की मद में पिछले वित्तीय वर्ष में सरकार द्वारा 143409 करोड़ रुपए खर्च किए गये थे, जिसे सरकार ने 1 प्रतिशत से भी कम की वृद्धि कर मात्र 144817 करोड़ रुपए ही रखा है। मुद्रा स्फीति की दर को यदि इसमें शामिल कर लिया जाए तो यह धनराशि बढ़ाने की जगह कम कर दी गयी है।

बेटी पढ़ाओ-बेटी बचाओ का नारा भी एक जुमला

निर्मला सीतारमण ने प्रस्तुत बजट में महिला होने के बावजूद भी देश की महिलाओं के साथ छल किया है। उन्होंने एक बार फिर ये साबित कर दिया है कि मोदी सरकार का 'बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ' का नारा एक जुमले से ज्यादा कुछ नहीं है। मिड-डे-मील व आईसीडीएस के बजट को पूर्व की भांति बेहद न्यूनतम रखा गया है। इस तरह सरकार ने मिड-डे-मील वर्कर (भोजन माताओं) व आंगनवाड़ी कार्यकत्रियों को भी बता दिया है कि सरकार उनको न्यूनतम वेतन के मुकाबले बेहद कम मानदेय का भुगतान कर अपनी शोषणकारी नीति पूर्व की भांति ही जारी रखेगी।

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जट में ग्रामीण विकास विभाग, उर्वरक विभाग, महिला सशक्तिकरण, कार्य और कौशल विकास, गरीब परिवारों को एल.पीजी कनेक्शन (सौभाग्य) के बजट में 29 प्रतिशत की भारी कटौती की गयी है।

देखें तालिका :

किसानों की बरबादी का बजट

बजट में वित्तमंत्री ने कहा है कि हमारी सरकार 2022 तक किसानों की आए दुगुना करने के लिए प्रतिबद्ध है। परन्तु किसानों की आय दुगुनी करने की बात कहकर सरकार ने उर्वरकों पर दी जाने वाली सब्सिडी में 10 प्रतिशत की कटौती कर दी है। सरकार ने बजट में उर्वरकों पर सब्सिडी 2019-20 के 80035 करोड़ रु. के मुकाबले 2020-21 में घटाकर 71345 करोड़ रुपए कर दी है। जिससे खादों के दाम बढ़ने तय हैं।

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सके बरक्स सरकार ने किसानों को 15 लाख करोड़ रुपये के कृषि ऋण उपलब्ध कराने का लक्ष्य निर्धारित किया है। देश के किसानों की बरबादी का बढ़ा कारण उनके ऊपर लगातार बढ़ रहा कर्ज का बोझ ही है। देश में खेती की लागत लगातार बढ़ती जा रही है। खाद, बीज, दवाएं व कृषि उपकरणों के दाम लगातार बढ़ाए जा रहे हैं तथा सरकार भी लगातार इन पर सब्सिडी कम कर रही है। इस कारण कर्ज लेना किसानों की मजबूरी बन गयी है।

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कृषि संकट का हल किसानों को ऋण उपलब्ध कराने से नहीं है, बल्कि कृषि लागत मूल्य को कम करने से निकलेगा। इसके लिए जरुरी है कि सरकार विशेष तौर पर छोटे व मध्यम किसानों को खाद, बीज, दवाएं व कृषि उपकरण आदि सब्सिडी देकर सस्ती दरों पर उपलब्ध कराए ताकि उन्हें खेती करने के लिए कर्ज ही न लेना पड़े। परन्तु वित्तमंत्री बिल्कुल इसका उल्टा कर रही हैं। वह किसानों को कर्ज के दलदल में धकेल रही हैं तथा उर्वरकों पर दी जाने वाली नाममात्र की सब्सिडी में भी कटौती कर रही हैं। इस सबसे किसानों की हालत सुधरेगी नहीं, बल्कि खराब ही होगी।

कुल मिलाकर सरकार का यह बजट कॉरपोरेट के द्वारा, कोरपोरेट के हित में, कोरेपोरेट के लिए बनाया गया है।

(मुनीष कुमार समाजवादी लोक मंच के संयोजक हैं।)

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