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मोदी सरकार दावा करती रहे, पर विश्व की सबसे तेज बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था नहीं है भारत

Prema Negi
3 Aug 2019 8:10 AM GMT
मोदी सरकार दावा करती रहे, पर विश्व की सबसे तेज बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था नहीं है भारत
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केवल जनता को बेवक़ूफ़ बना और आंकड़ों को तोड़-मरोड़कर ही वर्ष 2024 तक 5 ख़रब के आंकड़े तक पहुंच सकती है मोदी सरकार, जबकि उद्योगपति भी कह रहे हैं सरकार के आंकड़ों पर नहीं किया जा सकता है भरोसा...

महेंद्र पाण्डेय की रिपोर्ट

चुनाव जीतते ही प्रधानमंत्री ने कहा था कि गणित को रसायन शास्त्र ने हरा दिया है। चुनावी भाषणों में लगातार दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था का हंगामा किया गया। मीडिया भी अर्थव्यवस्था के सन्दर्भ में इंग्लैंड और फ्रांस को पछाड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ रही थी।

सी बीच 5 ख़रब की अर्थव्यवस्था का ख़्वाब भी दिखाया जाने लगा और बजट के बाद तो इससे इत्तेफाक नहीं रखने वाले लोगों को प्रधानमंत्री ने पेशेवर निराशावादी करार दिया। पर विश्व बैंक ने प्रधानमंत्री को बता दिया की उनके हारे हुए गणित ने ही उनकी अर्थव्यवस्था को हरा दिया और भारत दुनिया की सातवीं अर्थव्यवस्था बन गया है। संभव है, सरकारी बयान आ जाए की हम विश्व बैंक के आंकड़े नहीं मानते या फिर देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु को इसका जिम्मेदार ठहरा दिया जाए।

विश्व बैंक के नए आंकड़ों के अनुसार भारत जीडीपी के संदर्भ में दुनिया की सातवीं बड़ी अर्थव्यवस्था है। पहले स्थान पर 20.5 ख़रब डॉलर के साथ अमेरिका है, दूसरे स्थान पर चीन है जिसकी अर्थव्यवस्था 13.6 ख़रब डॉलर की है। जापान, जर्मनी, इंग्लैंड, फ्रांस, इटली, ब्राज़ील और कनाडा क्रमशः तीसरे, चौथे, पांचवें, छठे, आठवें, नौवें और दसवें स्थान पर हैं। वर्ष 2017 में देश का जीडीपी 2.65 ख़रब था जो वर्ष 2018 में 2.72 ख़रब डॉलर तक पहुँच गया।

देश की खराब अर्थव्यवस्था का एक यही सूचक नहीं है। सबसे बड़ा सूचक तो प्रधानमंत्री के वक्तव्य होते हैं। जिस क्षेत्र में देश की हालत अधिक खराब रहती है, उसके मनगढ़ंत आंकड़े प्रधानमंत्री जी अपने भाषणों में बारबार और लगातार पेश करते हैं, जिससे जनता और मीडिया को सवाल करने का कोई मौका ही न मिले। वैसे भी सवाल पूछने वाले तो पेशेवर निराशावादी हैं ही। एक और झूठ जो हमारी अर्थव्यवस्था के बारे में लगातार कहा जाता रहा है, वह है दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था।

न्यूज वीक में कुछ समय पहले प्रकाशित एक लेख में बताया गया है की सरकार कितना भी दावा करे, पर विश्व की सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था भारत नहीं है। अर्थव्यवस्था बढ़ रही है, पर इसकी गति धीमी है। मई में औद्योगिक उत्पादन के आंकड़े बता रहे थे कि पिछले 18 वर्षों के आंकड़ों की तुलना में कारों की बिक्री सबसे कम हुई है। इसके बाद के महीनों में भी लगातार यही हाल रहा है। कारों की बिक्री का सीधा सा सम्बन्ध अर्थव्यवस्था से है, जब यह ठीक रहती है तब कारों की बिक्री लगातार बढ़ती है।

नेक अर्थशास्त्री और अब तो उद्योगपति भी मानते हैं कि सरकार द्वारा जारी आंकड़ों में तमाम गलतियां हैं और ये आंकड़े अर्थव्यवस्था की सही स्थिति नहीं बताते हैं। जून के महीने में अरविन्द सुब्रमणियम ने इसकी खामियों को उजागर किया था और बताया था की वर्तमान सरकार जब सकल घरेलू उत्पाद में 7 प्रतिशत की बृद्धि बताती है, तब वह वास्तविकता में महज 4.5 प्रतिशत की वृद्धि होती है।

से विचार पहले भी अनेक अर्थशास्त्री रख चुके हैं, पर उम्मीद के मुताबिक़ सरकार इन दावों को लगातार खारिज करती रही है। चलिए आंकड़ों को दरकिनार कर भी दें, तब भी अरविन्द सुब्रमणियम की एक बात से तो कोई इंकार नहीं कर सकता है। उनके अनुसार अर्थव्यवस्था के बढ़ने के लिए बढ़ते रोजगार के अवसर, आयात-निर्यात में बढ़ोत्तरी, रिज़र्व खजाने में बढ़ोत्तरी, बढ़ता औद्योगिक उत्पादन, उत्पादों की बढ़ती मांग और बढता कृषि उत्पादन जिम्मेदार है, पर इनमें से कुछ भी नहीं बढ़ रहा है तो फिर अर्थव्यवस्था इतनी तेजी से कैसे बढ़ सकती है?

जेपी मॉर्गन चेज के विशेषज्ञ जहांगीर अज़ीज़ बताते हैं कि जब सरकार के आंकड़े ही भ्रामक हैं तब इस पर आधारित विकास हमेशा भ्रामक ही रहेगा। एशियाई डेवलपमेन्ट बैक और इंटरनेशनल मोनेटरी फण्ड ने देश के जीडीपी बढ़ोत्तरी के पूर्वानुमानित दर को संशोधित कर कण कर दिया है।

नेक आर्थिक संस्थानों ने देश की रेटिंग को पहले से कम किया है। राहुल बजाज समेत अनेक उद्योगपतियों ने इस सरकार के आर्थिक नीतियों की आलोचना की है। लार्सन एंड टूब्रो के अध्यक्ष एके नायक ने साफ़ कहा कि सरकार जिस जीडीपी वृद्धि दर का दावा कर रही है, उससे कम वृद्धि दर रहेगी। इसके साथ ही उन्होंने घटते निवेश पर भी चिंता जताई। इतना ही नहीं, नायक ने साफ़ शब्दों में कह दिया कि सरकार के आँकड़ों पर भरोसा नहीं किया जा सकता है।

से में केवल जनता को बेवक़ूफ़ बनाकर और आंकड़ों को तोड़-मरोड़कर ही वर्ष 2024 तक 5 ख़रब के आंकड़े तक पहुंचा जा सकता है और कम से कम यह इस सरकार के लिए सबसे आसान काम है।

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